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देश में प्रौढ़ शिक्षा और साक्षरता के नाम पर लूट खसोट

प्राथमिक शिक्षा का दुर्बल आधार, उच्च शिक्षण संस्थानों का अपनी सशक्त भूमिका से अलग हटना तथा अध्यापकों का पेशेवर दृष्टिकोण वर्तमान शिक्षा प्रणाली के लिए एक नया संकट उत्पन्न कर रहा है।

प्राथमिक शिक्षा का दुर्बल आधार, उच्च शिक्षण संस्थानों का अपनी सशक्त भूमिका से अलग हटना तथा अध्यापकों का पेशेवर दृष्टिकोण वर्तमान शिक्षा प्रणाली के लिए एक नया संकट उत्पन्न कर रहा है।

पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के नए चेहरे, निजीकरण तथा उदारीकरण की विचारधारा से शिक्षा को भी 'उत्पाद' की दृष्टि से देखा जाने लगा है जिसे बाजार में खरीदा - बेचा जाता है। इसके अतिरिक्त उदारीकरण के नाम पर राज्य भी अपने दायित्वों से विमुख हो रहे हैं ।

इस प्रकार सामाजिक संरचना से वर्तमान शिक्षा प्रणाली के संबंधों, पाठ्यक्रमों का गहन विश्लेषण तथा इसकी मूलभूत दुर्बलताओं का गंभीर रूप से विश्लेषण की चेष्टा न होने के कारण भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली आज भी संकटों के चक्रव्यूह में घिरी हुई है । प्रत्येक दस वर्षों में पाठ्य-पुस्तकें बदल दी जाती हैं लेकिन शिक्षा का मूलभूत स्वरूप परिवर्तित कर इसे रोजगारोन्मुखी बनाने की आवश्यकता है।

शारीरिक शिक्षा

  • दिल को मजबूत बनाने के लिए शारीरिक गतिविधियाँ उपयोगी होती हैं और बेहतर प्रदर्शन सुनिश्चित करती हैं। 
  •  यह छात्रों के स्वास्थ्य को बढ़ाने और उन्हें पुरानी बीमारियों से
  •   दूर रखने में मदद करता है।
  • शारीरिक व्यायाम में लगे लोगों की नींद का पैटर्न बेहतर होता
  • शारीरिक शिक्षा कक्षा में छात्र के प्रदर्शन की गुणवत्ता और व्यवहार को बढ़ाने में मदद करती है।
  • शारीरिक शिक्षा सप्ताह में कम से कम तीन दिन हर बार 60 मिनट के लिए शारीरिक गतिविधियों को जोड़ने को बढ़ावा देती है।
  • यह व्यक्ति के मूड और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने में मदद करता है।
  •  प्रत्येक के लिए चलने वाले औसत कदम लगभग 7,500 होने की सिफारिश की जाती है।
  • एक कदम आगे बढ़ते हुए शरीर में 200 से अधिक मांसपेशियों का उपयोग होता है।
  • शारीरिक शिक्षा भी हाइड्रेटेड रहने के लिए महत्वपूर्ण है अन्यथा यह व्यायाम प्रदर्शन की गुणवत्ता को कम कर देता है। • बार-बार व्यायाम करने से मस्तिष्क की कार्यक्षमता में वृद्धि होती हैं