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ज दो महत्वपूर्ण आरटीआई का जिक्र करना इसलिए जरुरी है क्यूंकि देश 72वें स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाने जा रहा है। यह कोई मामूली बात नहीं है कि हमारे देश को आज़ाद हुए सात दशक से भी ज्यादा समय हो गया है। अलग-अलग हुकूमतों ने इस देश को चलाने का अपना तरीका अपनाया। कांग्रेसी सरकारों ने सबसे ज्यादा समय के लिए शासन किया। गैर कांग्रेसी सरकारें भी कई बार सत्ता पर काबिज हुईं। भारत के इतिहास में जिस तरह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को आपातकाल या पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए याद किया जायेगा, उसी तरह वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अचानक पूरे देश में नोटबंदी लागू करने के लिए भी याद किया जाएगा।

नोटबंदी के लाभ और हानि पर अलग-अलग तरह से चर्चाएँ होती रही हैं। अब तो मुख्यधारा की मीडिया में नोटबंदी के विश्लेषण के लिए कोई जगह बची हो, ऐसा दिखाई नहीं देता है। सरकार और मीडिया दोनों नोटबंदी को इस तरह से पेश कर रहे हैं जैसे अचानक देश में लागू कर दी गयी नोटबंदी किसी पुरानी बिमारी को ठीक करने वाली कड़वी दवा हो, जिसका स्वाद आपको पसंद हो या ना हो आपको बिमारी भगाने के लिए इसे पीना ही पड़ेगा। इस कड़वी दवाई ने बिमारी को कितना ठीक किया, इस पर चर्चा के लिए मीडिया में स्थान सिकुड़ता जा रहा है।

जब नोटबंदी के सौ दिन पूरे हो गए थे तब अनेक व्यक्तियों और संस्थाओं ने इसका विश्लेषण किया था। उस समय भी देश में नकदी की भारी कमी बनी हुई थी। आज भी हालात कुछ बदले नहीं हैं। एटीएम में कैश की कमी अभी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। नकली नोटों का भारी मात्रा में पकड़ा जाना अब भी जारी है और कालेधन की जमाखोरी बड़े पैमाने पर नई मुद्रा में शुरू हो गयी है। अनेक प्रसिद्द अर्थशास्त्री भारत सरकार के नोटबंदी के फैसले को एक गैर-जिम्मेदाराना कदम बता चुके हैं लेकिन सरकारी तंत्र इसे एक ऐतिहासिक कदम और कालाधन पर सर्जिकल स्ट्राइक बता रहा है।

देशभर में 150 से ज्यादा मौतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नोटबंदी के कारण हुई हैं। बैंकों की लंबी-लंबी लाईनों में धक्का-मुक्की करते हुए हर्ट अटैक से या भूखे बच्चों की बेबसी देखकर आत्महत्या करने की वजह से, देश भर में 150 से ज्यादा नागरिकों ने नोटबंदी के बाद अपनी जान गवायीं। सरकार इन मौतों की वजह नोटबंदी को मानने से इनकार करती रही है। हैरत की बात तो यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि नोटबंदी के दौरान इस देश में कोई मौत भी हुई है? मैंने सूचना के अधिकार के तहत पीएमओ से पूछा था कि नोटबंदी के दौरान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नोटबंदी के कारण देश में कितने नागरिकों की बैंक की लाईनों में, हर्ट अटैक या आत्महत्या आदि वजहों से मृत्यु हुई है? साथ में यह भी पूछा था कि केंद्र या राज्य सरकार ने नोटबंदी की वजह से मरने वाले नागरिकों के कितने परिवारों को मुवावजा दिया गया है? जवाब में यह कहा गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय के रिकॉर्ड में ऐसी कोई सूचना उपलब्ध नहीं है कि नोटबंदी के माध्यम से देश में कितने नागरिकों की मौतें हुईं हैं।

वहीं दूसरी आरटीआई अनिल गलगली की है जिसमें यह तथ्य उजागर हुआ है कि पिछले चार सालों में मोदी सरकार ने विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के लिए विज्ञापन पर 4,343.26 करोड़ रूपये खर्च किए हैं। यह आंकड़े तीन महीने पुराने हैं और इसमें विज्ञापनों पर खर्च की गयी ताजा रकम शामिल नहीं है। अहम सवाल यह है कि जिन मीडिया घरानों को विज्ञापन के लिए सरकारी खजाने से इतनी बड़ी रकम दी जा रही है उन मीडिया चैनलों और अखबारों में नोटबंदी से हुई मौतों और नोटबंदी से  देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों के विश्लेषण के लिए कोई जगह क्यूँ नहीं है?

बहरहाल, यह सच है कि जब पूरा देश टेलीविजन स्क्रीन पर प्रधानमंत्री को लाल किले की प्राचीर से 72वें स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराते हुए देख रहा होगा, उस समय देश में 150 से ज्यादा ऐसे परिवार भी होंगें जिनके घरों में नोटबंदी के फैसले से फैले अन्धकार में स्वतंत्रता दिवस की सुबह बेरंग और उदासी भरी होगी।

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