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र्वेश्वर दयाल सक्सेना हिन्दी साहित्य जगत के एक ऐसे शख्स हैं, जिनकी लेखनी से कोई विधा अछूती नहीं रही। चाहे वह कविता हो, गीत हो, नाटक हो अथवा आलेख हों। जितनी कठोरता से उन्होंने व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों पर आक्रमण किया, उतनी ही सहजता से वे बाल साहित्य भी रचते रहे। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना मूलतः कवि एवं साहित्यकार थे, पर जब उन्होंने ‘दिनमान’ का कार्यभार संभाला तब समकालीन पत्रकारिता के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को समझा और सामाजिक चेतना जगाने में अपना अनुकरणीय योगदान दिया।

उनका जन्म 15 सितंबर 1927 को बस्ती(उ.प्र) में हुआ था। सर्वेश्वर दयाल एक छोटे से कस्बे से अपना जीवन शुरू किया लेकिन जिन रचनात्मक उचाईयों को उन्होंने छुआ, वह अपने आप में ऐतिहासिक है। उनका मानना था कि हमारे पास बच्चों के लिए साहित्य बहुत कम मात्रा में है, इससे बच्चों का भविष्य अधर में होगा।
उनकी अनुभूतियाँ, तड़प, तकलीफें मिलकर कविता में बदल जाती हैं। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियों में भी नौकरी की, 1964 में जब ‘दिनमान’ पत्रिका शुरू हुई तो सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के कहने पर सर्वेश्वरजी दिल्ली आ गए और ‘दिनमान’ से जुड़ गए। पत्रकारिता में आए तब भी मुखर होकर लिखते रहे और पत्रकारिता में उभरी हुई चुनौतियों को समझते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचनाएं युवा पीढ़ी को उत्साहित करती हैं। सर्वेश्वरजी की भाषा आम बोलचाल की भाषा है, यही कारण है कि लोग सहजता से उनके साहित्य से जुड़ पाते हैं।

उनकी कविताओं में तत्कालीन जीवन के सभी स्तरों पर दिखने वाली भयावता-तानाशाही के खूँखार पंजों से लहूलुहान होती निरीह जनता की बेचारगी के दर्दीले अनुभव प्रमाणिक ढंग से व्यक्त हुए हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व किये गये सुनहरे वादों को भूलकर राजनेताओं ने क्या हालत कर दी देश की इसकी पीड़ा यह खिड़की नामक कविता में सर्वेश्वर ने मार्मिक ढंग से व्यक्त की है। झूठी आजादी और राजनेताओं के झूठे वादों से कवि इस कदर क्षुब्ध है कि वह अपनी करोड़ों भूखी जनता की पीड़ा के साथ एक कमरे में बंद हो जाना चाहता है। वह राजनेताओं द्वारा स्वतंत्रता दिवस की झांकियों में छल- विश्वाचसघा देखता है-

“यह बंद कमरा सलामी मंच है
जहाँ मैं खड़ा हूँ पचास करोड़ आदमी खाली पेट बजाते
ठठरियाँ खड़खड़ाते हर क्षण मेरे सामने से गुजर जाते हैं।
झाँकियाँ निकलती हैं ढोंग की विश्वासघात की
बदबू आती है हर बार एक मरी हुई बात की।”

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कविता की तुकबंदियों से बहुत हद तक अपने को आज़ाद रखते हैं बावजूद इसके कविता के लय में कोई अंतर नहीं आया।

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना

जो धमनियों में बजता है,…
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।

शब्दों की खोज शुरु होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से मछली की तरह फिसल जाते हैं।

हर जानकारी में बहुत गहरे
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,
कुछ भी ठीक से जान लेना
खुद से दुश्मनी ठान लेना है।

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना।

सर्वेश्वरजी की कविताओं में व्यवस्था के प्रति विरोध है, दलित और वंचित तबकों के लिए जगह है, वे लिखते हैं –

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं

उनकी अनुभूतियाँ, तड़प, तकलीफें मिलकर कविता में बदल जाती हैं। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियों में भी नौकरी की, 1964 में जब ‘दिनमान’ पत्रिका शुरू हुई तो सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के कहने पर सर्वेश्वरजी दिल्ली आ गए और ‘दिनमान’ से जुड़ गए। पत्रकारिता में आए तब भी मुखर होकर लिखते रहे और पत्रकारिता में उभरी हुई चुनौतियों को समझते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचनाएं युवा पीढ़ी को उत्साहित करती हैं। सर्वेश्वरजी की भाषा आम बोलचाल की भाषा है, यही कारण है कि लोग सहजता से उनके साहित्य से जुड़ पाते हैं।

आकाश का साफ़ा बाँधकर
सूरज की चिलम खींचता
बैठा है पहाड़,
घुटनों पर पड़ी है नदी चादर-सी,
पास ही दहक रही है
पलाश के जंगल की अँगीठी
अंधकार दूर पूर्व में
सिमटा बैठा है भेड़ों के गल्‍ले-सा।

अचानक- बोला मोर।
जैसे किसी ने आवाज़ दी-
‘सुनते हो’
चिलम औंधी
धुआँ उठा-
सूरज डूबा
अंधेरा छा गया।

उन्होंने नाटक भी लिखे, व्यंग्य विधा में शासकीय शोषण पर तंज करते हुए नाटक ‘बकरी’ लिखा –

बकरी को क्या पता था मशक बन के रहेगी,
अपने खिलाये फ़ूलों से भी कुछ न कहेगी,
उस के ही खूं के रंग से इतराएगा गुलाब,
दे उस की मौत जाएगी हर दिल अज़ीज़ ख़्वाब।

‘तीसरा सप्तक’, ‘काठ की घंटियां’, ‘बांस का पुल’, ‘एक सूनी नाव’, ‘गर्म हवाएं’, ‘कुआनो नदी’, ‘जंगल का दर्द’, ‘खूंटियों पर टंगे लोग’, ‘क्या कह कर पुकारूं–प्रेम कविताएं’ उनकी प्रमुख काव्य रचनाएं हैं। उन्होंने कई नाटक और उपन्यास भी लिखे। ‘पागल कुत्तों का मसीहा’, ‘सोया हुआ जल’, ‘उड़े हुए रंग’, ‘कच्ची सड़क’, ‘अँधेरे पर अँधेरा’ उनके उपन्यास हैं। ‘बतूता का जूता’, ‘महंगू की टाई’ बाल कवितायेँ हैं। 24 सितंबर 1983 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा।

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