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शेरू, स्वीटी और कालू अस्पताल क्षेत्र में स्थाई रूप से निवास करते हैं। शेरू खूंखार दिखता है। जब गुस्सा आता है, तब दहाड़ता है पर बच्चों से कुछ नहीं बोलता। बच्चे भले ही उसकी पूंछ पकड़ लें, वह गुस्सा नहीं होता। अस्पताल क्षेत्र में कोई भी चोर, उठाईगीर कदम नहीं रख सकता। वह अपनी तेज नजरों से सबको देखता रहता है। कालू को शेरू का सीधापन बिलकुल अच्छा नहीं लगता। बच्चे शेरू के साथ चाहे जैसा मजाक करें, यह उसे पसंद नहीं। जब बच्चे शेरू के साथ खेलते तो वह गुर्राने लगता।

शेरू और कालू भाई हैं। उसकी माँ की मृत्यु के बाद वे अपनी बहन स्वीटी के साथ अस्पताल क्षेत्र में रहते हैं। अस्पताल बहुत बड़ा है। वहां जो लोग इलाज कराने आते, वे अपने भोजन की कुछ मात्रा इन श्वानों को डाल देते। तीनों भाई बहन मजे में रहते पर कालू कुछ नटखट था। वह अस्पताल के अंदर अवसर पाकर घुस जाता। मरीजों का खाना पोटली में जो मिलता, वह मुंह में दबाकर भाग आता। सब चिल्लाते रहते। वह एकांत जगह में बैठ अकेला मजे में दावत उड़ाता।

शेरू और स्वीटी ने उसे बहुत समझाया कि यह कुत्ता जाति को शोभा नहीं देता। हमें जो रोटी देता है, उसकी वफादारी करनी चाहिए लेकिन कालू पर कोई असर नहीं होता। वह मार भी खाता, रोता चिल्लाता, दांत दिखाता और भाग जाता पर आदत से बाज नहीं आता।
शेरू और स्वीटी भी दु:खी रहते। आज कालू कुछ अधिक उदास था। उसने देखा कि तीन लाल मुंह के बंदर अस्पताल क्षेत्र में चक्कर लगा रहे है। लोग बंदरों को चने डाल रहे हैं और बंदर मजे लेकर खा रहे हैं। कालू को लगा कि ये बंदर तो उसके पेट पर लात मारेंगे। इन्हें यहां से भगाना चाहिए।

कालू कुत्ते ने यह बात शेरू से की। शेरू समझदार था। उसने कहा तुम डरो नहीं। ये हमारे भोजन पर लात नहीं मारेंगे सबको भगवान भाग्य के अनुसार देता है। तुम्हारा भोजन तुम्हें मिलेगा। स्वीटी ने शेरू से कहा-ये जंगली प्राणी हैं। इन्हें जंगल में फल फूल पत्ती खाकर रहना चाहिए। ये यहां क्यों आ गए।

शेरू ने समझाया बहन! जंगल है कहाँ? आदमी अपनी बस्ती बढ़ाता जाता है। जंगल कटते जाते हैं तो जंगली प्राणी कहाँ जाएंगे। उन्हें शहर की ओर आना ही पड़ेगा। ये बंदर भी इसीलिए यहां आ गए हैं। इन्हें तुम्हें सहन करना ही पड़ेगा और रास्ता नहीं है लेकिन तुम देखना इनके भोजन की व्यवस्था भी प्रकृति करेगी। शेरू की बात सुनकर कालू ने मुंह बिगाड़ा।

वह समझता था कि इस तरह काम न होगा। वह हमेशा तैयार रहने लगा। जैसे ही बंदर का कोई बच्चा उसे जमीन पर दिखता, वह आक्रमण करने लगता। बंदर का बच्चा चिल्लाता और पेड़ पर चढ़ जाता। लोग इस तमाशे को देखते और हंसते। लोगों के लिए यह मनोरंजन हो गया था किन्तु शेरू और स्वीटी दुखी रहते।

उन्हें लगने लगा था कि कालू के कारण किसी दिन परेशानी होगी और एक दिन ऐसा हो गया। बंदर का बच्चा एक रोटी लेने जैसे ही जमीन पर उतरा, कालू कुत्ते ने लपक कर उसे दांतों से पकड़ लिया। बंदर के बच्चे ने बहुत दांत किटकिटाए, पंजे मारे पर व्यर्थ। कालू ने दांत उसके शरीर में गड़ाए। बंदर का स्वादिष्ट गरम रक्त उसके जबड़े को लगा और उसने अपना मुंह जोर से हिलाया। मर्मान्तक पीड़ा से बंदर चीखा।

एकत्र भीड़ ने जब कालू से बंदर के बच्चे को मुक्त कराने के लिए पत्थर मारे। कालू ने बंदर को छोड़ दिया। कालू भागा। कालू भी दस कदम ही गया होगा कि बंदरों का एक झुंड धरती पर उतर आया और चारों ओर से कालू पर आक्रमण कर दिया। कालू जमीन पर लुढ़क गया। चीखा, चिल्लाया, गिड़गिड़ाया, दुम दबाई पर बंदरों ने उसकी वह गत बनाई कि वह मुर्दा सा पड़ गया। बंदरों के झुंड के सामने कोई बचाने भी नहीं आया।

शेरू और स्वीटी भी दूर खड़े भौंकते ही रहे। ऐसा भयानक युद्ध था कि कोई बीच में पडऩा ही नहीं चाहता था। जब अधमरे कालू को बंदर छोड़कर चले गए, तब शेरू और स्वीटी उसके पास गए। शेरू ने कहा भाई मैंने कितनी बार कहा कि व्यर्थ के विवाद, झगड़े नहीं करने चाहिएं।

भाईचारे से रहो पर तुम सुनते ही नहीं। आपस में लडऩा तो चल जाता था किन्तु तुम बंदरों से व्यर्थ लड़ाई मोल ले बैठे। सब प्राणी इस धरती पर रहने के अधिकारी हैं। सबको प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। कालू ने क्षमा मांगी, बोला, आगे से मैं इस प्रकार व्यर्थ लड़ाई झगड़े से दूर रहूंगा।

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