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कहते हैं कि “काठ की हांड़ी चूल्हे पर बार-बार नहीं चढ़ती।” पिछले चुनाव में ही जनता ने सुदेश महतो को साफ़ संदेश दे दिया था कि उनका जनाधार अपनी ही सीट से खिसक रहा है। यह उनकी खुशफहमी ही थी कि वे एनडीए से गलबहियां करते हुए भी बगावत की राह पर चलते हुए खुद को सर्वशक्तिमान मानते रहे। एक बार फिर सिल्ली उपचुनाव के नतीजों से साफ़ हो गया है कि सुदेश झारखण्ड के सियासी खेमेबंदी में अलग-थलग पड़ गए हैं। सिल्ली उपचुनाव परिणाम के बहाने हिंद वॉच झारखण्ड के सह-संपादक कुमार कौशलेन्द्र सुदेश की इस सियासी भूल की पड़ताल कर रहे हैं  :

खिरकार वही हुआ जिसकी विस्तृत चर्चा करते हुए हिंद वॉच मीडिया ने 29 मई को प्रकाशित आलेख में भावी परिणाम का इशारा कर दिया था। झारखंड में संपन्न विधानसभा उपचुनाव 2018 में यूपीए गठबंधन में शामिल विपक्षी दलों की एकजुटता के आगे सत्तारूढ़ एनडीए के अगुआ भाजपा और उसके सहयोगी आजसू की एक न चली और मुख्यमंत्री रघुबर दास की सियासी पकड़ और आजसू सुप्रीमो की अकड़ को जनता ने सिरे से नकार दिया। फलतः झारखंड मुक्ति मोर्चा से सिल्ली और गोमिया विधानसभा की सीटें छीनने में झारखण्ड एनडीए नाकाम रहा।

सिल्ली में ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) पार्टी के प्रमुख और झारखंड के पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुदेश महतो 13535 मतों के बड़े अंतर से चुनाव हार गये, तो गोमिया में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के माधवलाल सिंह तीसरे स्थान पर रहे। यहां आजसू के लंबोदर महतो ने शानदार प्रदर्शन करते हुए दूसरा स्थान हासिल किया। सिल्ली में विधान सभा बदर पूर्व विधायक अमित महतो की पत्नी सीमा महतो को 77,127 वोट मिले, जबकि आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को 63,613 मत मिले। वहीं, गोमिया में झामुमो की बबीता महतो ने 1344 मतों के अंतर से लंबोदर महतो को पटखनी दी और भाजपा के माधवलाल सिंह तीसरे स्थान पर पिछड़ गये। पहले भी दोनो सीटें झामुमो के पास थीं।झारखंड मुक्ति मोर्चा के दो विधायकों को अलग अलग आपराधिक मामलों में दोषी करार दिये जाने और दो वर्ष की जेल की सजा सुनाये जाने के कारण यह दोनो सीटें रिक्त हो गयी थीं।

सिल्ली में आजसू सुप्रीमो के लिये भाजपा ने सीट तो छोड़ दी थी लेकिन अपने काडर को अप्रत्यक्ष रूप से न्यूट्रल ही रखा था और सुदेश ने भी एनडीए अगुआ भाजपा नेत्रित्व और काडर को अपने पक्ष में उतारने से गुरेज कर रखा था। ज्ञातव्य है कि 2014 में अमित कुमार महतो ने आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को पहली बार हराया था और सुदेश महतो को सत्ता की सियासत से दूर कर दिया था।

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गोमिया में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की गठबंधन सहयोगी आजसू और भाजपा अलग-अलग चुनाव लड़ रहे थे। वहां भाजपा ने पूरे लाव–लश्कर के साथ पूर्व मंत्री माधवलाल सिंह को और आजसू ने राज्य सरकार के पूर्व कर्मचारी लंबोदर महतो को मैदान में उतारा था। झामुमो ने कोयला चोरी के एक मामले में दो साल की जेल की सजा पाने के बाद अयोग्य करार दिए गए विधायक योगेंद्र महतो की पत्नी बबीता देवी को मैदान में उतारा था।

रघुबर सरकार के लिये असहज स्थितियाँ खड़ी करने में जुटे रहे आजसू सुप्रीमो को 2014 विधानसभा में मिली सियासी शिकस्त के बावजूद राज्य विकास परिषद् का उपाध्यक्ष बना कर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया ताकि वो रघुबर सरकार के लिये असहज हालात ना पैदा करें और 2019 के चुनावी तैयारी को गठबंधन सहयोगी दल के साथ धार दिया जा सके। किन्तु आजसू सुप्रीमो ने रघुबर सरकार से रार की राह नहीं छोड़ी और गठबंधन की सरकार में शामिल होने के बावजूद आजसू सुप्रीमो राजव्यापी दौरे कर नीतिगत मुद्दों पर रघुबर सरकार की फ़जीहत करते रहे। उपचुनाव में आजसू और उसके सुप्रीमों के अकेले पड़ जाने की पटकथा विगत लम्बे समय से लिखी जा रही थी। भाजपा केन्द्रीय अलाकमान ने भी उत्तर प्रदेश के अपना दल की अनुप्रिया पटेल और रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा की एनडीए में भाजपा से बिग साइज़ दिखने की हालिया कवायदों से सबक लेते हुए सुदेश और उनकी आजसू को अगामी लोकसभा चुनाव 2019 से पहले ही कट साइज़ करने की रूपरेखा तय कर ली थी।

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इसी बीच सिल्ली और गोमिया उपचुनाव की घोषणा हो गयी। भाजपा नेतृत्व ने आजसू सुप्रीमो के पास अपने संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह और उपाध्यक्ष दीपक प्रकाश को गोमिया से भाजपा और सिल्ली से सुदेश की उम्मीदवारी के प्रस्ताव के साथ भेजा किन्तु सुदेश महतो और उनकी पार्टी ने भाजपा के इस प्रस्ताव को सिरे से ख़ारिज कर दिया था। नतीजतन एनडीए का गठबन्धन उपचुनाव में दरक गया और एकजुट यूपीए के समर्थन की नाव पर सवार विधानसभा बदर झामुमो के दोनोँ विधायकों की पत्नियां चुनावी समर में बाजी मार गयीं। उल्लेख अप्रासंगिक नहीं होगा कि झारखण्ड विधानसभा में झामुमो विधायक के रूप में प्रवेश करने वाली सिल्ली विधायक सीमा महतो और गोमिया विधायक बबिता महतो झारखंड के बहुसंख्यक कुर्मी समुदाय से जीत कर आने वाली पहली महिला विधायक हैं।

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आजसू सुप्रीमो और भाजपा संगठन की रार के कारण आये विपरीत चुनावी परिणाम का असर आने वाले दिनों में सूबे की सियासत में दिखना तय है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो सिल्ली उपचुनाव परिणाम ने जहां सुदेश के सियासी भविष्य पर ग्रहण लगा दिया है वहीं गोमिया की करारी शिकस्त ने मुख्यमंत्री रघुबर दास के भाजपा संगठन पर पकड़ पर सवालिया निशान जड़ दिया है। भाजपा सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री जहां गोमिया उपचुनाव को प्रतिष्ठा मूलक मान कर लाव-लश्कर के साथ लगातार जीत की राह निकालने में जुटे थे वहीं एक स्थानीय विधायक और संगठन पदधारी उनकी योजना में भीतरघात का पलीता फूंकने में जुटे थे। मतगणना से पूर्व ही बीजेपी मुख्यालय को माधवलाल सिंह के तीसरे पायदान पर आने और उसके कारण की सूचना पहुँच चुकी थी।

फ़िलहाल एकजुट यूपीए और उसके झारखण्ड अगुआ झामुमो खेमे की जश्न के बीच भाजपा का अंदरूनी कलह उजागर तो नहीं हुआ है किन्तु अन्य मुद्दों पर घर से मुख्यमंत्री की घेराबंदी शुरू है।आने वाले दिनों में स्थानीय सियासी गलियारे में नवीन व चौकाने वाले घटनाक्रम तय दिख रहे हैं।

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