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हिंद वॉच मीडिया ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर “आज़ादी की दीवानी तीन महिलाएं” शीर्षक से एक वीडियो जारी कर दुनियां की महिलाओं के प्रति सम्मान व्यक्त किया है|  हिंद वॉच के यू ट्यूब चैनल पर अपलोड किया गया यह वीडियो में भारत में लड़कियों की शिक्षा की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले, उनकी सहयोगी फ़ातिमा शेख़ और आज़ाद हिंद फौज में सुभाष चन्द्र बोस की सहयोगी कैप्टन लक्ष्मी सहगल की जीवनी पर आधारित है| इस वीडियो में ब्रिटिश हुकूमत के दौर में दासता के खिलाफ खड़ी होने वाली इन तीन महिलाओं के जीवन गाथा को विस्तार से दिखाया गया है,  जिनके संघर्षों की बदौलत देश को सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से ही आज़ादी नहीं मिली बल्कि महिलाओं को सामाजिक दासता से भी मुक्ति मिल गयी|

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर “आज़ादी की दीवानी तीन महिलाएं” शीर्षक से जारी इस वीडियो को देखने के लिए इस लिंक को क्लिक करें :

भारत में लड़कियों की शिक्षा की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले, उनकी सहयोगी फ़ातिमा शेख़ और आज़ाद हिंद फौज में सुभाष चन्द्र बोस की सहयोगी कैप्टन लक्ष्मी सहगल की संक्षिप्त जीवनी :

सावित्री बाई फुले

आज भारत में स्त्रियाँ पढ़-लिखकर हर क्षेत्र में कामयाबी का झंडा  लहरा रहीं हैं  लेकिन बहुत कम महिलायें जानतीं हैं कि यह किनके बदौलत संभव हो पाया है। सावित्रीबाई फुले जिन्हें प्यार से लोग सावित्री ताई पुकारते हैं। अगर उन्होंने लड़कियों की शिक्षा का बीड़ा नहीं उठाया होता तो आज भी भारत में लड़कियों को पढ़ाई -लिखाई से दूर ही रखा जाता था। सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। उनका विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था जो खुद एक बड़े समाज सुधारक थे।

सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की स्थापना की। उन्होंने ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं को शिक्षित बनाना। वे एक कवियत्री भी थीं और मराठी में कविताएँ लिखतीं थीं।

उस कठिन दौर में दकियानूस समाज लड़कियों को शिक्षित नहीं करना चाहता था। जब सावित्रीबाई लड़कियों को पढ़ाने स्कूल जाती थीं, तो विरोधी लोग पत्थर मारते थे। उस समय बालिकाओं के लिए स्कूल खोलना किसी पाप से कम नहीं माना जाता था लेकिन इतनी चुनौतियों के बावजूद देश का पहला बालिका विद्यालय सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे में स्थापित किया और उसका संचालन भी खुद किया।

जब सावित्री ताई बालिकाओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फेंका  करते थे। सावित्री ताई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं।

10 मार्च 1897 को प्लेग के कारण सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। प्लेग महामारी में वे मरीज़ों की सेवा करती थीं और सेवा के दौरान संक्रमण के कारण ही उनकी मृत्यु हो गयी।

हमें कहते हुए गर्व होता है कि सावित्री ताई पूरे विश्व की महानायिका हैं।

फातिमा शेख

फ़ातिमा शेख़ सावित्रीबाई फुले की सहयोगी थीं। जब ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने लड़कियों के लिए स्कूल खोलने का बीड़ा उठाया, तब फ़ातिमा शेख़ ने भी इस मुहिम में उनका साथ दिया।

यह वो ज़माना था जब भारत में लड़कियों को पढ़ाया नहीं जाता था। उस समय अध्यापक मिलना भी मुश्किल होता था।  फ़ातिमा शेख़ ने सावित्रीबाई के स्कूल में पढ़ाने की ज़िम्मेदारी संभाली। इसके लिए उन्हें समाज के विरोध का भी सामना करना पड़ा।

फुले के पिता ने जब दलितों और महिलाओं के उत्थान के लिए किए जा रहे उनके कामों की वजह से उनके परिवार को घर से निकाल दिया था, तब फ़ातिमा शेख़ के बड़े भाई उस्मान शेख़ ने ही उन्हें अपने घर में जगह दी।

फ़ातिमा शेख़ और उस्मान शेख़ ने ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई को उस मुश्किल समय में बेहद अहम सहयोग दिया था।

लेकिन अब बहुत कम ही लोग उस्मान शेख़ और फ़ातिमा शेख़ के बारे में जानते हैं।

कैप्टन लक्ष्मी सहगल

डॉक्टर लक्ष्मी सहगल का जन्म 1914 में हुआ और उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से मेडिकल की शिक्षा ली। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब जापानी सेना ने सिंगापुर में ब्रिटिश सेना पर हमला किया तो लक्ष्मी सहगल सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गईं थीं।

वे बचपन से ही राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित हो गई थीं और जब महात्मा गाँधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन छेड़ा तो लक्ष्मी सहगल ने उसमे हिस्सा लिया। वे 1943 में अस्थायी आज़ाद हिंद सरकार की कैबिनेट में पहली महिला सदस्य बनीं।

आज़ाद हिंद फ़ौज की रानी झाँसी रेजिमेंट में लक्ष्मी सहगल बहुत सक्रिय रहीं। बाद में उन्हें कर्नल का ओहदा दिया गया लेकिन लोग उन्हें प्यार से कैप्टन लक्ष्मी ही कहते हैं।

आज़ाद हिंद फ़ौज की हार के बाद ब्रिटिश सेनाओं ने स्वतंत्रता सैनिकों की धरपकड़ की और 4 मार्च 1946 को वे पकड़ी गईं ।

लक्ष्मी सहगल ने 1947 में कर्नल प्रेम कुमार सहगल से विवाह किया और कानपुर आकर बस गईं। लेकिन उनका संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ और वे वंचितों की सेवा में लग गईं। वे भारत विभाजन को कभी स्वीकार नहीं कर पाईं और अमीरों और ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई का हमेशा विरोध करती रही हैं।

वामपंथी राजनीति की ओर लक्ष्मी सहगल का झुकाव 1971 के बाद से बढ़ने लगा था। वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की संस्थापक सदस्यों में से हैं।

भारत सरकार ने उन्हें 1998 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया। कानपुर के एक अस्पताल में 23 जुलाई 2012 को उनका निधन हो गया।

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