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प्रधानमंत्री जी अपने सपनों के जिस भारत के निर्माण की दिशा में अग्रसर हैं, उसे उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ का नाम दिया है, यानी एक नया भारत। झारखण्ड से आ रही भूख के कारण हुए कथित मौतों की ख़बर और हर भुखमरी के बाद तंत्र के द्वारा की जा रही लीपापोती के कारण भविष्य में जब भी कभी इस ‘न्यू इंडिया’ को परिभाषित किया जाएगा, तब इस नए भारत के नए जनतंत्र को भी परिभाषित करना पड़ेगा, जिसमें भूख से जंग में मरते ‘जन’ और परास्त होते ‘तंत्र’ का जिक्र भी अवश्य आएगा।

2017 के अक्तूबर महीने में जब सिमडेगा जिले की 11 साल की संतोषी ने भात-भात बोलते हुए दम तोड़ दिया था, तब सरकार ने उसकी मौत को भुखमरी मानने से इंकार कर दिया था। उस समय कहा गया था कि संतोषी की माँ कोयली देवी का आधार कार्ड राशन कार्ड से लिंक्ड नहीं हो पाने के कारण संतोषी के परिवार को राशन नहीं मिल पा रहा था। अब सात महीने बाद गिरिडीह की जिस सावित्री देवी की मौत हुई है, उसके पास तो आधार कार्ड भी था, फिर क्यूँ सावित्री देवी का राशन नहीं बन पाया था? पिछले कुछ महीनों में भूख से मौत की ख़बरें झारखण्ड के तमाम अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सुर्खियाँ में रही हैं। सावित्री की मृत्यु के बाद राज्य में भुखमरी की अगली ख़बर चतरा से आई जहाँ 45 वर्षीय मीना मुसहर ने लगातार भूखे रहने के कारण दम तोड़ दिया। सरकारी अमला फिर चिरपरिचित तेवर में सामने आया और भूख को मौत की वजह मानने से इंकार कर दिया गया। खाद्य आपूर्ति मंत्री ने यहाँ तक कह दिया कि मरने वाली महिला निकटवर्ती बिहार के बाराचट्टी की रहने वाली थी और वह एक पखवाड़े पहले ही ईटखोरी आई थी। मंत्रीजी के कहने का मतलब साफ़ था कि कोई पड़ोसी राज्य से आकर कुछ दिन झारखण्ड में रह ले और यहाँ उसकी भूखे रहने की वजह से उसकी मौत हो जाए तो मंत्रीजी को इस मामले में क्लीन चीट मिल जानी चाहिए।

(भात-भात करते हुए भूख से दम तोड़ने वाली संतोषी की माँ कोयली देवी)

13 जनवरी 2018 को तिसरी प्रखंड के थानसिंगडीह पंचायत के बाराटांड़ गांव की बुधनी सोरेन की भी भूख से ही मौत हुई थी लेकिन अधिकारियों ने उसे भी बीमारी से मौत बताया था। बुधनी के पास न तो राशन कार्ड था, न वृद्धा या विधवा पेंशन। जीने के लिए भीख मांगकर अपना गुजारा करने वाली बुधनी जब भिक्षाटन करने में असमर्थ हो गई तो उसके पास भूखे रहने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। आखिरकार लगातार भूखे  रहने के कारण उसकी मौत हो गई। इस मामले में अधिकारियों ने असलियत पर यह कहते हुए पर्दा डाल दिया कि बुधनी की मौत भूख से नहीं बल्कि बीमारी से हुई है। अगर प्रशासन बुधनी की मौत के वक्त सतर्क हो गया होता और जिले में ऐसे वंचितों की खोजबीन कर अनाज व पेंशन की व्यवस्था की गई होती तो शायद सावित्री तक राहत पहुँच गया होता। सरकार अगर बुधनी की मौत पर लीपापोती न करती तो सावित्री और मीना बच सकती थीं।

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(अपनी माँ मीना मुसहर की भूख से मौत के बाद कधे पर लादकर अस्पताल ले जाते हुए गौतम मुसहर)

भूख से हो रही मौतों को बीमारी से हुई मौत साबित कर देने से सरकार की असंवेदनशीलता और बेरुखी बेनकाब हो जाती है। राज्य के खाद्य, सार्वजनिक वितरण और उपभोक्ता मामलों के मंत्री सरयू राय जब इस बात की घोषणा करते हैं कि जितने भी राशन कार्ड आधार से लिंक्ड नहीं हैं, उन्हें निरस्त कर दिया जाएगा, उसके कुछ ही महीने बाद राज्य की एक बेटी भात-भात बोलते हुए दम तोड़ देती है। भूख से हुए उस मौत के बाद मंत्रीजी का दुसरा बयान आता है कि आधार कार्ड से लिंक्ड नहीं हो पाने वाले राशन कार्ड धारियों को भी राशन मुहैया करवाया जाएगा। इसके बाद भी राज्य में भूख से मौतों का सिलसिला नहीं थमता है। अब फिर मंत्रीजी कहते हैं कि वे सरकार के सामने यह प्रस्ताव रखेंगें कि ब्लॉक स्तर पर 10 क्विंटल की क्षमता और पंचायत स्तर पर एक क्विंटल की क्षमता का खाद्य बैंक स्थापित किया जाए।

गरीब जनता को भोजन और राशन उपलब्ध करवाने की तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद वे क्या कारण हैं कि हाशिये पर रह रहे लाभार्थी इन योजनाओं का लाभ लेने से वंचित रह जाते हैं? मौतों पर लीपापोती करने के बजाय अगर उन कारणों की पड़ताल कर खाद्यान की सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को दुरुस्त करने की दिशा में सरकार कोई कदम उठाती तो यह अधिक विश्वसनीय और पारदर्शी दिखाई पड़ता। भूख से जंग के पारंपरिक तौर-तरीकों से अलग भी किसी पहल की शुरुआत की जा सकती है। अर्जुन मुंडा द्वारा शुरू किए गए ‘मुख्यमंत्री दाल-भात योजना’ का बुरा हाल हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्रित्व काल में ही होने लगा था। पिछले साल इस योजना का नाम बदलने का प्रस्ताव सामने आया और कहा गया कि अब सस्ते दाम पर पका-पकाया भोजन वितरित करने वाली योजना को ‘मुख्यमंत्री कैंटीन योजना’ के नाम से चलाया जाएगा। रघुवर दास के नेतृत्व में इस संबंध में राज्य कैबिनेट की बैठक में निर्णय भी ले लिया गया लेकिन आज यह योजना खुद ‘भुखमरी’ की शिकार नजर आती है।

अहम सवाल यह है कि भूख से हो रही मौतों के सिलसिले को रोकने की जिम्मेवारी अगर सरकार की नहीं है तो किसकी है? प्रजातान्त्रिक लोकतंत्र में सरकारें घोषणा-पत्र के माध्यम से जनता को वादा करके सत्ता हासिल करती है और इसी वजह से जनता को यह अधिकार होता है कि वह अपनी सरकार से जवाब तलब कर सके। देश का संविधान सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के ससम्मान जीने का अधिकार प्रदान करता है। मानव विकास के तीन महत्वपूर्ण आयामों – लंबी और स्वस्थ ज़िंदगी, ज्ञान तक पहुंच और बेहतर जीवनशैली तक पहुंच – के आधार पर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा तैयार की जाने वाली 188 देशों की सूची, ह्युमन डेवलपमेंट इंडेक्स, में भारत 131वें स्थान पर है, वहीं इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट (IFPRI) की रिपोर्ट के मुताबिक 119 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) में भारत 100वें पायदान पर है। ऊपर से भूख से लगातार हो रहीं मौतें के कारण विश्व समुदाय में ‘नए भारत’ का सपना परोसने वाली सरकार की खासी किरकिरी हो रही है।

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बहरहाल, राज्य में महत्वाकांक्षी ‘मोमेंटम झारखण्ड’ जहाँ एक ओर निवेशकों को लुभाने करने की चमकीली कवायत की कहानी बयाँ करता है, वहीं दूसरी ओर संतोषी, बुधनी, सावित्री और मीना की मृत्यु उस चमक की तलहटी के गुप्प अँधेरे को उजागर कर रही है।

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