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वर्तमान शिक्षा और भविष्य


आज की शिक्षा एक शहरी, प्रतिस्पर्धी उपभोक्ता समाज के मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए उन्मुख है. वर्तमान शिक्षा के द्वारा भारत ने पिछले पांच दशको में अधिक संख्या में काफी वैज्ञानिकों, पेशेवरों और टेक्नोक्रेट का उपधान किया है जो अपने क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है| 

2022-09-25 14:49:56

आज की शिक्षा एक शहरी, प्रतिस्पर्धी उपभोक्ता समाज के मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए उन्मुख है. वर्तमान शिक्षा के द्वारा भारत ने पिछले पांच दशको में अधिक संख्या में काफी वैज्ञानिकों, पेशेवरों और टेक्नोक्रेट का उपधान किया है जो अपने क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है. आदि शीर्ष वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, शोधकर्ताओं, प्रोफेसरों का पूरा शिक्षा भारत में ही हुआ, विदेश में नहीं. इन विशेषज्ञों और उच्चम स्तर पर पहुंचे हुए लोग, इसी वर्तामन शिक्षा प्रणाली के माध्यम से आये है. तो हम शिक्षा व्यवस्था के सकारात्मक पहलुओं को इंकार नहीं कर सकते है. हम पूरी तरह से हमारे वर्तामन शिक्षा का आलोचना नहीं कर सकते हैं. लेकिन हम वास्तव में एक बेहतर भविष्य को लेकर चिंतित है तो कुछ मुद्दे है जहाँ हमारी तत्काल ध्यान देने की जरूरत है.

रटना सीखना अभी भी हमारे सिस्टम में विपक्तिया है. छात्रों अभी भी सिर्फ परीक्षा में आँख स्कोर करने के लिए अध्ययन करते हैं या कभी कभी आईआईटी जेईई अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान या CLAT तरह परीक्षा दरार करने के लिए. एक जमाने पर सिविल सेवाओं और बैंक अधिकारियों का परीक्षा के लिए सामूहिक रूप से तैयार युवाओं आज कल इंजीनियरों बनने के लिए तैयार करते हैं। अगर शैक्षिक उत्कृष्टता के कुछ केन्द्रों है तो उनके प्रत्येक एक के लिए हजारों साधारण स्कूलों और कॉलेजों है. अभ विश्वविद्यालयों भी न्यूनतम मानकों को पूरा नहीं करते.

नए स्कूलों और कॉलेजों निर्माण करने से हमारे शिक्षा का संकट सुधर नहीं कर सकते. भारत में शिक्षा के लिए माता पिता के जीवन की बचत और उधार के पैसे खर्च

हमारे विचार में वर्तमान शिक्षा-प्रणाली शिक्षित होने के दंभ ढोने वाले लोगों का उत्पादन करने वाली निर्जीव मशीन मात्र बनकर रह गई है। तभी तो वह उत्पादन के नाम पर प्रतिवर्ष लाखों दिशाहीन नवयुवकों को उगलकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेती है। इस शिक्षा-प्रणाली का ही तो दोष है कि बी.ए., एम.ए. करने के बाद भी सक्रियता या जीवन व्यवहारों के नाम पर व्यक्ति अपने को कोरा-बल्कि थका-हारा और पराजित तक अनुभव करने लगता है। यह प्रणाली अपने मूल रूप में कई-कई विषयों की सामान्यत जानकारी देकर शिक्षित होने का बोझ तो हम पर लाद देती है, पर वास्तिवक योज्यता और व्यावहारिकता का कोना तक भी नहीं छूने देती। परिणामस्वरूप व्यक्ति व्यक्तित्व से हीन होकर अपने लिए ही एक अबूझ पहेली और बोझ बनकर रह जाता है। ऐसे व्यक्ति से देश