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रुपए का रेट कैसे तय होता है रुपए का रेट कौन तय करता है यह सवाल अक्सर हम सभी के मन में आता है तो चलिए आज इसके बारे में जानते हैं

अगर हम रुपए की बात करें तो 1947 में $1 3.3 रुपए के बराबर था 1985 में यह बढ़कर 12.38 तक पहुंच गया फिर 1995 में यह आंकड़ा 32.42 तक पहुंचा और 2011 में 55.39 तक पहुंचा और अभी $1 ₹80 के आसपास है



अब जानते हैं आखिर कौन तय करता है रुपयों का

आप सभी के मन में यह सवाल जरूर आता होगा कि आखिर रुपए का दाम कौन तय करता है तो इसका सीधा सा जवाब है कि रुपयों का दाम कोई तय  नहीं करता अब आप फिर कंफ्यूजन में आ गए होंगे कि जब कोई दाम तय नहीं करता यह उतार-चढ़ाव कैसे होता है तो इसका सीधा सा जवाब है कि रुपयों का उतार-चढ़ाव देश की विदेशी मुद्रा भंडार और देश की अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है

अब हम समझते हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार किसे कहते हैं

1.जब भारत अपने देश में बने हुए वस्तुओं का निर्यात विदेशों में करता है तो भारत का उन वस्तुओं को बदले विदेशी मुद्राएं प्राप्त होती है यह विदेशी मुद्राएं विदेशी मुद्रा भंडार कहलाती है

2.विदेशी निवेश --जब विदेशों की कंपनियां भारत में अपना कारोबार प्रारंभ करती है तो वह विदेशी मुद्रा को भारत में निवेश करती है जिससे भारत को विदेशी मुद्रा प्राप्त होता है

3.विदेशों में रहने वाले भारतीय --जब भारत के लोग विदेशों में पैसे कमाते हैं और उसे कमाने के पश्चात भारत में भेजते हैं तो इससे विदेशी मुद्रा भंडार प्राप्त होती है

तो इन तीनों माध्यमों से भारत को विदेशी मुद्रा प्राप्त होता है भारत अपनी जरूर जरूरी वस्तुओं के आयात के लिए विदेशी मुद्रा यानी डॉलर को सुरक्षित रख लेता है तो यही विदेशी मुद्रा भंडार कहलाता है

हर देश के पास विदेशी मुद्रा भंडार होता है जिससे वह अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन करता है इस विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से उस देश की मुद्रा का वैल्यू क्या होता है अगर भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर अमेरिका के रुपयों के भंडार के बराबर है तो रुपया की कीमत स्थिर होगी अगर हमारे पास डॉलर घटे तो रुपया कमजोर होगा और अगर डॉलर बढ़ेगा तो रुपया का वैल्यू भी मजबूत होगा इस प्रोसेस को फ्लोटिंग रेट सिस्टम के नाम से जाना जाता है

अब आइए इसे एक उदाहरण से समझते हैं

मान लीजिए अमेरिका के पास ₹8000 का भंडार है और भारत के पास $100 है दोनों के पास बराबर का मुद्रा भंडार है अब अगर हमें अमेरिका से कोई सामान खरीदने की जरूरत पड़ी जिस का भाव ₹800 के बराबर है तो हमें इसके लिए अपने $100 में से $10 देने होंगे अब हमारे पास $90 बचे अब भारत की विदेशी मुद्रा भंडार अमेरिका के मुकाबले कम हो गया इस संतुलन को बनाने के लिए भारत को अमेरिका से $10 का सामान बेचना होगा यानी निर्यात करना होगा मगर भारत जितना आयात करता है उसके अपेक्षा उतना निर्यात नहीं करता इसीलिए डॉलर का मूल्य रूपों की तुलना में हमेशा बढ़ता रहता है

भारत अपनी जरूरत का 80% तेल आयात करता है जिससे इंडिया विदेशी मुद्रा भंडार पर काफी असर पड़ता है भारत को अपने रुपयों को मजबूत करने के लिए इस आयात को कम करना होगा और निर्यात को बढ़ावा देना होगा

आइए आप समझते हैं इस प्रक्रिया में आरबीआई की भूमिका

इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका अहम है भारतीय रिजर्व बैंक देश की मौद्रिक नीति को तय करता है और यह सुनिश्चित करता है कि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहे और विदेशों से भारत को निवेश हो भारतीय रिजर्व बैंक अपने पास इतना विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रख रखे रहती है जिससे अपने कर्ज को जब चाहे चुका सके ताकि कर्ज देने वालों को यह भरोसा बनी रहेगी भारत जब चाहे कर्ज को चुका सकता है जिससे यह सुनिश्चित होता है कि भारत की अर्थव्यवस्था स्थिर है

रुपयों को मजबूत करने के लिए कुछ उपाय

भारत को जितना हो सके अपने निर्यात को बढ़ाना होगा विदेशी सामानों को अपनाने की मुहिम चलानी होगी तेल के आयात को कम करके और इसके विकल्पों की खोज शुरू करनी होगी विदेशी निवेश को बढ़ावा देना होगा