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जो लोग अभी तक मुझे बड़ा लेखक मानने से इन्‍कार करते हैं उनकी उदासीनता को मैं क्‍या कहूँ! वैसे अगर वे मुझे बड़ा लेखक मान लें तो उनका एक पैसा भी खर्च न होगा ओर मैं मुफ्त में बड़ा लेखक हो जाऊँगा। जो भी हो, मैंने अपना ढाँचा बड़े लेखक का बना लिया है। सिर में ब्राह्मी का तेल लगाता हूँ और टैगोर की तरह दाढ़ी बढ़ा रहा हूँ। दरवाजे पर एक पहरेदार रख लिया है, जो लोगों को मेरे पास आने से रोकता है, कहता है कि जरा हमारे लेखकजी की दाढ़ी बढ़ जाने दीजिए, तब आइएगा। वह कहता है कि हमारे लेखकजी लिखने के पीछे इतने व्‍यस्‍त हैं कि लिखते-लिखते अपनी लिखावट पर ही सो जाते हैं। जब वह सोकर उठें तो आकर भेंट कर लीजिएगा। फल हुआ कि लोगों ने मेरे पास आना-जाना, मिलना-जुलना बंद कर दिया है। अब तो वे लोग भी नहीं आते जो बार-बार उपहार में मेरी किताब लेने के लिए आया करते थे। इधर इतना सूनापन भर गया है कि मैं ही सोचता हूँ कि लिखना-पढ़ना छोड़कर घर से निकल जाऊँ और लोगों से मिलता रहूँ। अकेले पड़ा-पड़ा बोर मालूम होता है। उस दिन ऐसा ही सोच रहा था। उसी समय मेरा दरबान आ पहुँचा – हुजूर, एक गाय साहब आए हुए हैं। कहते हैं कि आपसे मिलना बड़ा जरूरी है।

मैंने कहा, “गाय आयी हुई हैं, क्‍यों आई हुई हैं? कहाँ से आई हैं… डेरी फार्म से?”

उसने कहा, “जरूरी मुलाकात के लिए आए हुए हैं। किसी तरह का फारम तो उनके पास नहीं देखा?”

यह ताज्‍जुब है कि किसी लेखक से मिलने के लिए कोई गाय चली आए। यह तो वैसा ही आश्‍चर्यजनक हो गया कि जैसे किसी उपन्‍यासकार के पास किसी उपन्‍यास की नवयुवती नायिका चली आए। मगर गायजी को मैं बिठाऊँ कहाँ? मनुष्‍यों की कुर्सी का भी अभाव है तो गाय की कुर्सी किधर से लाऊँ! सोचा कि चलो, बाहर ही खड़े-खड़े बात कर लूँगा और धन्‍यवाद देकर विदा कर दूँगा। कमरे में आकर अगर गोबर कर दें तो उठाना मुश्किल हो जाएगा। बाहर निकला तो देखता हूँ कि गाय नहीं, मिलने के लिए बैल आए हुए हैं। तब दरबान की बात याद आई कि उसने कहा था, एक गाय साहब आए हुए हैं। मैंने हाथ जोड़कर कहा, “नमस्‍ते जी, कहिए, कैसे आना हुआ?”

बोले, “मैं कुटीर-उद्योग भंडार से आ रहा हूँ। शायद आप मुझे पहचानते ही होंगे। मैं वहाँ कोल्‍हू में तेल पेरता हूँ। हमारे भंडार में गांधीजी की चिट्ठी लटकती रहती है। आपने भी देखा होगा।”

सह कहूँ तो मैंने यह सब कुछ नहीं देखा है। मगर सिर इस तरह हिलाया कि सब देखा है, सब जानता हूँ – अब आगे कहिए आप क्‍या कहना चाहते हैं? मन में एक प्रकार की विरक्ति भी हुई कि लेखक से मिलने आ गए और अपने साथ न रोमांच लाए, न यौन समस्‍या की कोई मा‍नसिक उलझन। न इनके पास प्रगतिवाद है और न द्वंद्वात्‍मक भौतिकवाद। मन कुछ विरक्‍त होने लगा।

बैलजी ने कहा, “सुनिए महोदय, मैंने सुना है कि आप लेखक हैं। मैं चाहता हूँ कि आप मेरी जीवन-कथा सुन लें और उसके बाद मेरा जीवन-चरित लिखकर किसी पेपर में छपवा दें। इससे संसार का बहुत लाभ होगा।”

मैंने कहा, “बंधुवर, दुनिया अब बदल गई है। संसार सोचता है कि अब एटम बम से ही उसका लाभ होने वाला है, जीवन-चरित से लाभ नहीं होता। इसके अलावा तमाम किस्‍म के भाषणों और वक्‍तव्‍यों को छापने के बाद पेपर में जीवनचरित के लिए जगह भी नहीं निकल पाती। इसलिए आपको जो भी कहना है किसी वक्‍तव्‍य की तरह कहें या इंटरव्‍यू के रूप में बतलाएँ। तब मैं सोच सकता हूँ कि मैं आपके किस लायक हूँ।”

“… अच्‍छा, तो यह बात है!” बैलजी ने बड़ी गंभीरता से कहा, “खैर, कोई बात नहीं। मैं संक्षेप में ही कहता हूँ। आप उसमें भी थोड़ा संक्षेप मिलाकर किसी पेपर में छपवा दें तो संसार का उपकार हो जाएगा।”

उसके बाद उन्‍होंने जो कुछ बतलाया उसका संक्षेप इस प्रकार है – मैं बैल हूँ, यह आप देख ही रहे हैं। मैंने गांधीवाद के प्रचार के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। आज कई वर्षों से कुटीर-उद्योग भंडार में तेल पेरता हूँ। मेरी आँखों में पट्टी बँधी होती है और मैं तेल पेरता रहता हूँ। मैंने अपने जीवन को संयत बना लिया है और थोड़ी-सी घास तथा तेल की खली खाकर गुजारा कर लेता हूँ। आखिर सादगी रखनी चाहिए या नहीं?

मैंने सिर हिलाया, “जी हाँ, आप ठीक कहते हैं। सादगी तो रखनी ही चाहिए। आप तो सादगी के अवतार मालूम पड़ते हैं। सादगी के मारे खादी भी नहीं पहनते और घास और खली खाकर गुजारा कर लेते हैं। मगर मैं यह नहीं समझ पाया कि किसी पेपर के लिए आपके इंटरव्‍यू की उपयोगिता क्‍या है?”

उन्‍होंने मेरी ओर देखते हुए सिर हिलाया। बोले, “उपयोगिता है और जरूर है, मैं ओवरटाइम भी करता हूँ। लेकिन मुझे ओवरटाइम के लिए कुछ नहीं मिलता। दिन हो, रात हो, शाम हो, सवेरा हो, मुझे हर वक्‍त काम में लगा रहना पड़ता है। मगर न मुझे ओवरटाइम मिलता है और न किसी तरह की बढ़ोत्तरी ही होती है। आप देखिए, केंद्रीय सरकार में काम करने वालों का वेतन कई बार बढ़ चुका। लोगों को प्रमोशन भी मिला है। मगर मैं चुपचाप तेल पेरता रहता हूँ, और मेरे लिए कुछ भी नहीं।”

उसकी बात सुनकर मन बड़ा विरक्‍त हो गया। यह बैल निश्‍चय ही आलसी है और मुफ्त में वेतन बढ़वाने पर तुला हुआ है। ऐसे लोगों को पब्लिसिटी नहीं मिलनी चाहिए। मैंने पूछा – “आप दिन-रात में कितना तेल पेर लेते होंगे?”

बैलजी ने कहा, “मेरी आँखों पर पट्टी बँधी रहती है, इसलिए ठीक-ठीक देख नहीं पाता, लेकिन दिन और रात मिलाकर तीन-साढ़े-तीन सौ मन तेल तो जरूर ही पेर लेता हूँ।”

“साढ़े तीन सौ मन!” मैं आसमान से गिरा। मेरे मुँह से निकला, “ऐसा असम्‍भव है। एक बैल इतना तेल कदापि नहीं पेर सकता।”

उसने कहा, “लेखक होकर भी आप इस तरह चौंकते हैं!”

उसने मुझे शिक्षा देकर बतलाया कि “आप हिसाब कर लें। अगर मैं गलत बतलाऊँ तो मेरा कान पकड़ लीजिए। देखिए, प्रतिदिन दो सौ मन तो खुदरा बेचने वाले दुकानदार ले जाते हैं। इसके अलावा जेल है, अस्‍पताल हैं, सेनिटोरियम हैं, होटल हैं, वहाँ हमारा तेल डाइरेक्‍ट जाता है। सब मिलाकर साढ़े तीन सौ मन तेल रोज होता है या नहीं। विश्‍वास न हो तो आप जाँच-आयोग बैठा दीजिए और देख लीजिए कि मैं सच कह रहा हूँ या झूठ।”

मैंने कहा, “भाई बैलजी, आपकी बात पर मुझे अभी तक विश्‍वास नहीं होता। मैं जाँच कर लूँ तब उसके बाद ही आपकी बात पर विश्‍वास कर सकता हूँ। अगर आप रोज साढ़े तीन सौ मन तेल पेरते हैं तो आप विश्‍व के सर्वश्रेष्‍ठ बैल हैं।”

उसने कहा, “मैं संसार का सर्वश्रेष्‍ठ बैल तो हूँ ही। मैं गांधीवादी बैल हूँ। कोई दिल्‍लगी नहीं है। जी चाहे तो आप मेरे उद्योग भंडार में जाकर जाँच कर लें।”

मैंने उसका फोटो खींच लिया और जाँच का आश्‍वासन देकर विदा कर दिया। बात झूठ तो थी ही। भला यह भी कभी संभव है कि एक बैल एक दिन में साढ़े तीन सौ मन तेल पेर ले। इतना तेल तो तेल की मिल में नहीं निकल सकता। मगर यह बैल ऐसा है जो गांधीवादी होकर भी झूठ बोल रहा था। आजकल झूठ का ही बोलबाला है।

उसने अपना पता बतलाया था ‘कुटीर-उद्योग भंडार’। वहाँ पहुँचने में कोई दिक्‍कत नहीं हुई। जाकर देखा कि हमारे चिर-परिचित बैलजी आँख पर पट्टी लगाकर अकेले तेल पेर रहे हैं और तमाम तेल के मटके रखे हुए हैं। देखने में लगता था कि जैसे अलीबाबा के यहाँ चालीस चोरों के तेल वाले मटके रखे हों। दुकान में बिक्री भी काफी दीख पड़ी। कोई एक मन तेल माँग रहा था, कोई दस मन। वहाँ पाँच आदमी काम कर रहे थे और किसी को तेल बेचने से फुरसत नहीं थी। एक बैल है जो तेल पेरता जा रहा है और एक ही घंटे में कई मटके तेल बिक-बिकाकर खत्‍म हो जाते हैं। मालूम होता है जैसे तेल की नदी बह रही है।

मुझे निठल्‍ले की तरह खड़ा देखकर उद्योग भंडार के मालिक ने पूछा, “आप?”

“जी हाँ, मैं देख रहा हूँ।”

उसने कहा, “क्‍या देख रहे हैं! यहाँ असली सरसों का तेल मिलता है। किसी तरह के फरेब की यहाँ गुंजाइश ही नहीं। तेल आपके सामने पेरा जा रहा है।”

मैंने कहा, “जी हाँ, देख रहा हूँ। तेल मेरे ही सामने पेरा जा रहा है।”

उसने कहा, “मेरे यहाँ किसी किस्‍म का गोलमाल नहीं। मैं स्‍कूल और कॉलेज के सत्तर होस्‍टलों में तेल की सप्‍लाई करता हूँ। दस सेनिटोरियम और सतरह अस्‍पतालों में भी मेरा तेल जाता है। मेरा तेल स्‍वास्‍थ्‍यवर्द्धक है जी, तमाम दुकानदार भी मेरे यहाँ से घानी का तेल ले जाया करते हैं।”

मैंने पूछा, “आपका सारा तेल असली होता है?”

उसने कहा, “देख लीजिए, आपके सामने ही तेल पेरा जा रहा है। आँख के सामने की चीज है। देख लीजिए और विश्‍वास कर लीजिए।”

मैंने तेल पेरते हुए उस बैल को देख लिया। तेल भी असली था और बैल भी असली था। अगर वहाँ कुछ गलत था तो गांधीवाद ही अविश्‍वसनीय था। मैंने देखा कि तेल पेरने वाला बैल बहुत दुबला हो गया है और कुटीर-उद्योग भंडार के मालिक बेतरह मोटे पड़ गए हैं। 000

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