Print Friendly, PDF & Email



ऋषभ जी एक चिंतक और लेखक हैं। इस क्षेत्र में थोड़ा बहुत उनका नाम भी है और पेशे से अध्यापक जो हैं, अपने कार्यस्थल के बाद वे अपना अधिकतर समय लेखन और चिंतन को ही देते हैं। उनके मित्रों को यह सब अच्छा नहीं लगता था कि वे सामाजिक सरोकार में शून्य हैं। उनके परिवार के सदस्य उनकी इसी आदत से खफा रहते थे। बेचारे ऋषभ जी को हमेशा उनसे डिस्टर्ब होने का खतरा मंडराता रहता था और वे लोग ऐसा करते भी थे, अतः जब भी वे लिखने के लिए अपने कमरे में होते थे, तो डोंट डिस्टर्ब की जगह, ‘सावधान मैं किताब लिख रहा हूँ’ की तख्ती लटका देते थे, मित्र और घरवाले उन पर रहम कर मन मसोस के रह जाते कि चलो किताब लिखने का प्रयास करने दो। इसी कारण खुश होकर अपना भी जिक्र कर कभी किताब में सराहनीय योगदान के लिए हमारा नाम छाप दें। घर के लोग इसे फालतू काम समझ कर ज्यादा महत्व नहीं देते थे, कहावत सही ही है कि घर की मुर्गी दाल के बराबर होती है इनके साथ भी यही विडंबना है।

ऋषभ जी के घर हम कुछ मित्र जा धमके तो हमने पूछा की सर कहाँ हैं? उनकी धर्म पत्नी ने अपना धर्म निभाते हुए तुनक कर कहा कि – किताब लिखने का काम जोरों पर है। आए दिन यही काम तो चलता है। पहले की छपी किताबें यूँ ही धूल खा रही हैं और नई का शौक लगा है। आजकल खरीदता कौन है सप्रेम भेंट का सिलसिला चलता है वो लोग भी बिना पढ़े अपनी शेल्फ की शोभा बढ़ाने के लिए रख छोड़ते हैं। इनका क्या आर्थिक बजट गड़बड़ाता है तो भोगना तो हम सब को ही पड़ता है उनकी व्यथा उनके दर्द की झलक दिखा रही थी। उनसे सहानुभूति दिखाते हुए मित्र पांडे जी कहने लगे कि हम तो रोज ही सर को समझाते हैं कि सर आजकल अच्छे लेखन की कद्र करने वाले कम ही बचे हैं। नामी गिरामी लेखक भी पाठकों की कमी से जूझ रहे हैं। रायल्टी तो क्या अपना पैसा खर्च कर सर जैसे लोग साहित्य सेवा में लगे हुए हैं।

दूसरे मित्र पटेल जो कर्मचारी नेता हैं, कहने लगे कि आजकल तो नेता, मंत्री व बड़े ओहदे के लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति, हताशा, बदले की भावना, एक दूसरे को नीचा दिखाने का टारगेट रख कर लिखने वाले तो रातों रात हीरो बन जाते हैं और उनकी किताबों की प्रतियाँ हाथों-हाथ बिक भी जाती हैं। फिर पोल-खोल के बदले रायल्टी भरपूर पाते हैं। लेखक और प्रकाशक दोनों ही के वारे न्यारे हो जाते हैं। इतिहास गवाह है कि सरस्वती और लक्ष्मी असली साहित्यकारों पर एक साथ कम ही मेहरबान होती हैं।

चर्चा अपने चरम पर थी कि सर जी का आगमन खलनायक की भाँति हुआ उनकी पत्नी ने गुर्राहट भरी नजरों से उपहास करते हुए कहा कि हमारे लिए तो समय ही नहीं है। पूरा समय तो किताब में खपा देते हैं। हमारा जीवन तो बस जीरो बटे सन्नाटा हो गया। सर अपने को अपमानित अनुभव करते हुए कहने लगे, गीता के ज्ञान के अनुसार कर्म का फल आज नहीं तो कल मिलेगा उसी आशा के साथ लिख रहा हूँ। उनकी पत्नी बोली गीता का ज्ञान अपने पास रखो और वर्तमान में विश्वास करना सीखो।

पटेल जी न जाने क्या-क्या उदाहरण देकर गर्माहट को ठंडक में बदलने का असफल प्रयास करते हुए बोले कि क्या हमने गलत समय पर आकर गृह युद्ध का आगाज कर दिया? वह भाभी जी की और मुखातिब होकर बोले चलो कुछ खिलाओ-पिलाओ और भाभी का फर्ज अदा करो।

इस सूत्र का उपयोग करते हुए वह समझौता एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाने लगे। और मामला ठंडा होने की कगार पर था कि ऋषभ जी अपनी करुण कथा सुनाते हुए कहने लगे कि अभी जिस किताब पर काम चल रहा है वह निःसंदेह मेरे लिए बहुत उपयोगी साबित होगी और विरोधियों को धूल चाटनी पड़ेगी। हो सकता है कि मुझे कोई राष्ट्रीय सम्मान मिल जाए। सब देखते रह जाएँगे।

पटेल जी फिर से चहक उठे और बोले कि सम्मान वम्मान की बात तो झूठी है ऋषभ जी… आजकल इसमें भी गुटबाजी, राजनीतिक पैंतरेबाजी, तिकड़म, जी हुजूरी होती है। अगर आप इनमें से किसी भी कला में पारंगत नही हैं और केवल उत्कृष्ट लिखने में ही मशगूल है तो इससे कुछ नहीं होता है। सरकारी पुरस्कार के लिए जो चाहिए वह आपके पास नहीं है ऋषभ जी। मेरे मन में विचार कौंध रहा था कि बेचारे ऋषभ जी जैसे अनगिनत लेखकों की लेखनी यूँ ही गुमनाम रह जाती है। किताब लिखने वाले, कुछ शौक (रुचि) या शोक (दुख) से, कुछ आत्म प्रेरणा से या दुर्भावना से प्रेरित होकर तो कुछ निस्वार्थ और स्वार्थ के वशीभूत हो कर लिखते है। ऋषभ जी तो इनमें बिरले ही हैं जो समाज को सुधारने के लिए कटिबद्ध और साहित्य सेवा में लीन है, फिर भी लोगबाग उनकी उपेक्षा करने में कसर नहीं छोड़ते हैं।

पटेल जी हैं कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उन्हें बोलने की बीमारी है। कहने लगे कि ऐसे लोगों की किताब का विमोचन का खर्च भी बच जाता है। ऋषभ जी जैसे लेखकों की पुस्तक विमोचन के बाद भी उतनी भी पहचान नहीं बना पाती है और तो और न दृश्य मीडिया में और न प्रिंट मीडिया में मुख्य खबर बनती है पर राजनीति से प्रेरित किताबें ब्रेकिंग न्यूज तो बनती ही है साथ ही कई दिनों तक चैनल उसका राग अलापते रहते है।

मैं सबकी बातें सुनकर विचारणीय मुद्रा में विचार कर ही रहा था कि पटेल जी बोले आप भी तो कुछ बोलिए। मैंने कहा अब बोलने को क्या बचा है – फिर भी आजकल किताबी वार के कारण राजनीति में हड़कंप मचा हुआ है कहीं गम तो कहीं खुशी का आलम है। न्यूज चैनलों ने इन्हें किताबी बम तक कह डाला। हमारे देश में जुबानी जंग अब किताबी जंग में तब्दील हो रही है और इसमें हम नित नए आयाम रच रहे हैं।

हम विकासशील से विकसित हो गए है। किताब लिख कर कीचड़ उछालने में हमारा कोई सानी नहीं है। कोई कभी भी किसी पर किताब लिख सकता है। अब चर्चा को विराम देकर और ऋषभ जी को उनकी किताब की शुभकामनाएँ देकर हम अपने घरों की ओर चल दिए पर सहित्य और लेखक के बारे में समाज की सोच मन को झकझोर रही थी। लगता है वाकई हम सब महान है।

इस पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया ⇓
loading...