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दिल्ली के भिन्न योग्यता के व्यक्ति ने पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी व्यथा से अवगत कराया है| संदीप तोमर ने अपने पत्र के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री जी का ध्यान इस ओर खींचने की कोशिश की है कि तमाम सरकारी दावों के बाद भी आज एक भिन्न योग्यता के व्यक्ति को देश में जगह-जगह पर कैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है| संदीप तोमर ने भिन्न योग्यता के व्यक्तियों के लिए असुगमता और सुविधाओं के आभाव जैसे मुद्दे को अपने निम्नलिखित पत्र में मुखरता के साथ लिखा है :

माननीय मोदी जी ,
मन बड़ा व्यथित है, समस्याएं अधिक है, समाधान शून्य। आप विचार कीजिये किन परिस्थितियों में एक आम नागरिक, एक ऐसा नागरिक आपको पत्र लिखता है जिसे आपने बड़े उत्साह, बड़ी उमंग के साथ दिव्यांग नाम दिया था, मान्यवर उस वक़्त लगा था कि जल्द ही देश में ऐसा कुछ कायाकल्प होगा कि दिव्यंगों को समस्या का समाधान हो जाएगा और पूरे देश में एक बाधा रहित (भौतिक और मानसिक) वातावरण का माहौल होगा। माननीय प्रधानसेवक(मंत्री भी) जी मैं ५ जून को दिल्ली से हरिद्वार ऋषिकेश यात्रा पर सपरिवार निकला था, मैंने अपने यहाँ से दिल्ली बस अड्डे मैट्रो से जाना तय किया। दिल्ली मैट्रो पर दोनों तरफ लिफ्ट न होने के चलते तो बड़ी तखलीफ़ है ही लेकिन कश्मीरी गेट मैट्रो स्टेशन पर से अंतर्राजीय बस अड्डे में किसी प्रकार की कोई सुविधा ऐसी नहीं है जिसका इस्तेमाल दिव्यांग कर सके, जिन लिफ्ट पर लिखा है केवल वृद्ध, विकलांग और बीमारों के लिए उन्हें सामान्य जन ही इस्तेमाल करते हैं वृद्ध, विकलांग और बीमारों के हिस्से में वो सुविधाएँ आती कि लिफ्ट में कोई ऐसा कर्मचारी नहीं जो इस काम के लिए नियुक्त हो। इस साथ ही निकासी की कोई ऐसी सुविधा यहाँ ऐसी नहीं कि दिव्यांग यात्री बिना असुविधा के कश्मीरी गेट मैट्रो स्टेशन पर से अंतर्राजकीय बस अड्डे तक आ सके। मात्र 50 मीटर की अल्प दुरी को तय करने में मुझे पुरे आधे घंटे का समय लगा। अगर मैंने अपने परिवार को पहले बस ढूंढने के लिए न भेजा और बस को न रुकवाया होता तो मेरा ऑनलाइन खर्च किया हुआ २२०० रुपया और टूर दोनों ही ख़राब हुए होते। समस्या मात्र इतनी नहीं है. मेट्रो स्टेशन पर कोई व्हील चेयर के साथ ऐसा असिस्टेंट नहीं जो दिव्यांग को मदद कर सके। जब मैं जैसे-तैसे बस अड्डे पहुँचा और देखा कि रेम्प की लम्बाई इतनी अधिक है कि मैं पैदल नहीं जा पाउँगा तो मैंने पहले गार्ड से कहा कि भैया मेरी बस के चलने में मात्र ५ मिनट का समय है तो गार्ड ने कहा-“ ये तेरी समस्या है मेरी नहीं, पहले जल्दी घर से क्यों नहीं निकलते।“ मैंने उससे कहा-“भैया निकला तो जल्दी था लेकिन कश्मीरी गेट मैट्रो स्टेशन पर से अंतर्राजकीय बस अड्डे तक आने में ही आधा घंटा लग गया।“ उसने जबाब दिया-“हम कुछ नहीं करते आप खुद भुगतो।“ फिर मैरी निगाह पूछताछ केंद पर पड़ी, मैंने उन्हें अपनी समस्या बतायी, तो उन्होंने पहले कहा-व्हील चेयर दे देता हूँ खुद चलाकर ले जाओ।“ मैंने उनसे कहा-“सर. इतने स्लोप पर मुझसे नहीं चलेगी।“ उन्होंने किसी को फोन किया और कुछ बातचीत करके मुझे जबाब दिया-१५ मिनट में असिस्टेंट आएगा तब तक खड़े होकर इंतज़ार कीजिये।“ विवश होकर मुझे पैदल ही चलने को मजबूर होना पड़ा। मेरा परिवार बस वाले से उधर आग्रह करता रहा। श्रीमान अगर बस वाले ने साथ न दिया होता तो मैं और मेरी यात्रा दोनों ही…. ।

ये तो दिल्ली की कहानी है..अब आते हैं उस धर्म नगरी की कहानी पर जहां आप ही की पार्टी की सरकार है.. मैंने हरिद्वार से ऋषिकेश और नील कंठ यात्रा के लिए किराए पर गाड़ी ली, गाड़ी वाले ने बताया कि आपको नीलकंठ मदिर के गेट पर ही छोड़ दूंगा, लेकिन मान्यवर धर्म नगरी की पुलिस ने गाड़ी को मंदिर से दो किलोमीटर पहले ही रोक दिया , मैंने आग्रह किया कि दिव्यांग हूँ तो पहला जुमला ये सुना कि कौन से अंग तेरे दिव्य हैं, मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि माननीय प्रधानसेवक जी ने ये नाम दिया है.. बहराल उसे मनाया और कुछ कदम आगे दूसरे रक्षक से मुलाकात हुई फिर से वही कहानी सुनानी पड़ी बोला- “सुन वे दिव्यांग, अब तुझे यहाँ से चलने में परेशानी हो रही है तो यहाँ मंदिर में दर्शन के लिए दो घंटे जब लाइन में लगेगा तब तेरा दिव्यांगपण कहाँ चला जायेगा?” बहराल यहाँ तक आये थे तो ये बेइज्जती का घूंट पीना मेरी विवशता थी, मिन्नत करके नील कंठ के मंदिर तक गया, देखा वहाँ लम्बी लाइन थी, आपकी उतरांचल सरकार ने धर्म नगरी में खुद धर्म के ठेकेदार बनने की पार्टी से होते हुए भी किसी दिव्यांग के लिए वहाँ कोई ऐसी व्यवस्था आज तक नहीं की कि वह नीलकंठ भोले नाथ के दर्शन कर सके। आप सोचेंगे कि मैं ये सब कहने आपको क्यों लिख रहा हूँ, उसके दो कारण है एक तो आपका जन्म जैसा कि बताया गया है कि धर्म की पुनर्स्थापना के लिए हुआ है दूसरा आप विकास की बात अधिक करते हैं, मुझे लगता है कि इस देश में विकास से पहले लोगो में संवेदना भरने की जरुरत है, और मुझे दुःख है ये कहते हुए कि पूर्ववर्ती सरकारों और आपकी सरकार (पूर्ववर्ती सरकारों में आपकी पार्टी की या मिलीजुली सरकारें भी शामिल हैं) के पास इस तरह के कोई टूल नहीं है जिनसे इस संवेदना का विकास हो सके। पत्थरो और कंकरीट के शहर बना देने से देश का विकास होगा मुझे ऐसा लगता नहीं। दूसरा आपने जिन्हें विकलांग से दिव्याग कहा है उनके लिए बेसिक सुविधाएँ जरुरी है फिसलन वाले फर्श नहीं। जिस तरफ न आपके अभियंताओ का ध्यान जायेगा न ही अधिकारियों का। मान्यवर पिछले वर्ष इन्ही दिनों मैंने आपको दिल्ली के रेलवे स्टेशन कैसे दिव्यंगो के प्रतिकूल है इस पर पत्र लिखा था न ही उस पर अमल हुआ न ही कोई जबाब ही आया। मान्यवर मैं आपकी सरकार में श्रृद्धा पैदा करना चाहता हूँ, लेकिन आपकी सरकार की कार्यशैली मुझे ऐसा करें से रोकती है। मैं उस धर्म में आस्था कैसे पैदा करूँ जिसमे मुझे जिसके ईश्वर के मंदिर में दर्शन के लिए खून के आंसू बहाने पड़ते है। माफ़ कीजिये प्रधानसेवक साहिब आपने एक दिन कहा था- मुझे शर्म आती है कि मैं इस देश में पैदा हुआ, लेकिन मुझे लगने लगा है कि मुझे शर्म आती है कि मैंने ऐसे देश में जन्म लिया जहाँ दिव्यांग होना गुनाह जैसा लगे। आशा है आप मेरी व्यथा को समझेंगे।

एक दिव्यांग,
संदीप तोमर

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