फिल्म : तुम्हारी सुलु Tumhari Sulu
लेखक-निर्देशक : सुरेश त्रिवेणी
सहायक लेखक : विजय मौर्य 
जॉनर (शैली) : फैमिली ड्रामा 
कलाकार : विद्या बालन, मानव कौल, नेहा धूपिया
अवधि : 2 घंटा 20 मिनट
सर्टिफिकेट : U
निर्माता : टी सीरिज/ इलिप्सिस एंटरटेनमेंट
हिंद वॉच मीडिया रेटिंग : 

शुद्ध मनोरंजन के लिए बनायी गयी एक संतुलित फ़िल्म है| रोजमर्रा के टुकड़ों से बनी होने के बावजूद, यह बॉलीवुड की चक्की से निकली अधिकांश फिल्मों से थोड़ा अलग हो जाती है| हालाँकि हिन्दी सिनेमा की प्रवृतियाँ तेजी से बदली हैं| सिनेमा का एक बड़ा दर्शक वर्ग मनोरंजन चाहता है| ‘तुम्हारी सुलु’ यह काम बखूबी करती है| इसकी कहानी किरदार पर आधारित है, जैसा कि फ़िल्म के नाम से ही पता चल जाता है| फ़िल्म का ट्रेलर देखकर आप कहानी का अनुमान लगा सकते हैं| विद्या बालन और मानव कौल ने जिस तरह से सुलु और अशोक के किरदार को आत्मसात किया है, उससे यह फ़िल्म ‘मस्ट वॉच’ हो जाती है| विद्या बालन का अभिनय सहज है| इतना सहज कोई कलाकार तभी हो पाता है, जबकि वह अपने किरदार के साथ रच-बस जाता है| वह अभिनय करता है और उसे करते हुए देख भी पाता है| मानव कौल भी उतने ही सहज हैं| उनकी प्रतिभा आपको अचंभित करती है| वे अभिनय की हर ऊँचाई को छूने के लिए बने हैं| ऐसे हीरे थिएटर (नाटक) से ही आते हैं| वे मझे हुए अभिनेता के साथ लेखक और निर्देशक भी हैं| फ़िल्म पूरी तरह से विद्या बालन और मानव कौल के परफॉर्मेंस पर टिकी है| नेहा धूपिया अच्छी अभिनेत्री हैं| कंपनी की मालकिन और विद्या बालन के बॉस के रोल में उन्होंने रंग जमा दिया है| उनका काम प्रशंसनीय है| विजय मौर्य ने मज़बूरी में समझौता किये एक क्रन्तिकारी कवि की भूमिका के साथ न्याय किया है|

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मुंबई के उपनगर विरार की रहने वाली सुलु अपनी ज़िन्दगी में कुछ करना चाहती है, कुछ बनना चाहती है| उसे पता नहीं है कि क्या बनना है? वह सोसाइटी के छोटे-छोटे कॉन्टेस्ट में भाग लेती है| वह निम्बू-चम्मच रेस में दूसरे नंबर पर आती है| वह घर का काम करते हुए रेडियो वॉव (Wow) सुनती है| रेडियो वाव के कॉन्टेस्ट में वह कुकर जीतती है| रेडियो वॉव में रात के शो के लिए आर|जे| की जगह खाली है| इंटरव्यू में बहुत आत्मविश्वास के साथ सुलु कहती है, ‘मैं कर सकती है|’ उसके बॉस को सुलु का यह अंदाज़ बहुत पसंद आता है| दरअसल ‘मैं कर सकती है’ यह डायलॉग सुलु ही नहीं फ़िल्म की आत्मा है| भारतीय संस्कृति में शब्द को ब्रह्म कहा गया है और यह इस फ़िल्म का ब्रह्मवाक्य है| वह वॉइस-टेस्ट में पास हो जाती है| बारहवीं फेल होते हुए भी उसे अपनी आवाज़ की बदौलत नौकरी मिल जाती है| यह कहानी का पहला प्रस्थान बिंदु (प्लॉट पॉइंट) है| यहाँ आकर डंका बजाकर नारी सशक्तिकरण का नारा लगाने वाली फिल्मों से यह बहुत आगे निकल जाती है|

सुलु का पति अपनी नौकरी से त्रस्त है| वह सुलु प्यार ही प्यार करता है, इतना प्यार की वह उसे गाय बुलाती है| यह अकाट्य यथार्थ है कि अधिकांश पुरुष गाय होते हैं| अशोक अपनी पत्नी का पैर दबाता है| सेंसर बोर्ड को कोई आपत्ति नहीं है, उसने इस फ़िल्म को ‘यू’ सर्टिफिकेट दिया है|

सुलु का ‘साड़ीवाली भाभी लेट नाइट शो’ शुरू होता है| वयस्कों को सविता भाभी की याद आ जाएगी| यह नाम उसी तर्ज पर है| सुलु सेक्सी-मखमली आवाज़ में लोगों के दिलों पर मलहम लगाती है और फरमाईशी गाने सुनाती है| मेरी जानकारी में ऐसा किसी भी एफ|एम| चैनल पर कोई भी एंकर नहीं करता है| ऐसा डेटिंग साइट्स पर होता है| हिन्दी सिनेमा है सेक्स का तड़का तो चाहिए ही| या तो नायक-नायिका को नचाओ, नहीं तो आइटम डांस दिखाओ| सेक्स का तड़का लगते ही हमारी चेतना सही काम करने लगती है| लेकिन यही समय है जब अशोक की चेतना लौटती है| वह प्रतिवाद करता है|

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महानगरों में रहने वाले न्युक्लियर फेमिली की एक बड़ी समस्या है कि वह अपने बच्चों को ग़लत रास्ते पर जाने और किसी शैतान का शिकार होने से बचाए| अधिकांश मध्यवर्गीय परिवारों में पति-पत्नी दोनों ही काम करते हैं| फिर बच्चों में तो जन्मजात प्रतिभा होती ही है और वे कोई भी प्रयोग कर सकते हैं| तुम्हारी सुलु में आप देखेंगे कि कैसे अशोक और सुलु दिन- रात अपने काम में लगे रहते हैं और उनका बेटा स्कूल में एक अनोखा बिज़नेस शुरू कर देता है| क्या सुलु  इन संघर्षो के बीच अपने सपनों को पूरा कर पाती है?

फ़िल्म का संगीत पक्ष अच्छा है| एक गाना, जो जो आपसे साझा करना है, वो ये है…
“कैसे कैसे धागों से बुनी है ये दुनियाँ,
कभी धुप, कभी बादलों की ये लड़ियाँ,
कुछ तूने सी हैं, मैंने की हैं रफ्फू, ये डोरियाँ”


इसे रोंकिनी गुप्ता ने गाया है और शान्तनु घटक ने गाना लिखा भी है और कंपोज भी किया है| फ़िल्म के स्क्रीनप्ले के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि घी का लड्डू है, टेढ़ा भी हो तो स्वादिष्ट ही लगता है|


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सिनेमा में गहरी रूचि और समझ रखने वाले विनोद सिंह एक स्वतंत्र पत्रकार हैं| मायानगरी मुंबई में रहकर वे हिंद वॉच मीडिया के लिए नियमित तौर पर सिनेमा से जुड़े विषयों पर लिखते रहे हैं| उनकी फिल्म समीक्षा पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय है| विनोद सिंह हिंद वॉच मीडिया संपादक मंडल के सदस्य होने के साथ-साथ सिनेमा सेक्शन के उप-संपादक भी हैं| सरल भाषा और सपाट बयानी उनकी लेखनी को विशिष्ट पहचान देती है| हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रही है| साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करती है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|