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निर्माता  : अक्षय कुमार पारिजा, मनीष मुंद्रा और नील माधव पांडा
निर्देशक  : नील माधव पांडा
स्क्रीनप्ले : नितिन दीक्षित
कलाकार : संजय मिश्रा, रणवीर शौरी, तिलोत्तमा शोम, भूपेश सिंह
संगीत : संतोष जगदाले, प्रेरित सेठ
जॉनर(शैली) : सोशल ड्रामा
अवधि : 1 घंटा, 40 मिनट
हिंद वॉच मीडिया रेटिंग  :

मीडिया में ‘कड़वी हवा’ के बारे में हवा बनायी गयी थी कि यह फ़िल्म जलवायु परिवर्तन की है| कश्मीर में कोई प्रेम कहानी फिल्मायी जाती है तो वह आतंकवाद की फ़िल्म नहीं हो जायेगी| जलवायु परिवर्तन एक भौगोलिक कारक है, जिसके कारण ज़मीन बंजर हो रही है| लेकिन किसान के ऊपर बैंक के कर्जे का दबाव है, जिसके कारण वह आत्महत्या करता है| यह बैंक सरकार के नियम और शर्तों के अधीन है| गाँव के लोग लोन वसूल करने वाले कर्मचारी को ‘यमदूत’ कहते हैं| असली हत्यारे तो वहाँ भी फायदे में हैं| खैर यह फ़िल्म किसी हत्यारे की पड़ताल नहीं करती है| यह किसान हेदू (संजय मिश्रा) के बेटे के कर्जे के कारण उनके जीवन में आये विरोधाभास की पड़ताल करती है| हेदू को डर है कि दूसरे किसानों की तरह कहीं उसका बेटा भी फाँसी न लगा ले| कहानी का मर्म यही है| एक बाप का डर और इस डर की लपटों को विश्व के जलवायु परिवर्तन तक फैलाने की कोशिश की गयी है| इसी डर से हेदू कर्ज की वसूली में रणवीर शौरी का साथ देता है| उसे बाद में एहसास होता है कि ‘यमदूत’ का साथ देने से रास्ता सीधे नरक की ओर ही जाता है|

बुन्देलखंड का महुआ गाँव जहाँ 15 वर्षों से बारिस नहीं हुई है| बच्चों को तो इस मौसम का पता भी नहीं है| बुन्देलखंड के सुखाड़ और उड़ीसा के बाढ़ को आमने- सामने रखकर कहानी में नाटकीय तत्व जोड़ा गया है| फ़िल्म का असली ‘यूएसपी’ और इसकी जान तो संजय मिश्रा, रणवीर शौरी और बच्चों का अभिनय ही है| संजय मिश्रा गोलमाल जैसी कॉमेडी फिल्मों में तो कमाल करते ही हैं| कड़वी हवा जैसे ट्रैजिक रोल में रोंगटे खड़े कर देते हैं| बच्चों की एक्टिंग के बारे में क्या कहना| ये तो सचमुच के एक्टिंग गुरु हैं| बच्चे बिना किसी प्रयास के अपने किरदार की त्वचा में घूस जाते हैं और उसकी आत्मा को अपने में उतार लेते हैं|

ज्वलंत सामाजिक मुद्दों के पैरोकार निर्देशक नील माधव पांडा की यह फ़िल्म एक सोशल ड्रामा है| यह कृषिप्रधान गणतन्त्र में किसान की दुर्दशा और दुर्दिन की कहानी है| ऐसी फिल्मों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए|

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