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राफेल विमान सौदा केंद्र सरकार और खासकर प्रधानमंत्री की निजी छवि के लिए घातक सिद्ध होता जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि प्रधानमंत्री की साख को जितना विरोधियों के हमले ने नुक्सान पहुंचाया है उससे कहीं अधिक नुक्सान खुद उनकी चुप्पी ने पहुँचाया है। प्रधानमंत्री मोदी हर छोटी से छोटी बात पर बड़ी बेबाकी से बयान देने के लिए जाने जाते हैं। तीन तलाक, गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी और स्वच्छता जैसे मुद्दों पर मुखरता से बोलने वाले पीएम मोदी अगर राफेल जैसे गंभीर मामले पर कुछ नहीं बोलते हैं, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसुआं ओलान्द के बयान के जवाब में प्रधानमंत्री मोदी के पास बोलने के लिए कुछ नहीं है। हालांकि केंद्र सरकार के मंत्रियों और भाजपा के नेताओं ने ओलान्द के बयान पर सवाल उठाये हैं लेकिन अहम सवाल यह है कि अगर फ्रांस के एक पूर्व राष्ट्रपति के बयान में सच्चाई नहीं है तो इसका खंडन फ्रांस की सरकार ने क्यूँ नहीं किया?

इसमें कोई शक नहीं है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को “बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाने वाला” बोलने वाले प्रधानमंत्री मोदी जब खुद मनमोहनी चुप्पी धारण कर लेंगें तो उनकी विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है। आजकल पीएम मोदी लगातार सभाएं कर रहे हैं और उनकी चुप्पी से उपजे असंतोष और अविश्वसनीयता का असर उन रैलियों में देखने को मिलने लगा है।

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ने जिस फ्रांसीसी अखबार “मीडियापार्ट” को यह बयान दिया है, एक प्रतिष्ठित अखबार है। इसलिए ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है कि किसी विरोधी पार्टी के एजेंडे के तहत ओलान्द के इस बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। 10 अप्रैल 2015 को नरेंद्र मोदी और ओलान्द के बीच ही रफाएल करार हुआ था। ओलान्द के अनुसार अनिल अम्बानी की कंपनी का नाम राफेल सौदे में बिचौलिये की भूमिका निभाने के लिए भारत सरकार ने ही दिया था। अगर ऐसा है तो देश को बताने में क्या हर्ज है कि किस आधार पर एक नौसिखिया कंपनी की अनुशंसा इतने बड़े सौदे के लिए केंद्र सरकार किया? बात निकली है तो देश यह भी जानना चाहेगा कि साठ साल पुरानी सरकारी कंपनी हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड (HAL), जिसे पांच दशक से जहाजों के निर्माण का अनुभव है, का नाम अंतिम सौदे के अंतिम चरम में पहुंचकर कैसे गायब हो गया। गौर से देखें तो यह किसी फिल्मी कहानी की तरह है जिसमें सबकुछ पारदर्शी नहीं है।

इस डील की शुरुआत यूपीए शासनकाल में हुई थी। मोदी सरकार ने 36 राफेल विमानों के लिए जो कीमत चुकाई है, वह यूपीए सरकार द्वारा किए जा रहे सौदे से बहुत ज्यादा है। यूपीए सरकार में 12 दिसंबर, 2012 को 126 राफेल राफेल विमानों को 10.2 अरब अमेरिकी डॉलर (तब के 54 हज़ार करोड़ रुपये) में खरीदने का फैसला लिया गया था। इस डील में एक विमान की कीमत 540 करोड़ थी। इनमें से 18 विमान तैयार स्थिति में मिलने थे और 108 को भारत की सरकारी कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), फ्रांस की कंपनी के साथ मिलकर बनाने वाली थी। 2015 में मोदी सरकार ने इस डील को रद्द कर इसी जहाज़ को खरीदने के लिए नई डील की जिसमें एक विमान की कीमत लगभग 1640 करोड़ हो गयी और केवल 36 विमान ही खरीदें जा सके।

इस पूरे मामले में दो बातें ऐसी हैं, जिनकी वजह से विरोधियों को सीधे-सीधे प्रधानमंत्री की ओर ऊँगली उठाने का मौका मिल रहा है। पहली बात कि सरकारी अनुभवी कंपनी की जगह अनिल अम्बानी की नौसिखिया अनुभवहीन कंपनी की अनुशंसा सरकार ने क्यूँ की? और दूसरी यह कि सरकारी खजाने से एक विमान के लिए 1500 करोड़ रुपये से ज्यादा की कीमत क्यूँ चुकायी गयी? इन दो अहम सवालों पर पर्दा डालने के लिए रोज टेलीविजन पर तरह-तरह की बहसें और कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। किसी कार्यक्रम में राफेल के गुण गाए जा रहे हैं तो किसी कार्यक्रम में राहुल गाँधी को मर्यादा का पाठ पढ़ाया जा रहा है। लेकिन देश का रक्षा मंत्री या केंद्र सरकार का कोई मंत्री या स्वयं प्रधानमंत्री इन दो महत्वपूर्ण सवालों का सीधा-सीधा जवाब देने से बच रहे हैं।

इसमें कोई शक नहीं है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को “बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाने वाला” बोलने वाले प्रधानमंत्री मोदी जब खुद मनमोहनी चुप्पी धारण कर लेंगें तो उनकी विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है। आजकल पीएम मोदी लगातार सभाएं कर रहे हैं और उनकी चुप्पी से उपजे असंतोष और अविश्वसनीयता का असर उन रैलियों में देखने को मिलने लगा है। रांची में जब प्रधानमंत्री मोदी ने आयुष्मान भारत योजना का शुभारम्भ कर रहे थे तब बड़ी संख्या में जनता रैलीस्थल से वापस जाने लगी थी। एक तरफ प्रधानमंत्री का भाषण चल रहा था और दूसरी तरफ पंडाल खाली हो रहे थे। इस घटना को मुख्यधारा की मिडिया ने तो नहीं दिखाया लेकिन सोशल मीडिया में इस महारैली में पीएम के भाषण के दौरान वापस लौट रही जनता की भारी भीड़ वाले वीडियो खूब वायरल हुए। ऐसा ही भोपाल में भी हुआ। वहां जब पीएम मोदी बोल रहे थे तब कुर्सियां खाली पड़ी थीं। भोपाल में तो रैलीस्थल पर भाजपा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के पोस्टरों पर अज्ञात तत्वों ने कालिख भी पोत दी थी जिसकी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज भी करवाई गयी।

प्रधानमंत्री मोदी अगर खुलकर बात करते तो शायद देश को यह यकीन होता कि सरकारी खजाने को दरिया की तरह बहाने के पीछे सरकार की क्या मजबूरी थी लेकिन उनकी चुप्पी से राफेल सौदे का पूरा मामला संदिग्ध होता चला जा रहा है।

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समानता और लोकतंत्र में गहरी आस्था रखने वाले सुशील एक निर्भीक पत्रकार होने के साथ-साथ प्रगतिशील युवा कवि और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं एवं साहित्यिक ई–पोर्टल्स में उनकी कविताएँ, आलेख और लघुकथाएँ प्रकाशित हो चुकी है। ग्रास-रूट जर्नलिज्म (ज़मीनी पत्रकारिता) उनके काम की विशेषता है। लेखन के साथ–साथ सामाजिक–सांस्कृतिक क्षेत्र में भी वे बेहद सक्रिय हैं। उन्होंने लम्बे समय तक एच.आई.वी./एड्स जागरूकता और बचाव के लिए उच्य जोखिम समूह के साथ काम किया है। सुशील हिंद वॉच मीडिया समूह के संपादक हैं। हिंद वॉच जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल, मोबाइल ऐप और व्यापक सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है। भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है।