Print Friendly, PDF & Email


‘…चल-चल आज तो दिखा ही दे, क्या है उस ट्रंक में। मान जा यार।’
पिता बिट्टो बुआ से निवेदन कर रहे थे। बिट्टो बुआ को पता था कि यह निवेदन पहले जिद में और फिर उन्हें धमकाने तक बढ़ेगा। इसका अंत हमेशा की तरह पिता, दोनों बुआओं और चाचा की झुँझलाहट से होगा – ‘जाने किस बात का गुरूर है। जब सब कह रहे हैं तो मान भी जाना चाहिए। हम क्या इसके गहने-जेवर चुरा लेंगे जो यह ट्रंक दिखाने के नाम पर हर बार टल्ला लगा जाती है। ऐसा क्या है उसमें?’
पर उसमें कुछ था। बेसाख्ता समय और कुछ बेहद रहस्यमय। खतरनाक पर अलादीन के चिराग की तरह कौतुहल से भरा हुआ। उस ट्रंक की एक कहानी थी।
ऐसे बहुत से ट्रंक दुनिया में थे। वे एक ही जगह से खरीदे गये थे। उनमें से एक इंगलैंड के एक बेहद शक्तिशाली महल में भी था। कहते हैं, आज भी है। हजारों किलोमीटर समुद्र पार कर वे दुनिया के बहुत से हिस्सों में पहुँच गये थे। यह सब लंदन की एक बहुत चर्चित स्ट्रीट से शुरू हुआ, आज से लगभग अस्सी साल पहले।
बुआ का ट्रंक बहुत पुराना था। जहाँ से बचपन की स्मृतियाँ शुरू होती हैं उससे भी पुराना। बड़ा-सा लोहे के टाँकों से भरा एक ताला जो कहते हैं बिट्टो बुआ के ससुर लंदन से लाये थे, ट्रंक पर झूलता रहता। उन दिनों भापवाले पानी के जहाज लंदन से बंबई और बंबई से लंदन आया जाया करते थे। बहुत कम लोग इन जहाजों से जा पाते थे। बड़े शहरों में भी बस इक्का-दुक्का ही लोग थे जो जहाज में बैठकर महीनों की यात्रा करके, अरब सागर, फारस की खाड़ी, स्वेज नहर, भूमध्य सागर, जिब्राल्टर का सँकरा रास्ता और अटलांटिक के आठ दिन पार करके लंदन और इसी तरह वापस आये हों। बुआ के ससुर नजीबाबाद में यह यात्रा करनेवाले अकेले थे और उन्हें इस उपलब्धि के साथ दशकों तक अकेला ही होना था। वे ठहरे नजीबाबाद के पुराने रईस, रजबाड़ों के समय से चली आई दीवानी के उत्तराधिकारी, बड़े दीवान साहब, पर फिर भी भाप के जहाज में लंदन हो आना इससे भी बड़ी बात थी।
पाँच एकड़ में शहर के बीचोंबीच उनकी कोठी थी। कोठी क्या, पूरा आलीशान महल था। इटैलियन कट के शैंडलियर, अखरोट की लकड़ी से बनी विदेशी काँचों से पारदर्शी होकर चमचमाती अलमारियाँ, रजवाड़ों के समय से चले आये खूबसूरत फर्नीचर, पैरिस से मँगवाई गई बेशकीमती पेंटिंग्स, बाहर के खूबसूरत लॉन में लगा संगमरमर का विशाल फव्वारा… कहते हैं आज भी नजीबाबाद की आधी से ज्यादा दुकानें उनकी ही हैं। करोड़ों रुपये की आमदनी।
बुआ के पास सब कुछ था, जो उन दिनों किसी के पास हो सकता था – बेशकीमती ज्वेलरी से लेकर दर्जनों सेवक, सोने और चाँदी के तारों से बने महँगे कपड़े, कीमती खुशबुएँ, …सबकुछ, शायद सबकुछ से भी ज्यादा। बस कुछ भी माँग लो हाजिर, यहाँ तक कि चाँद और तारे भी। पर बुआ को कभी चैन न आया। वह सारा साल इधर से उधर होती रहती। कभी भी दो-चार महीने से ज्यादा वह ससुराल में नहीं रही। कभी अपनी छोटी बहन के पास दिल्ली, तो कभी बड़ी बहन के पास लखनऊ, तो कभी बड़े भाई के घर याने रायपुर में हमारे यहाँ, तो कभी छोटे भाई यानी चाचा के पास जयपुर। पूरे साल में आधा दिन ससुराल तो आधा दिन बाकी बची दुनिया। बकौल बुआ आधा साल घर और आधा दुनिया।
बुआ जहाँ जहाँ जाती वह ट्रंक भी उनके साथ हो लेता। दो-चार मुश्टंडे कुली मोटे रस्सों से बाँस की काँवड़ पर बाँधकर उसे अपने कंधों पर उठाकर बुआ के पीछे-पीछे चलते। बुआ के आने के साथ ही ट्रंक को घर के भीतर घुसाने और उसे एक साफ-सुथरी बड़ी सी जगह पर रखने की कवायद शुरू हो जाती। जहाँ-जहाँ बुआ जाती, वहाँ-वहाँ के घरों के दरवाजे इतने बड़े कर दिये गये थे कि ट्रंक भीतर आ सके और बुआ की जिद के अनुरूप वह जगह भी तय थी जहाँ उस ट्रंक को रखा जाता। बुआ का ट्रंक उसकी ससुराल की तरह ही था। नजीबाबाद की तरह वह भी खूब लदा-फदा, वजनी और गुरूर से भरा हुआ था। उसकी शान निराली थी। उसका आना कई-कई खुशियों का आना था। वह जहाँ जाता वह जगह जादूलोक में बदल जाती। वह रहस्यमय था, सपनीली चाहतों से भरा रहस्यमय। उसे शायद ही कभी किसी ने खुलते देखा था। वह दुनिया से छिपकर अँधेरे में खुलता और बंद होता। दुनिया जब सो रही होती या खुद में डूबकर मगन होती, बस तभी वह खुलता और अचानक हम पाते कि हमारे बिस्तरों पर तरह-तरह की चीजें एक सिरे से दूसरे सिरे तक रखी हैं – खूबसूरत मालाएँ और मणिक, रत्नजड़ित कंगन, सोने के खूबसूरत कान के बुँदके, बेहद महीन नगों से जड़े नैकलेस, तरह-तरह के जादुई खिलौने, जरीवाले और महँगे तारों से बनी खूबसूरत सिल्क की साड़ियाँ, रंग-बिरंगी किताबें, महँगी क्रॉकरी के सेट, पेंडल और कफलिंग्स, महँगी खुशबुएँ, तरह-तरह की सुंदर घड़ियाँ, रंगीन पेन-पेंसिल, ब्रेसलेट्स… जाने कितना कुछ और हर चीज पर एक पर्ची लगी होती जिस पर घर के किसी सदस्य का नाम लिखा होता। हर एक को पाँच-पाँच, दस-दस। लूट मच जाती। खुशियों का चित्कार होता। बच्चे बिट्टो बुआ से लिपट जाते। माँ उनको गले लगा लेती। पिता मुस्कुराते। लाखों की चीजें बिट्टो बुआ यूँ ही बाँट देती।
इतना सब कुछ बाँटने और उससे हजारों गुना पाने की बात भी बिट्टो बुआ कभी खुश ना होतीं। हर ठाठ के बाद भी अनमनी। हर खुशी के बाद भी बेजार।
बुआ की हर चीज में नुक्स था। हर खूबसूरत और बेशकीमती चीज तमाम कमियों और असंगतताओं से भरी पड़ी थी। बार-बार लोगों के निहारने, छूने, तारीफ करने और विशिष्टता का एहसास दिलाने के बाद भी वे सब चीजें जैसे बरसों से अचीन्ही और तुच्छ रह आयी थीं। इस कमी को पूरा करने बुआ अक्सर कुछ ढूँढ़ती रहती और कभी कुछ मिलता तो उसे उन चीजों की कमियाँ दूर करने के लिए उनमें जोड़ती जातीं। जैसे एक दिन वे सफेद चमकीली सीपियाँ बाजार से ले आईं और उसे एक महँगी साड़ी पर बिखेर कर बताने लगीं कि यह इस पर कितना सुंदर लगता है। सोने के तारों से भी ज्यादा। अगले दिन सोने के तार निकलवा कर सीपियाँ लगवाने के लिए वे वह कपड़ा बाजार में दे आयीं। माँ ने कहा भला सोने के तार निकलवा कर कोई सीपियाँ कढ़वाता है। पिता ने बुरा सा मुँह बनाया। पर बुआ को किसी की बात न जमी। अपनी हर चीज को और बेहतर करने वह अक्सर बाजार में भटकती और मन माफिक चीज ढूँढ़ती। कई बार बेतरह भटकती। अक्सर कोई तुच्छ और रोजमर्रा की चीज ले आती और बहुत खुश होती। उनकी इन हरकतों का हम मजाक बनाते।
बुआ जबर्दस्त जुगाड़ू थीं। हम अक्सर तुच्छ और छोटी चीजों के लिए बुआ को आगे कर देते और वह चहकती, पूरे मनोयोग से उस काम को अंजाम देती। भरी बस में सीट का जुगाड़ करना हो या ठसाठस भरे काउंटर पर फिल्म का टिकिट पाना हो, ऐसे जगहें जहाँ वह अपने जीवन में बहुत कम बार गई थी, चहककर पहुँचती और वह चीज उसकी गिरफ्त में आ जाती। वह बेहद तुच्छ चीजों को बड़े कौतुहल से देखती – देखो भाभी, ऐसी सफेद गोभी देखी है। कितनी झक्क सफेद। …कभी देखा है, ऐसा सुंदर रंगीन हेयर बैंड…। जो चीज अच्छी लगती उसके लिए वह उतावली हो जाती। उसे लगता कि वह बस किसी तरह धीरे से उस चीज को अपने पास सरका ले। बैग में लाखों रुपयों के बावजूद वह कनखियों से देखकर दुकान से किसी चीज को उठाकर, छिपाकर ले आती। मुझे धीरे-धीरे बड़े होने के साथ यह पता चल गया था कि संसार की हर चीज पैसों से खरीदी जा सकती है। पैसे दो और वह चीज आपकी। चोरी चकारी तो गरीब गुरबे करते हैं। मैं अजीब सी उलझन में था। बुआ तो गरीब नहीं है। फिर चोरी क्यों?
माँ कई बार झल्ला जाती – ‘बीवी जी किसी ने अगर कभी पकड़ लिया तो बड़ी हाय होगी। कोई मुँह दिखाने लायक नहीं रहेगा।’
‘तो बता भला मैं क्या करूँ। मन हो आता है।’
बुआ चुप्पा होकर कहती। सब खिलखिलाकर हँस देते। बुआ की बात हवा हो जाती।
तो, बुआ के ट्रंक को कभी किसी ने खुलते नहीं देखा था। देखना तो दूर उसके खुलने की आवाज तक नहीं सुनी थी। हमें उस ट्रंक के बारे में ऐसा पता था कि उसमें एक जिन्न है। बड़े दाँत और लंबे नाखूनोंवाला जिन्न, जो काला लबादा ओढ़े रहता है और जिसके पैरों की जगह एक लंबी पूँछ है। वह उड़कर, सरककर, या चलकर कहीं भी, कभी भी पहुँच सकता है। बुआ उस जिन्न से जो माँगती है जिन्न उसे वह सब दे देता है। फिर बुआ उन सब चीजों को बिस्तर पर हमारे लिए सजा देती है। वह जिन्न बुआ का जिन्न है। कोई और उसको देखे तो गप्पा जाये। अपने नाखून उसके पेट में गड़ा दे। अपने दाँत उसकी गर्दन में धँसा दे। बाप रे बाप। रात-बेरात नीचे के कमरों में कहीं कोई खटक या धमक होती तो बिस्तर में लेटे लेटे मेरा कलेजा मुँह को आता। जरूर जिन्न होगा। कभी कोई चीज खड़कती तो मैं रजाई में अपना सिर घुसाकर दुबक जाता। बुआ की साड़ी में ट्रंक की चाबी लटकती रहती। उस चाबी को देखकर अक्सर मैं डर जाता।
तब मैं बहुत छोटा था और किसी ने भी मुझे नहीं बताया था कि बुआ के ससुर लंदन की हार्ले स्ट्रीट की जिस दुकान से वह ट्रंक 1912 में लाये थे, वहीं से कुछ ट्रंक बकिंघम पैलेस और इंग्लैंड में वेल्स स्थित कैनसिंग्टन पैलेस भी गये थे। उन दिनों इंग्लैंड में किसी जॉर्ज पंचम नाम के राजा का राज था। जो ट्रंक कैनसिंग्टन पैलेस गया था वह ठीक बुआ के ट्रंक की तरह ही था। दुनिया से छुपा हुआ। बड़ा और गुरूर से भरा। बेशकीमती सामानों को उगलनेवाला। उसमें भी एक जिन्न था। उस जिन्न की चर्चा पूरे वेल्स में थी। बुआ के जिन्न की तरह वह गुमनाम नहीं था। वेल्स के लोगों के बीच उस जिन्न की कहानियाँ थीं। लोग उसे ‘द रॉयल घोस्ट’ कहते थे। हार्ले स्ट्रीट की वह दुकान 1951 में बंद हो गई। तब तक हजारों ट्रंक दुनिया के हजारों कोनों में पहुँच चुके थे। सबमें उनकी तरह के जिन्न थे। अपने-अपने रहस्यों, डर और किस्सोंवाले जिन्न। पर ‘द रॉयल घोस्ट’ के अलावा बाकी सब गुमनाम ही रह आये।
ट्रंक को लेकर बड़ों की उत्सुकता और कहानियाँ अलग तरह की थीं। पिता, बुआएँ और चाचा जब मजाक के मूड में होते तो इस फिराक में रहते कि बिट्टो बुआ एक बार उन्हें वह ट्रंक खोलकर दिखा दें। उन्हें जिन्न के बारे में ठीक-ठीक पता नहीं था। फिर भी एक नंगी उत्सुकता अक्सर उन्हें चहका देती थी। हर कोई एक बार उस ट्रंक को खुलता हुआ देखना चाहता था। एक बार उसमें झाँकना चाहता था। वे सब पिछले 25 सालों से उस ट्रंक और चाबी को देखते आये थे। काँवड़ पर लटककर, मजदूरों के कंधों पर टिका दूर-दूर तक भ्रमण कर आनेवाला और घर के किसी शांत कोने में बड़े शान से टिका ट्रंक अक्सर उन सबको उकसा देता था। जब पिता कहते कि वह ट्रंक लोगों की नजरों से बचकर चुपके से खुलता और बंद होता है तो मैं डरकर माँ से चिपक जाता। मुझे लगता जैसे वह जिन्न मेरी पीठ पर चढ़ आया है और उसने मेरे गाल में अपने नाखून गढ़ा दिये हैं। मैं अक्सर सोचता कि क्या बुआ जादूगरनी हैं? बड़े दाँत और नुकीली टोपीवाली, झाड़ुओं पर बैठकर उड़नेवाली जादूगरनी जो जिन्नों को अपने कंट्रोल में रखती है। मुझे यकीन हो चला था कि बुआ चुड़ैल है। एक छिपी हुई चुड़ैल और वह जिन्न उसका गुलाम है।
बुआ से चाहे कितनी और कैसी भी बात कर लो पर ट्रंक खोलने के नाम पर वह एकदम गोल गाँठ हो जाती। कमर पर लटकी चाबी को मुट्ठी में भींच लेती। बड़े बेहयाई से बहाने बनाती। कहीं चुपचाप सटक लेती। बातों को पलटकर दूसरों को मूर्ख बनाती।
पर उस दिन ऐसा नहीं होना था।
जब सब कुछ शांत हो गया। पिता बाहर जाकर पीछे के दरवाजे से दबे पाँव भीतर आये और निश्चिंत बैठी बुआ की कमर पर जोर का झपट्टा मारा। एक झटके में चाबी पिता की मुट्ठी में आ गयी।
सारे घर में कोहराम मच गया। आगे-आगे हल्ला करते चुहल करते पिता और पीछे दोनों बुआएँ और चाचा। वे उस कमरे की ओर लपके जहाँ ट्रंक रखा था। बच्चे डर गये। जिन्न के भय से डरकर मैं माँ से चिपक गया। छोटी बहन प्रिया सुबकने लगी। मेरे दूसरे सहोदर भाग गये। बिट्टो बुआ चीख पड़ीं। वे दादी से गुहार कर रही थीं कि वे पिता को रोकें। माँ और चाची बिट्टो बुआ को अचरज से घूर रही थीं। बुआ की घुर्राती-सी चीख और घिघियाना पूरे घर में गूँज रहा था। माँ उन्हें कुछ अस्फुट शब्दों में समझा रही थी, पर बुआ पर कोई असर नहीं था। वे दादी से लिपट गयीं। गुहार करने लगीं कि, ट्रंक अगर खुल गया तो कयामत आ जावेगी। दादी बुआ को छाती से लगाये थीं। हतप्रभ और किंकर्तव्यविमूढ़। सारा तमाशा देख छोटे फूफा हँस रहे थे।
पिता, दोनों बुआ और चाचा ने ट्रंकवाले कमरे में घुसकर उसे अंदर से बंद कर लिया। भीतर वे बड़े इत्मिनान से ट्रंक को खोलने लगे। बुआ रुआँसी हो गयी। दादी उन्हें समझाने लगीं। फिर दोनों भीतर के कमरे में चली गयीं। रुआँसी और झल्लाई हुई बुआ बिस्तर पर बेसुध सी होकर उलटी लेट गईं। दादी उनकी पीठ सहलाती रहीं।
बंद कमरे से कोई आवाज नहीं आ रही थी। मैंने सुना था कि जिन्न पहले लोगों को बेहोश करता है। उसके पास खतरनाक धुँआ छोड़ता हुआ रसायन होता है जिसे वह लोगों पर छोड़ देता है। उसके असर से लोग तुरंत बेहोश हो जाते हैं। फिर लोगों की गर्दन में दाँत गड़ाकर वह धीरे-धीरे उनका खून चूसता है। बुआ का जिन्न तो बरसों का भूखा है। निश्चय ही उसने सबका खून पी लिया होगा। मैं डरकर रुआँसा हो गया।
थोड़ी देर बाद ‘भड़’ से दरवाजा खुला। कमरे की पीली रोशनी आँगन में पसर गई। पहले छोटी बुआ बाहर आईं, मुँह पर अपना हाथ रखे। अवाक् और ठगी हुई। उसके चेहरे का रंग फीका पड़ गया था। पिता बाहर आते ही सर पकड़कर आराम कुर्सी में धम्म से समा गये मानो उन्हें कोई दौरा आया हो। चाचा पैर पटकते और जाने क्या-क्या बुदबुदाते हुए तीर के समान तेजी से हमारे सामने से होकर अपने कमरे में चले गये। बड़ी बुआ भी हड़बड़ाई हुई और अचरज से लबरेज थीं, जैसे एक ही पल में कितना कुछ बता देना चाहती हों पर कुछ सूझ नहीं रहा।
माँ के साथ चिपका-चिपका मैं भी उस कमरे तक पहुँचा। डर के मारे मैंने उँगलियों से अपनी आँखें ढक रखी थीं। फिर अपनी उँगलियों के बीच छोटी सी झिरी बनाकर चारों ओर नजर दौड़ाई। पहले पहल तो मैं सकपका गया। सारा कमरा ऐसा हो रहा था मानो वहाँ कोई तूफान आया हो। हर जगह सामान बिखरा पड़ा था। माँ ने मेरी पीठ पर एक धौल जमाई और खुद से अलग कर दिया – ‘चल हट। मर गया तेरा जिन्न।’
मैंने एक तरफ से पूरे कमरे को घूरना शुरू किया। ट्रंक मुँह खोले पड़ा था। बेसुध और लावारिस। लंदनवाला ताला और चाबियाँ फर्श पर गिरी थीं। सारे कमरे में सामान बिखरा हुआ था। बिस्तर पर, स्टूल पर, कुर्सियों पर, मेज पर, कालीन पर… हर जगह।
इनमें से कुछ भी चमकीला, महँगा और हतप्रभ करनेवाला नहीं था। सब तुच्छ और साधारण था। जानी पहचानी चीजें। पिताजी की एक पुरानी अंग्रेजी की किताब ‘गोल्डन ट्रेजरी’ जिसके सुनहरे पृष्ठों पर खूबसूरत कैलियोग्राफी में वर्डसवर्थ, अलेक्जेंडर पोप, टैनिसन, कॉलरिज, बायरन, कीट्स… आदि की कविताएँ लिखीं थीं और अक्सर मैं बुक शैल्फ से उस किताब को निकाल पर उसके सुनहले पन्नों को छूने की फिराक में रहता था, फर्श पर खुली बेसुध पड़ी थी। वह चिकनी, पुरानी और सपनीली किताब थी। चार साल पहले एक दिन अचानक वह गायब हो गयी थी। पिता परेशान हो उठे थे। मेरे लाख सफाई देने के बाद भी वे यही मानते रहे कि किसी दिन अपने बस्ते में रखकर मैं उसे स्कूल ले गया होऊँगा और वहीं किसी ने मेरे बस्ते से वह किताब निकाल ली होगी।
स्टूल पर काले मोतियोंवाली एक तुच्छ-सी माला थी जो घर की नौकरानी के दुधमुँहे बेटे के गले में होती थी और एक दिन अचानक गुम गई थी। नौकरानी देर तक उस माला को ढूँढ़ती रही थी और जब वह चुपके से गद्दे का कोना उठाकर देखने लगी तो माँ उस पर झल्ला गयी थी – ‘तू क्या समझती है, कि हम चोर हैं? तेरी दस रुप्पट्टी की माला चुरायेंगे।’ नौकरानी और माँ की खासी बहस हुई थी और फिर नौकरानी पैर पटकते हुए चली गयी थी। मेज पर छोटी बहन के बहुत सारे रंग-बिरंगे रिबन और हेयर बैंड पड़े थे जिनके गायब होने पर उसने कई बार माँ से डाँट खाई थी। फर्श पर काँच के कंचे फैले थे, जो अक्सर गायब हो जाया करते थे और मैं पिता से कुछ पैसे लेकर नये कंचे ले आता था। पर एक दिन पिता ने पैसे देने से इनकार कर दिया था और मैं घर की बालकनी में खड़ा कंचे खेलनेवाले बच्चों को देखकर रुआँसा हो जाता था।
छोटी बुआ के हाथ में प्लास्टिक के सस्ते कंगनों का एक सेट था जो वो बार-बार माँ को दिखा रही थीं – ‘देखो भाभी। देखो तो। पालिका के पटरी बाजार से खरीदा था। सिर्फ बीस रुपये में। बताओ भला …बाप रे।’
कमरे में कितना कुछ बिखरा था जो गायब हो चुका था। कुछ दिन और बीतते तो वह स्मृति से गायब हो जाता।
बिट्टो बुआ बिस्तर पर औंधी लेटी थी और सब उस पर चिल्ला रहे थे –
‘माता जी ये चोर है। इसने बच्चों का सामान तक चुराया। छिः।’
‘अरे जरूरत थी तो माँग लेती। खरीद लाती।’
‘क्या कमी रही है इसको। पैसों में खेलती है फिर भी देखो कैसी नियत है। राम राम।’
‘बताओ भला नौकरानी के बच्चे के गले की माला। अरे शर्म भी ना आई तुझे बिट्टो।’
‘चोरी। वह भी ऐसी। हे भगवान।’
‘हम तो इसे कितना अच्छा समझते थे। कितने-कितने उसूलोंवाली। पर यह तो कुछ और ही है।’
सब बुआ पर गुर्रा रहे थे। तकिये में मुँह धँसाये औंधी लेटी बुआ सुबक रही थी। दादी अचरज में थी उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। क्या कहें। वे बार-बार एक ही बात कह रही थीं कि अब सुबह बात करेंगे।
बिस्तर के किनारे ट्रंक से निकले पेपरों का एक ढेर था जो चाचा के घर से दो साल पहले गायब हुई घड़ी से दबाया गया था। उनमें से कुछ मैं ले आया। मैंने नया नया पढ़ना सीखा था और कागज जिनमें कुछ लिखा होता था, मैं उठा लाता था और इत्मिनान से उनके हिज्जे कर करके पढ़ता था। मुझे कुछ धुँधला याद है जो उन पेपर कटिंगों में लिखा था। अगले दिन सुबह नहाने के बाद दादी के घर की छत पर धूप में बैठकर मैंने थोड़ी कठिनाई और धैर्य के साथ उसे जोर-जोर से पढ़ा था। वे ट्रंक से निकले थे और जिन्न के मरने के बाद भी उनका कौतुहल मेरे पीछे लगा था।
एक टुकड़े पर लिखा था कि भारत के दो बड़े क्रिकेट खिलाड़ी विदेश में एक छोटे और अनाम से रेस्तराँ से दो चम्मच चुराते हुए पकड़े गये थे। वे दोनों करोड़पति थे और नामी भी। एक जगह लिखा था कि चाँदनी चौक के पटरी बाजार से घटिया और सस्ते किस्म के रूमाल चुराते हुए एक औरत को लोगों ने पकड़ लिया था। जब पूछताछ की गयी तो पता चला वह किसी बड़े लखपति अधिकारी की बीवी थी और बेशकीमती कार से वहाँ आई थी। एक खबर बेहद रोचक थी। वह यूँ थी कि भोपाल के बिट्ठल मार्केट की सब्जी-मंडी में सब्जी बेचनेवाले एक अजीब सी बात जानते हैं जिससे वे क्रोधित भी हैं, और अचरज में भी। होता यूँ है कि किसी करोड़पति घर की कोई औरत जो किसी बिजनेसमैन, नेता या अधिकारी की बीवी होती है भरपूर सब्जियाँ खरीदती है पर मौका ताड़कर सब्जी बेचनेवाले की नजरों से बचकर दो-चार आलू, परवल, टमाटर, प्याज या ऐसी ही कोई चीज चुराकर अपने बैग में रख लेती है। वे बड़े घर की औरतें हैं और वे उन पर एकदम से इल्जाम भी नहीं लगा सकते। वे हैरत में हैं। एक खबर यूँ थी कि अमेरिका में कोई जगह है बफैलो। वहाँ के एक पब में एक करोड़पति बिजनेसमैन के लड़के ने महज डेढ़ डॉलर की बीयर की बोतल चुराकर अपनी पेंट में ठूँस ली। पब के मालिक के माँगने पर न तो वह बोतल दे रहा था और ना ही उसके पैसे। जबकि उसके वैलेट में हजारों रुपये थे। उस दिन लगभग एक सी रोचक कहानियों को मैं हिज्जे कर करके पढ़ता रहा था। वे कहानियाँ बरसों से ट्रंक के जिन्न के पास रह आई थीं। वे जिन्न की कहानियाँ थीं।
उन दिनों बहुत से जिन्नों का रहस्य खुल रहा था। बहुत से खत्म हो रहे थे। बहुत से यतीम।
इंग्लैंड के कैनसिंग्टन पैलेस के ट्रंक में रह रहा ‘द रॉयल घोस्ट’ एक पुराना जिन्न था। कैनसिंग्टन, प्रिंस ऑफ वेल्स का पैलेस है। लोग इस जिन्न को भूलने लगे थे। पर किस्सों और किताबों में रह आया था। उस दिन वेल्स के एक दूरदराज के कस्बे वॉल्टन में एक बूढ़ी औरत अपने पोते को ‘द रॉयल घोस्ट’ का किस्सा सुना रही थी। वह बच्चा डरकर अपनी माँ से चिपकर सोया था। उसे लगता कि एक दिन अचानक ट्रंक खुल जायेगा। यह सोचकर वह माँ के नाइट गाउन से डरकर चिपक जाता।
अगले दिन मैंने दादी से बतियाती बिट्टो बुआ को सुना था।
‘यकीन करो माँ घर जितना भरता है समय उतना ही खाली होता जाता है। इतना खाली, इतना खाली कि उसको भरने के लिए इंसान कुछ भी कर सकता है। चोरी भी। पर यह चोरी नहीं है।’
दादी उसे एकटक घूर रही थी। बिट्टो बुआ दादी का हाथ थामे लगातार कहे जा रही थी।
‘कितना खालीपन भरा जा सकता है। बोलो। कितने रंग भर सकते हो। इनका कोई अंत नहीं। एक मिलता है तो हजारों छूट जाते हैं और हजारों मिलते हैं तो लाखों। बाजार में कुछ भी नहीं मिलता। कितना भी पैसा हो मनचाही चीज नहीं खरीदी जा सकती है। मैं कितना भटकती हूँ। तूने तो देखा ही है। रेडियों, बाजारों, पटरियों और सब्जी मंडियों में। बेतरह। वहाँ कभी कुछ नहीं मिला। बेतरह भटककर भी नहीं। पर वह मुझे चाहिए था। ना मिलता तो मैं मर जाती। जब बाजार नहीं देता है तो चोरी करनी पड़ती है।’
दादी अजीब से भाव के साथ बुआ को घूर रही थी। विस्मृत और परेशान। बुआ की आँखों में पानी की एक बूँद उतर आयी थी। उसकी आवाज भर्राने लगी थी।
‘मैं हर रोज उस गरीबी को देखती थी जो मेरे घर के लॉकर में करोड़ों रुपयों के नोट और सोना होकर भरी पड़ी थी। कोई कभी मेरे लिए वह सब नहीं लाया जो इतना सस्ता होता कि बिना पैसों के आ जाता। इतना सस्ता जिसकी मुझे जरूरत थी। इतना तुच्छ कि मैं चहक उठती। इतना साधारण कि…।’
‘बिट्टो ये तू क्या बोल रही है?’
दादी ने उसके कंधों पर हाथ रखते हुए कहा। बुआ लगातार बोले जा रही थीं।
‘मुझे बहुत सी चीजों से महरूम किया गया है माँ। बाजार सिर्फ उन्हीं चीजों से भरे थे जिसकी मुझे कभी दरकार नहीं थी। बाजार बेहद कमीन चीज होता है। वहाँ वह नहीं मिलता जिसे हम खरीदने निकलते हैं। कुछ खरीदने बाजार जाना याने …याने इससे तकलीफदेह बात कोई और नहीं। फिर भी मैंने नहीं सोचा था, कि एक दिन वह मुझे इस तरह पटक देगा। लगा ही नहीं बाजार जीवन भी खत्म कर सकता है। किसी पैसेवाले का जीवन। मेरा जीवन…।’
दादी ने बुआ का गला और माथा छुआ। बुआ भीगे नेत्रों से दादी को देख रही थी। फिर एक झटके में उसका हाथ अपने गले से हटाकर गरज पड़ी –
‘मैं बीमार नहीं हूँ। समझीं तुम। तुम मुझे कभी नहीं समझ सकतीं। कभी नहीं। एक माँ की तरह भी नहीं।’
इस पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया ⇓
loading...