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फ़िल्म का नाम : वोदका डायरीज
हिंद वॉच मीडिया रेटिंग : दो स्टार 
बैनर : के’ स्कोप एंटरटेन्मेंट प्रा.लिमिटेड, विशालराज फिल्म्स एंड प्रोडक्शन प्रा.लिमिटेड
सेंसर सर्टिफिकेट : U/A
जॉनर : साइकोलॉजिकल थ्रिलर
अवधि : 1घंटा, 58मिनट
निर्देशक : कुशल श्रीवास्तव
लेखक : वैभव बाजपेयी, मनीषा कोरडे, सचिन विनोद मोदी और कुशल श्रीवास्तव
एडिटर : अलाप मजगावकर
संगीत : सन्देश सान्डिल्य, हैरी आनंद और परवाज़
कलाकार : के.के. मेनन, मंदिरा बेदी, राइमा सेन, शारिब हाशमी और ऋषि भूटानी

‘वोदका डायरीज’ शुरू होती है और एसीपी अश्विनी दीक्षित (के.के. मेनन) मनाली की बर्फीली वादियों में बर्फ के ऊपर बेतहासा भागे जा रहे हैं| दर्शकों को इस सीन से थ्रिल और रोमांच का आश्वासन मिलता है| यह दर्शकों का मूड सेट करने के लिए टॉप एंगल से लिया गया फिल्म का सबसे बेहतरीन और जमा के लिया गया सीन है| यूँ तो हर सीन जमा कर ही लिया जाना चाहिए| अश्विनी दीक्षित के दु:स्वप्न का एक सीन बहुत प्रभावी है, जिसमें बोतल से उनके ऊपर हमला होता है और वे बदहवास होकर खुद को बचाने की कोशिश करते हैं|

अश्विनी दीक्षित की पत्नी शालिनी (मंदिरा बेदी) कवियित्री हैं और जैसा कि कवियों के साथ स्वाभाविक रूप से होता है, वे कविता सुनाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती हैं| इधर एसीपी का दिमाग हमेशा अपराध की गुत्थी सुलझाने में लगा रहता है| इन दोनों की बातचीत साहित्य और अपराध को एक साथ रख कर रोचक बनाया गया है, अच्छा प्रयोग है|

अधिकांश फिल्मों में अमूमन होता ये है कि पुलिसवाले को अपने काम से फुरसत ही नहीं मिलती और वो अपनी पत्नी को समय नहीं दे पाता है| वह प्यार की प्यासी, भरी हुई बैठी रहती है और बार-बार फोन करती रहती है; जैसे ही पति को देखती है, उसके ऊपर चढ़ बैठती है| यहाँ पत्नी को जब भी मौका मिलता है, कविता सुनाने लगती है| है न यहाँ पटकथा में नयापन| लेकिन एसीपी अपने केस में जैसे ही किसी खास नतीजे पर पहुँचने वाला होता है कि उसकी बीबी का फोन आ जाता है| वहीँ कभी वह मुश्किल में फँस जाता है और उसे कुछ समझ में नहीं आता है कि क्या करे तो उसका सहायक अंकित (शरिब हाशमी) अचानक से आ जाता है|

मार्टिन स्कॉर्सिस की फिल्म ‘शटर आइलैंड’ (2010) में लियोनार्दो डिकैप्रियो का सहायक मार्क रफैलो भी ऐसे ही आता है| इस फिल्म की प्रेरणा यहीं से ली गयी लगती है| दोनों ही फिल्मों की कहानी का मर्म (crux) एक ही है|

एसीपी अश्विनी दीक्षित और उनकी पत्नी जैसे ही छूट्टी बिताकर लौटते हैं, एक लड़की का मर्डर हो जाता है| अश्विनी दीक्षित और उनके सहायक को वोदका डायरीज नाम के एक क्लब का सुराग मिलता है| वे जाँच कर ही रहे हैं कि इसी दौरान एक के बाद दूसरे कई और मर्डर सामने आते हैं| इन सारी हत्याओं के सूत्र कहीं न कहीं वोदका डायरीज से जुड़ते हैं| एसीपी को हत्याओं के मामले में रोशनी बैनर्जी (राइमा सेन) का रस्यमयी और धमकी भरा फोन आते रहता है| एक दिन एसीपी को सारी लाशें चलती हुई मिलती हैं और उसकी पत्नी गायब हो जाती है| फिल्म की पूरी कहानी अश्विनी दीक्षित के व्यक्तित्व की कहानी है| यह उनकी काया में अन्दर-बाहर आती जाती है और आस-पास चलती है| फिल्म का अंत बेहद चौंकाने वाला है|

विज्ञापन से फिल्मों में आये कुशल श्रीवास्तव की यह पहली फिल्म है| उनका काम अच्छा है| उनके पास अगर अच्छी पटकथा हो तो वे अच्छी फिल्म बना लेंगे| उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि हैं, के|के| मेनन| फिल्म का संवाद मनीषा कोरडे, सचिन विनोद मोदी और कुशल श्रीवास्तव ने मिलकर लिखा है जो अच्छा बन गया है| मनीष चन्द्रा को छायांकन (cinematography) का जितना मौका मिला है, उन्होंने ठीक ही किया है| मनाली का सुविधाजनक लोकेशन, सुविधानजनक कहानी, सुविधाजनक किरदार, साथ देने वाले कलाकार| ये लो बन गयी फिल्म| कितना सुरक्षित खेल खेला है कुशलजी आपने, अरे अपने पैशन और दर्शकों के लिए कुछ तो रिस्क ले लेते| लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि आप एक चतुर निर्माता हैं|

यह बहुत उम्मीद बंधाता है कि के|के| मेनन जैसे अभिनेता भी हमारी इंडस्ट्री में हैं| वोदका डायरीज पूरी तरह से उनके कन्धों पर खड़ी है| हमेशा की तरह उनका अभिनय जानदार है और वे बहुत गहरा प्रभाव छोड़ते हैं| कहीं-कहीं तो अपने अभिनय से अभिभूत कर देते हैं, विश्व स्तरीय मानकों पर खरा| यह फिल्म उनके अभिनय के लिए ज़रूर देखी जानी चाहिए|

मंदिरा बेदी बहुत खुबसूरत कवियित्री के किरदार में हैं| अपनी कविताओं से ज्यादा अपनी अदाओं से लुभाती हैं| उनकी अदाएँ ऐसी हैं कि आम इन्सान की औकात ही क्या, विश्वामित्र भी पिघल जायें| शारिब हाश्मी अच्छे अभिनेता हैं और फिल्मिस्तान में लोगों ने उनके काम को पसंद किया था| अपना काम उन्होंने लगन से किया है| उनका किरदार ठीक से उभर नहीं पाया है| कॉमेडी घुसेड़ने के चक्कर में उनका अभिनय और कहानी दोनों प्रभावित हुए हैं|

एक मजेदार बात यह है कि हमारे लेखकों को सब पता होता है, लेकिन उसे यह भी पता होना चाहिए कि कहानी केवल कहानीकार की नहीं होती पात्रों की भी होती है| किरदार भी अपना भाग्य लिखता है| मंदिरा बेदी अमीर खुसरो की लाइन ऐसे पढ़ती हैं, जैसे उनकी ही प्रतिभा का कमाल हो| राइमा सेन ने अपने किरदार को ठीक से निभाया है, उनका जितना काम है उन्होंने अच्छा किया है| अश्विनी दीक्षित के अलावा दूसरे पात्र भी उभरते तो फिल्म और मजेदार होती|

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि थ्रिलर के मामले में हमने विदेशियों की प्रतिभा के सामने घुटने टेक दिया है| कोई प्रतिभावान लेखक हिन्दुस्तान के किसी गाँव या शहर के किसी कोने में पड़ा होगा, उसे पूछता कौन है? आओ प्यारों! बॉलीवुड वालों! मिलजुलकर हम वोदका पीयें और किसी दूसरे मार्टिन स्कॉर्सिस की खोज करें|

फिल्म के ऑफिसियल ट्रेलर को देखने के लिए इस लिंक को क्लिक करें :

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