Monday, December 17, 2018
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हमारी बेटियाँ (कविता) : आकांक्षा यादव

हमारी बेटियाँ घर को सहेजती-समेटती एक-एक चीज का हिसाब रखतीं मम्मी की दवा तो पापा का आफिस भैया का स्कूल और न जाने क्या-क्या। इन सबके बीच तलाशती हैं अपना भी वजूद बिखेरती...

चिड़ियाघर के तोते (कविता)- बुद्धिनाथ मिश्र

चिड़ियाघर के तोते को है क्या अधिकार नहीं पंख लगे हैं फिर भी उड़ने को तैयार नहीं। धरती और गगन का मिलना एक भुलावा है खर-पतवारों का सारे क्षितिजों पर दावा...

मीडिया विमर्श (कविता)- मंगलेश डबराल

उन दिनों जब देश में एक नई तरह का बँटवारा हो रहा था काला और काला और सफेद और सफेद हो रहा था एक तरफ लोग...

पाँव जमा है रावण का (कविता)- भगवत दुबे

सम्मानित हो रहे आज वे लहू, गरीबों का जिनने बेखौफ निचोड़ा है। शिलालेख अपने लिखवाते, रहा नहीं आँखों में पानी शोषक शब्द हुआ अनुवादित हरिश्चंद्र के जैसा दानी विध्वंशक पथ पर गांधी,...

युद्ध के मालिक (कविता)- बॉब डिलन

आओ युद्ध के मालिकों तुमने ही बनाईं सारी बंदूकें तुमने ही बनाए मौत के सारे हवाई जहाज तुमने बम बनाए तुम जो दीवारों के पीछे छिपते हो छिपते फिरते...

खूँटियों पर टँगे दिन (कविता)- अनूप अशेष

खूँटियों पर टँगे दिन फटती कमीजों से रहे धूल पीती साँस टूटे घरों का संत्रास, आँवे के नीचे रहे ज्यों किसी का रहवास मोटे लिबासों बीच पतली समीजों-से रहे। बड़े घर की ओट...

एक औरत का चेहरा (कविता)- अडोनिस

मैं एक औरत के चेहरे में रहता हूँ जो एक लहर में रहता है जिसे उछाल दिया है ज्वार ने उस किनारे पर खो दिया है जिसने...

स्वार्थी सब शिखरस्थ हुए (कविता)- भगवत दुबे

हमको सीढ़ी बना स्वार्थी, सब शिखरस्थ हुए आँसू पीने गम खाने के हम अभ्यस्थ हुए। रहे बनाते सड़क पाटकर अपनी पगडंडी किया विपुल उत्पादन भूखी रही किंतु हंडी हमें, वस्तुओं के अभाव सारे...

चीख (कविता)- अरुण कोलटकर

बिलकुल अभी-अभी तक जहाँ हिरोशिमा था उस दिशा से आनेवाले व मियुकी पुल से बहनेवाले परछाइयों के रेले में देखा है क्या किसी ने एक स्कूली लड़की को खून का किमोनो...

कूड़ा बीनते बच्चे (कविता)- अनामिका

उन्हें हमेशा जल्दी रहती है उनके पेट में चूहे कूदते हैं और खून में दौड़ती है गिलहरी ! बड़े-बड़े डग भरते चलते हैं वे तो उनका ढीला-ढाला कुर्ता तन जाता...