Dowry System

Dowry System:- आज दहेज की प्रथा को देश भर में बुरा माना जाता हैं। इसके कारण कई दुर्घटनाएँ हो जाती हैं , कितने घर बर्बाद हो जाते हैं। आत्महत्याएँ भी होती देखी गई हैं। नित्य-प्रति तेल डालकर बहुओं कू द्वारा अपने आपकों आग लगाने की घटनाएँ भी समाचार-पत्रों में पढी़ जाती हैं। पति एवं सास – ससुर भी बहुओं को जला देते हैं या हत्याएँ कर देते कर देते हैं। इसलिए दहेज प्रथा को आज कुरीति माना जाने लगा हैं।

भारतीय सामाजिक जीवन में अनेक अच्छें गुण हैं, परंतु कतिपय बुरी रीतियाँ भी उसमें घुन कि भाँति लगी हुई हैं। इनमें एक रीति दहेज प्रथा की भी हैं। विवाह के साथ ही पुत्री को दिए जाने वाले समान को दहेज कहतें हैं। इस दहेज में बर्तन, वस्त्र,पलंग ,सोफा, रेडीयो, मशीन ,टेलीविजन आदि की बात ही क्या हैं, लाखों रूपय नकद भी दिया जाता हैं। इस दहेज को पुत्री के स्वस्थ शरीर ,सौन्दर्य और सुशीलता के साथ ही जीवन को सुविधा देने वाला माना जाता हैं।

Dowry System 2023||दहेज प्रथा के कारण कई घटनाएं|| Easy

Dowry System का इतिहास देखा जाए तब इसका प्रारंभ किसी बुरे उदेश्य से नहीं हुआ था। Dowry System का उल्लेख मनु स्मृति में ही प्राप्त हो जाता हैं , जबकि वस्त्राभूषण युक्त कन्या के विवाह की चर्चा की गई हैं। गाय तथा अन्य वाहन आदि देने का उल्लेख मनुस्मृति में किया गया हैं। समाज में जीवनोयोगी सामग्री देने का वर्णन भी मनुस्मृति में किया गया है, परंतु कन्या को दहेज देने के दो प्रमुख कारण थें। पहला तो यह कि माता – पिता अपनी कन्या को दान देते समय यह सोचतें थे की वस्त्रादि सहित कन्या को कुछ सामान दे देने से उसका जीवन सचवीधापूर्वक चलता रहेगा और कन्या को प्रारंभिक जीवन में कोई कष्ट न होगा।

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दूसरा कारण यह था कि कन्या भी घर में अपने भाईयों के समान भागीदार है, चाहे वह अचल सम्मति नहीं लेती थी, परंतु विवाह के काल में उसे यथाशक्ति धन पदार्थ आदि दिया जाता था, ताकि वह सुविधा से जीवन व्यतीत करें और इसके पश्चात भी उसे जीवन भर सामान मिलता रहता था।

घर भर में उसका सम्मान हमेशा बना रहता था। इस प्रथा के दुष्परिणामों से भारत के मध्ययुगीन इतिहास में अनेक धटनाएँ भरी पडी़ हैं। धनी और निर्धन व्यक्तियों को दहेज देने और न देने की स्थिति में दोनों कष्ट सहने पड़ते रहे।

समय के चक्र में सामाजिक उपयोगिता की प्रथा ने धीरे’- धीरेअपना बुरा रूप धारण करना आरंभ कर दिया और लोगों ने अपनी कन्याओं का विवाह करने का आरंभ धनी वर्ग से ही हुआ है क्योंकि धनियों को धन की चिंता नही होती।

वे अपने लड़कियों के लिए लड़का खरीदने की शक्ति रखते हैं। इसलिए दहेज-प्रथा ने जघन्य बुरा रूप धारण कर लिया और समाज में यह कुरीति-सी बन गई हैं। अब इसका निवानण दुष्कर हो रहा है।

नौकरी-पेशा या निर्धनों प्रथा से अधिक कष्ट पहुँचता हैं। अब तो बहुधा लड़के को बैंक का एक चैक मान लिया जाता है कि जब लड़की वाले आयें तो उनकी खाल खींचकर पैसा इकट्ठा कर लिया जाये ताकि लड़की का विवाह कर देने के साथ ही उसका पिता बेचारा कर्ज से भी दब जायें।

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दहेज प्रथा को सर्वथा बंद किया जाना चाहिए परंतु कानून बनाकर एक निश्चित मात्रा तक दहेज देना चाहिए। अब तो पत्री और पुत्र का पिता कि सम्पति में समान भाग स्वीकिर किया गया हैं।

इसलिए भी दहेज को कानूनी रूप दिया जाना दिया जाना चाहिए और लड़कों को माता-पिता द्वारा मनमानी धन दहेज में लेने पर प्रतिबंध लग जाना चाहिए । जो लोग दहेज मे मनमानी करें उन्हें दण्ड देकर इस दिशा मे सुधार करना चाहिए। दहेज प्रथा को भारतीय समाज के माथे पर कलंक के रुप में नही रहने देना चाहिए।

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