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ज यानी 12 दिसंबर को वर्ष 1911 के दिन दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने का ऐलान हुआ था। तब भारत के शासक किंग जॉर्ज पंचम ने दिल्ली दरबार में इसकी आधारशीला रखी थी। बाद में ब्रिटिश आर्किटेक्ट सर हरबर्ट बेकर और सर एडविन लुटियंस ने नए शहर की योजना बनाई थी। इस योजना को पूरा करने में दो दशक लग गए। इसके बाद 13 फरवरी 1931 को आधिकारिक रूप से दिल्ली देश की राजधानी बनी। ब्रिटिश राज के सबसे बड़े तमाशे दिल्ली दरबार में पहली बार किंग जॉर्ज पंचम अपनी रानी क्वीन मैरी के साथ मौजूद थे। उन्होंने अस्सी हजार लोगों की मौजूदली में घोषणा की, हमें भारत की जनता को यह बताते हुए बेहद हर्ष होता है कि सरकार और उसके मंत्रियों की सलाह पर देश को बेहतर ढंग से प्रशासित करने के लिए ब्रिटिश सरकार भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करती है।

(उस भव्य समारोह का दृश्य, जिसमें दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने की घोषणा हुई थी) (तस्वीर : दिल्ली स्टेट आर्चिव से साभार)

तब दिल्ली बहुत पिछड़ी थी। बॉम्बे, कलकत्ता और मद्रास जैसे महानगर हर बात में काफी आगे थे। यहां तक कि लखनऊ और हैदराबाद भी दिल्ली से बेहतर माने जाते थे। दिल्ली की महज तीन फीसदी आबादी अंग्रेजी पढ़ पाती थी। यही कारण है कि विदेशी भी बहुत कम आते थे। तब दिल्ली में पेट्रोल तीस पैसे लीटर था। लेकिन वाहन तेजी से चलाने पर सौ रुपए तक अर्थदंड वसूला जाता था। यह तेज गति थी 19 किमी प्रति घंटा। दिल्ली में बर्मा ऑइल कंपनी पेट्रोल बांटती थी। किंग जॉर्ज पंचम के उस दौरे के बाद से पोस्ट ऑफिस से फोन कॉल करने की सुविधा मिली थी। हालांकि चुनिंदा रईस लोग ही फोन लगाते थे, लेकिन खास बात यह थी कि तब फोन कॉल्स घड़ी देखकर होते थे। बातचीत का तीसरा मिनट शुरू होने का मतलब था कि अगले 60 सेकंड में बात खत्म करके कॉल कट करना होगा। तीन मिनट के कॉल के चार आने यानी 25 लगते थे।

1911 में हुए दिल्ली दरबार का ये वो दौर था जब अंग्रेज़ों का विरोध शुरु हो चुका था और कलकत्ता इन गतिविधियों का गढ़ बन रहा था। स्वराज की सुगबुगाहट के बीच किंग जॉर्ज पंचम ने भारत की जनता से सीधा रिश्ता कायम करने की नज़र से अपने राज्याभिषेक के लिए दिल्ली दरबार सजाया। लेकिन एक तीर से दो निशाने साधते हुए इस अवसर पर दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित करने का निर्णय अंतिम समय तक एक राज़ रखा गया।

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