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जब झारखण्ड में यशवंत सिन्हा का उदय हुआ, उस समय हजारीबाग भाजपा की कोई पारम्परिक सीट नहीं थी। उनके लिए राजनैतिक जमीन तैयार करने और उन्हें एक बड़े नेता की तरह प्लांट करने के लिए भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व ने पूरा जोर लगाया था। अब जब यशवंत सिन्हा ने अपनी राह घोषित तौर पर भाजपा से अलग कर लिया है, एक बार फिर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पूरी रणनीति के साथ यशवंत सिन्हा के विकल्प को हजारीबाग के बहाने झारखण्ड में प्लांट करने की जुगत लगा रहा है। हजारीबाग की बदलती राजनैतिक फिजां की कहानी बयान कर रहे हैं हिंद वॉच झारखण्ड के सह-संपादक कुमार कौशलेन्द्र

 

भारतीय जनता पार्टी झारखण्ड के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व हजारीबाग के प्रथम भाजपा सांसद रह चुके प्रो.यदुनाथ पांडे विगत वर्ष के सितम्बर माह के दूसरे पखवाड़े से हजारीबाग संसदीय क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क में जुटे हैं। स्थानीय मीडिया कवरेज की बात करें तो इन दिनों फायर ब्रांड पूर्व सांसद यदुनाथ पांडे वर्तमान हजारीबाग सांसद व केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा से ज्यादा सुर्खियां बटोर रहे हैं। ज्ञातव्य है कि यशवंत सिन्हा से पूर्व हजारीबाग से बीजेपी का झंडा बतौर सांसद यदुनाथ पांडे ने सन 1989 से 1991 तक 9 वीं लोकसभा में बुलंद कर रखा था। बाद के दिनों में बीजेपी की राजनीति हजारीबाग में ऋषभ वाटिका अर्थात् यशवंत सिन्हा के इर्द-गिर्द केन्द्रित हो गयी और प्रो.पांडे नेपथ्य में चले गये। हाल के दिनों में पूर्व सांसद यदुनाथ हजारीबाग के शहरी क्षेत्र से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों का सघन दौरा करते दिख रहे हैं। शादी-विवाह, गृह प्रवेश, धार्मिक आयोजन अथवा मातम हर तरह के आयोजन में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित कर घर-घर मोदी का नारा और जमीनी स्तर पर भाजपा का झंडा बुलंद कर रहे पूर्व सांसद की सक्रियता ने केन्द्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद जयंत सिन्हा को भी दिल्ली छोड़ ज्यादा समय हजारीबाग में व्यतीत करने पर मजबूर कर दिया है। क्षेत्रवार अपने पुराने समर्थक काडर को सक्रिय कर रहे पांडे जी की चुनावी मोड में तैयारी को लेकर भाजपा के अंदरखाने और जनता के बीच तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म है।

एक चर्चा यह हो रही है कि 2019 में पुनः प्रो.यदुनाथ पांडे को भाजपा टिकट पर दिल्ली भेजा जायेगा इसीलिए आलाकमान की हरी झंडी लेकर प्रोफेसर साहब चुनावी तैयारी कर रहे हैं। तमाम अटकलों के बीच यदुनाथ पांडे मीडिया की ओर से उनकी भावी उम्मीदवारी से जुड़े सवाल अथवा यशवंत सिन्हा-जयंत सिन्हा से सम्बंधित सवालों को टाल जाते हैं। हालांकि इशारों में प्रोफ़ेसर पांडे यशवंत सिन्हा और वर्तमान सांसद जयंत सिन्हा की फ़जीहत करने से भी नहीं चूकते।

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संसदीय क्षेत्र हजारीबाग के विश्वप्रसिद्ध रामनवमी जुलूसों के आयोजन से लेकर क्षेत्र में जारी शासकीय विकास कार्यों की प्रगति समीक्षा में भी पांडे जी जयंत सिन्हा से ज्यादा सक्रिय दिख रहे हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ-साथ यदुनाथ पांडे सोशल मीडिया पर भी पल-पल की उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

अपने तूफानी दौरे के क्रम में पूर्व सांसद ने बड़कागांव के एक आयोजन में भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा कि “कालनेमि से बचने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मैं संतरी हूं मुझे मालिक नहीं समझिए, आप की समस्याओं का समाधान करना हमारा परम कर्तव्य है। इस माटी के ऋण को चुकाना है।”

जब मीडियाकर्मियों ने उनसे बहुचर्चित महुदी रामनवमी मार्ग विवाद के समाधान का उपाय पूछा तो उन्होंने कहा कि “कालनेमि भगवा पहन कर साथ तो हैं लेकिन सही में वह भगवाधारी नहीं है। उनसे बचने की आवश्यकता है। समय आते ही समस्या का समाधान हो जाएगा।” क्या कालनेमि से निपटने की रणनीति बन गयी है, यह पूछे जाने पर यदुनाथ पांडे ने कहा – “समय पर सब पता चल जायेगा। बताते चलें की महुदी मार्ग विवाद को लेकर वर्तमान सांसद के पिता यशवंत सिन्हा ने राज्य की रघुवर सरकार को विधि-व्यवस्था से जुड़े अटपटे संकट में डाल दिया था।”

वहीं दूसरी ओर जयंत सिन्हा के समर्थक उन्हें प्रधानमंत्री का चहेता मंत्री बता कर इन आशंकाओं को ख़ारिज कर रहे हैं कि यदुनाथ पांडे की बतौर बीजेपी उम्मीद्वार हजारीबाग से वापसी की पटकथा लिखी जा चुकी है। स्थानीय संगठन से जुड़े भाजपाई फ़िलहाल असमंजस में कभी वर्तमान सांसद के साथ लामबंद दिख रहे हैं तो कभी दोनों के बीच संतुलन साध कर चल रहे हैं। इसी बीच विगत दिनों विपक्षी दलों के मोदी विरोधी नेताओं के साथ मंच साझा कर पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने भाजपा से पूर्णतः नाता तोड़ने का ऐलान कर अपने पुत्र और वर्तमान हजारीबाग सांसद व केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा के संसदीय भविष्य को लेकर संशय की धूंध को और बढ़ा दिया है।

उपरोक्त सन्दर्भ में उल्लेख अप्रासंगिक नहीं होगा कि 2017 सितम्बर के दूसरे पखवाड़े भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 3 दिवसीय झारखण्ड दौरे पर रांची पहुंचे थे। 15 से 17 सितम्बर तक के अपने रांची प्रवास के दौरान श्री शाह ने अन्य कार्यक्रम से ज्यादा पार्टी के लोगों की पाठशाला लगाई थी और मिशन 2019 में लग जाने का स्पष्ट निर्देश जारी कर दिया था। भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक लगातार केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर नकारात्मक बयानबाजी कर यशवंत सिन्हा भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व के आँखों में खटक ही रहे थे इसी बीच मुख्यमंत्री रघुबर दास और प्रदेश नेतृत्व ने श्री सिन्हा द्वारा पार्टी लाइन से अलग स्टैंड लेकर शासकीय कामकाज में बाधा पहुँचाने की रपट भी दिल्ली दरबार को दे दी थी। उसी वक़्त से अटकलें लगने लगी थीं की यशवंत सिन्हा की नकेल कसी जायेगी। श्री शाह के रांची दौरे के क्रम में खुले तौर पर ऐसा कोई कदम तो नहीं उठाया गया किन्तु राष्ट्रीय अध्यक्ष ने हजारीबाग से यशवंत युग की पटकथा लिख डाली और यदुनाथ क्षेत्र में रेस हो गये।

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राजनीतिक हानि लाभ गणित के विशेषज्ञ एक ओर जहां यशवंत सिन्हा को एक बहुत ही काबिल प्रशासनिक अधिकारी, काबिल मंत्री और अच्छी राजनीतिक समझ वाला राजनेता करार दे रहे हैं वहीं 25 वर्ष तक भाजपा से जुड़े रहने के बाद उनके पार्टी छोड़ने के निर्णय को उनके पुत्र और केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा के राजनीतिक भविष्य का पटाक्षेप भी बता रहे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक पटना में जब यशवंत सिन्हा ने बीजेपी छोड़ने का ऐलान किया उस वक्त मंच पर लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव भी मौजूद थे, जबकि सिन्हा ने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में हमेशा लालू यादव की खिलाफत की थी। मंच पर तेजस्वी के अलावा बीजेपी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह और आशुतोष व सपा के कई नेताओं की मौजूदगी को उनकी राजनीतिक भूल करार दिया जा रहा है क्योंकि यशवंत सिन्हा जब चंद्रशेखर की पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में आए तब भाजपा ने उन्हें बिहार विधानसभा में विधायक दल का नेता बना दिया था। उस वक़्त भाजपा के कद्दावर नेता रहे गुलशन आजमानी का टिकट काट कर यशवंत सिन्हा को रांची क्षेत्र से विधानसभा भेजा गया था। बाद में हजारीबाग से यदुनाथ पांडे की पुख्ता दावेदारी को नकारते हुए तत्कालीन भाजपा नेतृत्व ने यशवंत सिन्हा को हजारीबाग से संसद पहुँचाया। उसके बाद जब केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी तो उन्हें केंद्रीय मंत्री भी बनाया गया, पहले वित्त मंत्री, उसके बाद विदेश मंत्री। 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त उन्होंने कहा था कि जब तक इस लोकसभा का कार्यकाल पूरा होगा तब तक मेरी उम्र 81-82 साल हो जाएगी, ऐसे में मेरे लिए राजनीतिक रूप से सक्रिय रहना बहुत ज़्यादा संभव नहीं होगा। इसके बाद पार्टी ने उनके कहने पर उनके बेटे को टिकट दिया और बाद में बेटे को मंत्री तक बना दिया। बावजूद इसके सिन्हा का भाजपा विरोधी तेवर फ़िलहाल उनके लिये आत्मघाती ही दिख रहा है। तमाम राजनीतिक उठापटक के मद्देनजर यशवंत सिन्हा का राजनीतिक भविष्य अब महज़ एक साल का दिख रहा है। 2019 के चुनाव तक मोदी विरोधी जितनी भी ताकतें हैं वे उनका साथ देंगी ये तय है लेकिन यदि 2019 में बीजेपी वापस सत्ता में आ गई तो उसी के साथ यशवंत सिन्हा के राजनीतिक करियर का भी अंत हो जाना तय है। इन सब के बीच उनके पुत्र व मोदी मंत्रिमंडल के सदस्य हजारीबाग के वर्तमान सांसद की राजनीतिक हालत असहज हो गयी है।

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हालांकि पिता यशवंत द्वारा पार्टी को अलविदा कर भाजपा विरोधी बिगुल फूंकने के बाद जयंत मीडिया के एतद् संबंधी सवालों से बचते हुए अपने संसदीय क्षेत्र में ज्यादा समय देने लगे हैं और सोशल मीडिया के पन्नों से जनता तक अपनी उपलब्धियां पहुँचाने में जुटे हैं। हाल ही में जयंत सिन्हा ने ट्वीटर के ज़रिए दावा किया कि “हजारीबाग में अभूतपूर्व विकास हुआ है। हमने एक तरफ विश्व स्तरीय प्रोजेक्ट शुरू किए और दूसरी तरफ मूलभूत सुविधाएं दी हैं। साथ ही इसी वर्ष मेडिकल कॉलेज में कक्षाएं शुरू करने का प्रयास है तथा हजारीबाग-बड़कागांव सड़क निर्माण को गति देने का प्रयास किया जा रहा है।”

बावजूद इसके हजारीबाग भाजपा राजनीति का केन्द्र अब ऋषभ वाटिका (यशवंत/जयंत सिन्हा का हजारीबाग स्थित आवास) से शिफ्ट होता दिख रहा है। सनद रहे कि यशवंत सिन्हा बीजेपी के अंदरूनी और हजारीबाग लोकसभा के समीकरणों को साधना भलीभांति जानते थे। अपने इसी कौशल के बूते 1998, 1999 और 2009 के संसदीय चुनावों में श्री सिन्हा ने भाजपा से जीत का परचम लहराया था।

हजारीबाग यशवंत सिन्हा की कर्मस्थली रही है। माना जाता है कि दो दशकों से ज़्यादा वक़्त में उन्होंने अपना ख़ासा प्रभाव भी जमाया है इसलिए 2019 के चुनाव में यशवंत के प्रत्यक्ष तौर पर सामने नहीं आने से जयंत सिन्हा की राहें कठिन हो सकती है यह बात भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी भलीभांति जानते हैं।

इन बदली परिस्थितियों में यह चर्चा स्वभाविक ही है कि क्या पिता की ग़ैर-मौजूदगी और बदले मिज़ाज में जयंत सिन्हा की चुनावी राह कठिन होगी और क्या यदुनाथ उनकी विदाई की पटकथा को अंजाम देने में जुटे हैं। फ़िलहाल हजारीबाग क्षेत्र 2019 के चुनावी शंखनाद से पहले ही चुनावी मोड में दिख रहा है।

देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा नेतृत्व अंतिम समय में संघ के चहेते पूर्व सांसद प्रोफ़ेसर यदुनाथ को मैदान में उतारता है या चार साल पहले ही चुनावी राजनीति से अलग होने के बाद विगत 21 अप्रैल को भाजपा से अलग होने की घोषणा कर मोदी विरोध की धुरी बनने को अग्रसर हो चुके यशवंत सिन्हा के पुत्र और वर्तमान केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा को।

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