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मुख्यमंत्री जी,
खबरें बहुत लिखी और ख़ारिज की जा चुकी हैं। आपकी घोषणाओं का पुलिंदा भी अख़बारों व अन्य दृश-श्रव्य संचार साधनों के रथ पर सवार हो झारखण्ड में विकास की इबारत लिख ही रहा है। विकास गाथा के प्रचार में आपने विज्ञापनों में करोड़ों रुपये खर्च किये हैं। आप स्वयं भी बहुमत की सरकार के मुखिया होने के बावजूद राजनीतिक उठापटक की काट निकालने में उलझे ही रहते हैं। बावजूद इसके विकसित झारखण्ड के निर्माण हेतु मोमेंटम झारखण्ड व अन्य आयोजनों के जरिये आप ‘सबका साथ और सबका विकास’ करने हेतु साढ़े 3 साल से सचेष्ट भी दिखे। फिर भी गिरीडीह के डुमरी प्रखंड के चैनपुर पंचायत स्थित मंगरगढ़ी की सावित्री आप के मोमेंटम का विकास देखने हेतु नहीं रुकी। आप ही बतायें कैसे और क्यों मरी सावित्री?

पूरे भारत में खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू है, इसके तहत हर जरूरतमंद परिवार को अनाज की उपलब्धता सुनिश्चित कराना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। झारखण्ड में भी खाद्य आपूर्ति विभाग यह जिम्मा उठाता है। राशन कार्ड के माध्यम से ऐसे परिवारों को जनवितरण प्रणाली की दुकानों से अनाज दिया जाता है। (उक्त विभाग के आपके मंत्रिमंडल सहयोगी विभाग के साथ-साथ आपकी टांग खिंचाई का भी जिम्मा सत्तापक्ष में होकर भी उठाते ही दिखते हैं) इन सब के बावजूद मंगरगढ़ी गांव की सावित्री देवी को झारखण्ड सरकार का तंत्र एक अदद राशन कार्ड तक मुहैया नहीं करा सका, आखिर कयों? मोमेंटम झारखण्ड के अगले एपिसोड की तैयारी के बीच गरीब सावित्री राशन कार्ड के अभाव में सरकार से मिलने वाले अनाज से भी वंचित रह गयी। परिणामस्वरूप कई दिनों तक उसे भोजन नसीब नहीं हुआ और अंतत: उसने भी भूख और भात की लड़ाई मे दम ही तोड़ दिया।

रघुबर जी, भात- भात कहते हुए पहले भी आप ही के कार्यकाल में कुछ मौतें हुई हैं। आपके दलीय प्रतिपक्ष वाले मंत्री जी ने इसके लिये पूर्व मुख्यसचिव को कटघरे में खड़ा कर पहले भी आपकी फ़जीहत की है। छोड़िये इन सब बातों को, भूख से मौत के आंकड़ों व उलाहनों को किनारे रख बस इतना ही विमर्श किया जाये कि सावित्री को छह वर्ष पूर्व ही पेंशन स्वीकृत हो गया था फिर भी उसे प्रदेश का प्रशासनिक तंत्र विधवा पेंशन सुनिश्चित नहीं करा सका, आखिर कयों? मंगरगढ़ी निवासी स्व. द्वारिका महतो की 62 वर्षीया पत्नी सावित्री देवी लगातार 3 दिनों तक भूख से तड़पती रही लेकिन प्रशासनिक तंत्र के कानों तक आवाज नहीं पहुंची।हां, भूख से मौत की खबर आने के बाद इलाके में हलचल जरुर मच गयी और पंचायत प्रतिनिधियों के अलावा विधायक व प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी भी पहुंचे, किन्तु सवाल यह उठता है कि 15 जुलाई 2014 को ही मृतका के नाम विधवा पेंशन की स्वीकृति मिल गयी थी, बावजूद इसके सांसे चलने तक सावित्री को झारखण्ड का मोमेंटम वाला तंत्र आखिर विधवा पेंशन क्यों नहीं दे पाया? 2011 के आर्थिक जनगणना के आंकड़ों की किताब में सावित्री का नाम नहीं था, इस कारण न तो उसे राशन कार्ड मिला और न ही प्रधानमंत्री आवास योजना सहित अन्य योजनाओं का लाभ।

तंत्र की पल्ला झाड़ प्रवृति देखिये – “पंचायत के मुखिया राम प्रसाद महतो का कहना है कि सावित्री का राशन कार्ड बनाने के लिए चार माह पूर्व ही ऑनलाइन आवेदन किया गया था किन्तु इसे सत्यापित कर आगे नहीं बढ़ाया गया जिस कारण उसका राशन कार्ड नहीं बन पाया। अगर उसे राशन कार्ड मिला होता तो भूख से उसकी मौत नहीं होती। प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी शीतल प्रसाद काशी ने उक्त महिला को राशन कार्ड नहीं मिलने के लिए पंचायत सचिव को जिम्मेदार ठहराया।शीतल प्रसाद काशी ने कहा कि जांच में पाया गया कि मृतका के परिजनों की माली हालत खराब होने के बावजूद पंचायत सेवक व डीलर की लापरवाही के कारण ही राशन कार्ड नहीं बन सका।उन्होंने कहा कि आवेदन को सत्यापित कर उन्हें नहीं दिया गया जिस कारण कार्ड नहीं बन पाया।सीएम साब,आप जांच बिठायेंगे तो अन्य पल्ला-झाड़ टिप्पणियां फ़ाइल मोटी करती आप तक पहुंचेंगी लेकिन कौन है इसका जिम्मेदार?

मुख्यमंत्री जी, जिस सुस्त और संवेदनहीन तंत्र के बूते आप विकसित और खुशहाल झारखण्ड की बात करते हैं वो रोज एक सावित्री की बलि ले रहा है और नकेल न कसी गयी तो आगे भी लेता रहेगा। क्या आपकी संवेदना भी मर चुकी है? यदि नहीं, तो भुखमरी और बेकारी से मौत के इस सिलसिले को रोकने का मोमेंटम चलायें। जनाब! राजनीति को ताक पर रख आम-अवाम की जठराग्नि को शांत करिये वरना आह आपको ही लगेगी।

कुमार कौशलेन्द्र
सह-संपादक, हिंद वॉच (झारखण्ड)

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