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आज तक जितनी भी सरकारी रोजगार योजना बनी हैं सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गयी हैं। युवाओं को रोजगार मिलने की बात तो दूर बेरोजगारी और ज्यादा बढ़ी है। फिर भी सरकार है कि किसी भी तरह से आंकड़ों की बाजीगरी कर कपनी पीठ थपथपा लेती है।

अपने चार साल के कार्यकाल में प्रतिवर्ष एक करोड़ लोगों को नौकरी नहीं देने के वादे पर चौतरफा वार झेल रही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अब स्वरोजगार पाए लोगों का आंकड़ा भी रोजगार पाए लोगों की सूची में शामिल करने पर विचार कर रही है।

ऐसा करने के पीछे सरकार की होशियारी देखिए कि इस से अगर ऐसा होता है तो पिछले चार साल में नौकरी पाने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक इजाफा हो सकता है।

इसके लिए केंद्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के जरिए ऋण लेकर स्वरोजगार करने वालों का आंकड़ा जोड़ने पर विचार किया जा रहा है।

बता दें कि श्रम ब्यूरो जो रोजगार पर आंकड़े जारी करता है, श्रम मंत्रालय के अधीन काम करता है। माना जा रहा है कि अगले साल यानी 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले मोदी सरकार श्रम ब्यूरो के आंकड़ों को लोगों के सामने रखकर अपनी पीठ थपथपाई करेगी।

आंकड़े के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 में कुल 4 लाख 16 हजार लोगों के लिए रोजगार सृजन हुआ है।

इनमें से 77 हजार पहली तिमाही में, 32 हजार दूसरी तिमाही में, 1 लाख 22 हजार तीसरी तिमाही में और 1 लाख 85 हजार चौथी तिमाही में रोजगार सृजन हुआ।

यह तो वही बात हुई कि किसी चैनल के दफ्तर के बाहर पकौड़े बेचने वाले को रोजगार संख्या में शामिल करके आंकड़े सरकार में हित में बनाये जा रहे हैं। भले ही पकौड़े वाला आने दो जून की रोटी भी न कमा पाता हो। कल को किसी भिखारी को अच्छी भीख पाते देख उसे भी रोजगार का नाम न दे दे सरकार।

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