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फिल्म : थॉर: रैग्नारॉक
कलाकार : क्रिस हेम्सवर्थ, केट ब्लैंचेट, टॉम हिडलस्टन, मार्क रूफैलो, इदरिस अल्बा, एंथनी हॉपकिंस और जेफ गोल्डब्लम
निर्माता : मार्वल स्टुडियो
निर्देशक : टाइका वैटिटी
संगीत : मार्क मदर्सबौघ
जॉनर(शैली) : साइंस फिक्शन
अवधि : 2 घंटे, 15 मिनट
हिंद वॉच मीडिया रेटिंग: 

यूरोप के मिथकों और दंतकथाओं से थॉर, हेला और हल्क जैसे चरित्रों की उत्पत्ति हुई है| यहाँ कथाओं पर आधारित चरित्र नहीं बल्कि चरित्रों पर आधारित कथाएँ हैं| ये चरित्र विशालकाय हैं, जैसे कि ‘तूफान का देवता’ और ‘मौत की देवी’| कहानी का आधार वही है जो बाबा अरस्तू के समय में भी वैसा ही था| एक तरफ शैतान है और दूसरी तरफ मसीहा| अच्छाई और बुराई में अच्छाई की जीत| फिर थॉर रैग्नारॉक में ऐसा खास क्या है जो पूरी दुनिया में इसे पसंद करने वाले लोग हैं| एक तो यह कि मानव जाति की मिथकों और दंतकथाओं में हमेशा से दिलचस्पी रही है, जो इस फ़िल्म का आधार है| फ़िल्म बनने से पहले मार्वल कॉमिक्स में इन चरित्रों को बेहद पसंद किया गया| ये चरित्र वहाँ के लोगों में रचे-बसे हैं| जैसे हमारे मन में हनुमान जी अपनी गदा के साथ अवतरित होते हैं, वैसे ही थॉर उनके यहाँ हथौड़ा लेकर आता है| हमने उन्हें देवता की प्रतिष्ठा भी दी है| पूजा भी करते हैं| पूरी दुनिया की पौराणिक कथाएँ और मनुष्यों की भावनाएँ काफी हद तक मिलती-जुलती हैं| यही कारण है कि थॉर के चरित्रों से हम जुड़ जाते है| उनके सुख-दुःख और विजय-पराजय हमारे हो जाते हैं|

थॉर रैग्नारॉक में माइथोलॉजी के साथ वर्तमान समय का नैरेशन (कहानी का अंदाज़-ए-बयाँ) और डायलॉग रखा गया है| बाकी का कसर पूरा करने के लिए साइंस फिक्शन तो है ही| फ़िल्म साइंस फिक्शन जॉनर की है| ग्राफिक्स, वीएफएक्स, सिनेमेटोग्राफी और 3 डी से फ़िल्म हमारी काल्पनिक दुनिया को और जीवंत बना देती है| मनुष्य शारीरिक रूप से भले ही कमज़ोर हो लेकिन कल्पना उसकी सबसे बड़ी शक्ति है| हमारे सौंदर्यबोध की गुणवत्ता हमारी कल्पनाशीलता पर निर्भर होती है| थॉर का पूरा एस्थेटिक्स (सौंदर्यशास्त्र) हमें अपनी गिरफ़्त में ले लेता है| फिर हम एक बार, दो बार, अपने दोस्तों के साथ और अपने परिवार के साथ फ़िल्म देखने जाते हैं| हमारी अपनी दुनिया जिसे हम ठीक से जीने लायक नहीं बना पाये हैं, उससे अलग तीन घंटे के लिए एक काल्पनिक दुनिया में जाकर हमें राहत मिलती है|

रैग्नारॉक ‘नॉर्स’ की माइथोलॉजी का शब्द है, जो हिन्दुओं के प्रलय, मुस्लिमों के कयामत और ईसाईयों के ‘डूम्स डे’ की तरह ही है| इस कहानी में इन्सान ही नहीं देवताओं का भी अंत हो जाता है| यह माइथोलॉजी यूरोप में प्रचलित है| फ़िल्म का आईडिया यहीं से लिया गया है| ब्रह्माण्ड के दूसरे छोर पर थॉर की सर्टर के साथ लड़ाई से फ़िल्म की कहानी शुरू होती है, जहाँ से वह सर्टर का मुकुट लेकर अपने ग्रह एस्गार्ड पर आता है| यहाँ उसका भाई लोकी राजा बना हुआ है और एक अच्छे बेटे की तरह अपने पिता को पृथ्वी के किसी वृद्धाश्रम में पहुंचा दिया है| थॉर लोकी को लेकर अपने पिता के पास पृथ्वी पर आता है| यहाँ आकर लोकी गायब हो जाता है| थॉर का अपहरण एक माफिया किस्म का रिंग मास्टर करवा लेता है|

इधर एस्गार्ड पर थॉर की बड़ी बहन हेला का राज कायम हो जाता है| एस्गार्ड पर खलनायिका ‘मौत की देवी’ हेला की शक्ति अपरम्पार है| कोई भी शक्ति उसका मुकाबला नहीं कर सकती है| चारों तरफ कहर ही कहर, मौत ही मौत और आतंक ही आतंक| नायक थॉर के प्रचंड हथौड़े को हेला किसी बच्चे के खिलौने की तरह मसल कर चकनाचूर कर देती है| अब क्या होगा? क्या थॉर, हल्क, लोकी और उनके दोस्त एस्गार्ड को हेला से बचा पाएँगे? इसका जवाब आपको फ़िल्म देखने के बाद ही मिलेगा|

लोगों के चहेते हल्क और थॉर के एक्शन सीन देखने लायक हैं| पर्दे पर एक सीन में दोनों की उपस्थिति बहुत अच्छी लगती है| दोनों सुपर पावर का दोस्ताना संबंध और हल्क का आठ- दस साल के छोटे बच्चे जैसा रूठना| थॉर का बाल कटवाने के लिए बच्चे जैसा चिल्लाना| सच है सुपरमैन तो हम मैन (man) से भी ज़्यादा मानवीय होता है| ग्रैंडमास्टर बने जेफ़ गोल्ड ब्लम ने अभूतपूर्व अभिनय किया है| उनकी एक्टिंग बियॉन्ड टेक्स्ट (beyond text) जाकर फ़िल्म को ऊपर उठाती है| हेला टेढ़ा-कपटी-लहरदार-पेंचदार पोज देकर अपने अभिनय कला से आतंकित करती हैं| वे पॉपुलर खलनायकों की तरह लाउड नहीं हैं, लेकिन उनसे बहुत-बहुत ख़तरनाक लगती हैं| वे आपके अन्दर खौफ की लहर पैदा कर देंगी| निर्देशक टाइका वैटिटी वहाँ भी कॉमेडी डालने से नहीं चूकते, जहाँ जान की बाज़ी दाव पे लगी होती है| वे कॉमेडियन, अभिनेता और लेखक भी हैं|

समय ने बच्चों की लोरी छीन ली है| लोरी की खाली हुई जगह को भरने सुपरमैन पहुँच गए हैं|

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सिनेमा में गहरी रूचि और समझ रखने वाले विनोद सिंह एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। मायानगरी मुंबई में रहकर वे हिंद वॉच मीडिया के लिए नियमित तौर पर सिनेमा से जुड़े विषयों पर लिखते रहे हैं। उनकी फिल्म समीक्षा पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय है। विनोद सिंह हिंद वॉच मीडिया संपादक मंडल के सदस्य होने के साथ-साथ सिनेमा सेक्शन के उप-संपादक भी हैं। सरल भाषा और सपाट बयानी उनकी लेखनी को विशिष्ट पहचान देती है। हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|