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जुनैद, अखलाक, पहलू खान और बिलकिस बानो का कसूर केवल उनकी आस्था और उनका अल्पसंख्यक होना था। उनके संप्रदाय की पहचान के कारण उनकी हत्या हुई। उनके स्वजन उनका परिवार और देश में सांप्रदायिक सद्भाव के पैरोकार सभी मिलकर, लड़कर उन्हें न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे हैं परंतु उनकी फिर हत्या हो रही है। उनकी हत्या अबकी बार न्याय की चौखट पर हो रही है। अबकी बार भी उनके हत्यारे कईं हैं, परंतु अबकी बार वो भीड़ की शक्ल में नही अबकी बार वो पर्दे के पीेछे के एक गिरोह की शक्ल में हैं। अपने चिर परिचत अंदाज में पूरे, छल, बल, झूठ और षड़यंत्रों की अपनी ऐतिहासिक योग्यता के साथ। यही भगवा ब्रिगेड की षडयंत्रकारी राजनीति का असली ढ़ंग और रंग है। वो चेहरे पर मुखौटे लगाकर संविधान की ओट में से बार बार आयेंगे और षडयंत्र करके जुनैद, बिलकिस, अखलाक और पहलू खान को फिर से मारकर विजयी अंदाज में बेपरवाह, बेखौफ और अगली हत्या की तैयारी में फिर से लोट जायेंगे।

कोर्ट में चल रहे मामलों में और सुनाई गई सजा से बचाने में भगवा गिरोह की सरकारें किस प्रकार आरोपियों को सहायता करके बचा रही हैं, उससे उनकी नीयत और उपरोक्त सभी जघन्य अपराधों में भगवा गिरोह की संलिप्तता उजागर हो जाती है। जुनैद खान के मामले में सुनवाई कर रहे ट्रायल कोर्ट के जज ने सरकारी वकील के खिलाफ कार्रवाई के लिए कहा। जज ने कहा कि सरकारी वकील 15 वर्षीय जुनैद की हत्या के आरोपियों की सहायता कर रहा था। 25 अक्टूबर को अंतरिम आदेश में फरीदाबाद के एडीशनल जिला और सेशन जज वाय एस राठौर ने कहा कि एडवोकेट जनरल नवीन कौशिक प्रमुख आरोपी नरेश कुमार के वकील की क्रास जांच में अभियोजन पक्ष के गवाहों की सहायता कर रहे थे। कोर्ट रिकार्ड के अनुसार जज ने कहा कि दो सुनवाईयों के दौरान 24 और 25 अक्टूबर को कौशिक गवाहों को पूछे जाने वाले सवाल सुझा रहे थे। फरीदाबाद के जिला और सेशन जज ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को इस मामले को गंभीरता से देखने और वकील कौशिक के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।
ठीक इसी प्रकार की हरकत का दोहराना हम पहलू खान के मामले में भी पाते हैं। हरियाणा में डेयरी के करोबार से अपना गुजारा करने वाले 55 वर्षीय पहलू खान की तथाकथित गौरक्षकों द्वारा अलवर में 1 अप्रैल को हत्या कर दी गई। इस मामले में राज्य सरकार ने छह आरोपियों को क्लीन चीट दे डाली और अब पहलू खान का परिवार चाहता है कि इस मामले को राजस्थान से बाहर किसी दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया जाए। पहलू खान के लिए न्याय की मांग उनके परिवार को देश की राजधानी में ले आयी है। पहलू खान के सबसे बड़े बेटे इरशाद का कहना है कि उन्हें राजस्थान पुलिस की क्राइम ब्रांच की सीआईडी में कोई विश्वास नही है और वो चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में नई जांच के आदेश जारी करे। उनका कहना है कि इस मामले के आरोपी लगातार हमें धमका रहे हैं। हम बेहद भय और आतंक के माहौल में जी रहे हैं। पहलू खान के बेटे ने दिल्ली में मीड़िया से बातचीत में साफ कहा कि कैसे आरोपी उन्हें सरेआम धमकाते हैं और वकील भी रात में चैंबर में बुलाते हैं। पुलिस अधिकारी भी हमें डराते रहते हैं कि आरोपी ताकतवर हैं उनसे लड़ने तुम्हारे बस की बात नही है।

यह दोनों मामले कोर्ट की न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़ित परिवारों को डराने के हैं तो वहीं गुजरात में बिलकिस बानों में मामले में पीड़िता ने कोर्ट में अपील करते हुए बताया कि गुजरात सरकार ने किस प्रकार सजा सुनाए जाने के बाद भी आरोपी पुलिस अधिकारियों को वापस ड्यूटी पर तैनात कर दिया है। पीड़िता की वकील सुश्री शोभा ने अर्जी दाखिल करके कोर्ट को कहा कि मेरी मुवक्किल सालों से मानसिक ट्रोमा का शिकार है, पुलिस अधिकारी दोषी पाये गये परंतु वे अभी भी अपने पदों पर काम कर रहे हैं। इस अर्जी पर सुनवाई करते हुए तीन जजों की पीठ की अध्यक्षता कर रहे देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने गुजरात सरकार से पूछा कि ऐसा कैसे संभव हो सकता है, दोषी कैसे पद पर बने रह सकते हैं। कोर्ट ने गुजरात सरकार को इस पर रिपोर्ट देने के लिए कहा है।

इसके अलावा एक मामला अखलाक की हत्या का है। यह एक अलग तरह का तीसरा माॅडल है कि संघ परिवार किस प्रकार सांप्रदायिक अपराधियों को शह देता है उनका पोषण करता है। सितंबर 2015 में दादरी के बिसहेड़ा गाँव में मोहम्मद अखलाक के घर में बीफ होने के शक में कुछ युवकों ने उसके घर से निकालकर अखलाक को मौत के घट उतार दिया था। अब उन्हीं युवकों को स्थानीय भाजपा विधायक की पहल पर नौकरी दिलाकर एनटीपीसी लिमिटेड के साथ अनुबंध कराया जा रहा है। इसके लिए 9 अक्टूबर को भाजपा विधायक तेजपाल नागर ने दादरी के नेशनल थर्मल पाॅवर काॅर्पोरेशन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की ताकि उनकी भर्ती कराकर नौकरी की सुविधा प्रदान की जा सके।

जानकारी के मुताबिक, भाजपा विधायक तेजपाल सिंह नागर ने कहा है कि रविन सिसोदिया के परिवार को सरकार की तरफ से 8 लाख रुपये दिए जाएंगे और उनकी पत्नी को महीने भर के अंदर ही प्राइमरी स्कूल में टीचर की नौकरी दी जाएगी। साथ ही सरकार की तरफ से हर संभव मदद की जाएगी|

भाजपा-संघ परिवार की राजनीति का यही सच है। यह दोमुंहापन संघी राजनीति की विशेषता है, उसका मूल गुण है। प्रधानमंत्री मोदी दुनिया भर में यह बोलते हैं गौरक्षा के नाम पर हत्या नही होनी चाहिए और उसके बाद हत्या आरोपियों को बचाने और पालने की राजनीति शुरू होती है। यह केवल जुनैद, अखलाक, बिलकिस बानो अथवा पहलू खान का मामला नही प्रत्येक सांप्रदायिक घटना का सच है। यह केवल स्थानीय संघी अथवा भाजपाई नेताओं की आरोपियों के साथ हमदर्दी का मामला नही संघी योजनाबद्ध रणनीति का हिस्सा है। ऐसा नही कि दुनिया में हिंसा के खिलाफ बोलने वाले मोदी इन सब गतिविधियों से अनजान और दूर हैं। वह स्वयं इसी माॅडल का हिस्सा हैं इसी भगवा प्रशिक्षण में प्रशिक्षित हैं। 2014 के चुनाव अभियान के दौरान मुज़्ज़फ़्फ़रनगर दंगे के आरोपी संगीत सोम को जिस प्रकार मोदी की मेरठ जनसभा में सम्मानित किया गया वही संघी राजनीति का वास्तविक चेहरा है। इस सम्मान समारोह में केवल इतनी चालाकी की गई थी कि मोदी के स्टेज पर आने से पहले ही यह सम्मान कार्यक्रम पूरा कर लिया गया था। क्या मोदी को इस सम्मान समारोह की पूर्व सूचना नही थी अथवा मोदी ने बाद में इसकी निन्दा की थी? दरअसल यह सब भाजपा-संघ की राजनीति का हिस्सा है। वह संविधान की आड़ में छूपते हैं, जनवादी मूल्यों पर बड़ी बड़ी बातें करते हैं। परंतु यह वही लोग हैं जिन्होंने 1949 में पांचजन्य और आर्गेनाइजर में संविधान को भानुमति का पिटारा कहा, जिन्होंने संविधान को अंग्रेजी बैण्ड पर डांस बताया, जिन्होंने कहा कि हमारे दिलों में मनु का विधान है। देश में लोकतंत्र को आज जिनसे खतरा है उन्हें पूरा देश जानता है कि वह कौन लोग हैं बावजूद इसके जनवादी मूल्यों की बातें लोकतान्त्रिक समाज में बने रहने का तमाशा भर है। जुनैद, अखलाक, बिलकिस बानो और पहलू खान के मामलों में बेशर्मी से आरोपियों के पक्ष में खड़ा होना हमें बता रहा है कि संघी टोले की भगवा ब्रिगेड हत्या के पैरोकारों का गिरोह है|

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सामाजिक न्याय के प्रखर पैरोकार महेश राठी वरिष्ठ पत्रकार हैं| प्रमुख अखबारों, पत्रिकाओं और वेब-पोर्टल्स में उनके आलेख प्रकाशित होते रहे हैं| दिल्ली से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक अखबार मुक्ति संघर्ष के साथ जुड़े रहते हुए वे स्वतंत्र रूप से राजनैतिक, सम-सामायिक और जन-सरोकार के विषयों पर लिखते हैं| महेश राठी का लेखन निर्भीक और जमीनी पत्रकारिता का बेहतरीन उदाहरण है| जनवाद की पुरजोर पैरवी करते हुए उनकी कलम कभी सत्ता से जा टकराती है, तो कभी छद्म-राष्ट्रवाद को बेनकाब करती है| हिंद वॉच मीडिया के लिए वे नियमित रूप से लिखते रहे हैं|