(भीमा-कोरेगांव में हिंदुत्ववादी हमलावरों द्वारा हिंसा फैलाने के बाद की तस्वीर)
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भीमा कोरेगांव में 1 जनवरी को हुई हिंसा ने फिर से दुनिया को आजाद भारत की मीड़िया और राज्य व केन्द्र सरकार का रंग दिखा दिया है। उनका रंग भारतीयता का प्रतीक तिरंगा नही, उनका रंग भगवा है, उनका रंग ब्राहमणवादी है। यह ऐसा रंग है जो उनकी हर रिपोर्ट से छलकता है, यह ऐसा रंग हैं जो कार्रवाई के बयानों में दिखता है, यह ऐसा रंग है जो जुल्म पर उदार और वाजिब विरोध पर जालिम हो जाता है।

यह रंग रोज अखबारों की सुर्खियों में एक पक्ष बनकर चहकता है, यह रंग है जो रोज ब्राहमणवाद के झूठ और पाखण्ड़ में महकता है। आज यह रंग फिर भीमा-कोरेगांव और उसके बाद की घटनाओं में फूट पड़ रहा है। यह फूट रहा है वर्षो के सड़े मवाद सा, यह फैल रहा है हजारों साल पुराने कोढ़ सा। यह जुल्म के इतिहास और मौजूदा लूट का भगवा रंग है।

भीमा कोरेगांव में शौर्य दिवस की रैली पर हुआ भगवा हमला कोई अचानक हुई प्रतिक्रिया नही था। यह पहले से तैयार योजना का हिस्सा था। इस हमले में शामिल चेहरों की पहचान बताने से जिस प्रकार भारतीय मीड़िया शर्मा रहा है और प्रशासन जिन चेहरों को अनजान हमलावर और कुछेक व्यक्तियों का नाम दे रहा है, वो चेहरे उतने अनजाने नही हैं।

भीमा कोरेगांव के हमलावरों के हाथों में भगवा झण्ड़े से जिनका रंग और उनके जुड़ाव को आसानी से पहचाना जा सकता था। परंतु भारतीय मीड़िया में आपकों उस भगवा आतंक के रंग पर एक खामोशी दिखाई देगी और यह खामोशी केवल खामोशी नही है। यह खामोशी उन हमलावरों के साथ मीड़िया और प्रशासन का सक्रिय सहयोग है। यह खामोशी भगवा रंग के सभी ध्वजवाहकों की आपसी मिलीभगत की खामोशी है। यह खामोशी उनकी एकता का सूत्र है। ऐसा नही है कि मीड़िया का ब्राहमणवादी भगवा चरित्र इतना अज्ञानी है कि उसके पास ऐसे हमलावरों को पहचानने की योग्यता नही है। परंतु वह अपनी योग्यता का शातिर तरीके से इस्तेमाल करता है, भगवा रंग को और ब्राहमणवाद को मजबूत करने के लिए।

भीमा कोरेगांव में उसने हमलावरों को नही पहचाना परंतु 2 जनवरी को पहले दिन की घटना के विरोध में हुए पूरे महाराष्ट्र के विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों को उसने पहचानकर बता दिया कि नीले झण्ड़े वाले विभिन्न बहुजन संगठनों ने यह विरोध और सड़कें जाम की हैं। और कमाल देखिये कि प्रशासन ने फौरन कार्रवाई करते हुए धारा 144 भी लगा डाली।

यही प्रशासन 1 जनवरी को शौर्य दिवस का विरोध करने के लिए कई दिनों से लामबंद हो रहे भगवा ध्वजधारियों की हरकतों पर खामोश था, अनजान था। यहां तक कि 1 जनवरी को जब भगवा ब्रिगेड भीमा कोरेगांव में बाजारों को बंद करवा रही थी तो भी इस प्रशासन और मीड़िया को खतरे का अहसास नही था। देश के प्रशासन और भारतीय मीड़िया की बागड़ोर कितने मासूम लोगांें के हाथ में है और उनकी मासूमियत ने कोरेगांव और पूरे महाराष्ट्र को जंग के मैदान में बदल दिया है। कितनी खतरनाक होती है यह भगवा ब्राहमणवादी मसूमियत। ऐसा भी नही है कि हम इस खतरनाक मासूमियत के पहली बार साक्षी बन रहे हैं।

हम और यह देश हजारो बार इस षड़यंत्रकारी मासूमियत का साक्षी रहा है। याद करें खैरलांजी में 29 सिंतबर 2006 को दलित परिवार का नरसंहार। उस परिवार की दो महिलाओं सुरेखा और प्रियंका सहित पूरे परिवार को महाराष्ट्र के खैरलांजी गांव में पहले नंगा करके घूमाया गया और फिर उन्हें मार डाला गया। इस नरंसहार में चार लोगों की मौत हुई। देश और दुनिया में कहीं कोई खबर नही कोई सवाल नही। परंतु जब मारे गये दलित परिवार के पक्ष में लोग लामबंद हुए और कई दिनों बाद उन्हें न्याय दिलाने के लिए प्रदर्शन और तोड़फोड़ हुई तो इस देश के मासूम मीड़िया ने इसे केवल दलितों द्वारा तोड़फोड़ सार्वजनिक संपति को नुकसान की खबर ही बनाया। मानों कि वह दबंगों के गुनाह को छुपाना चाहता हो। 29 सितंबर की घटना पर 19 नवंबर को जब हजारों लोगों ने मुम्बई के आजाद मैदान में प्रदर्शन किया तो प्रशासन को कार्रवाई की सुध आयी।

यह देश का 21वीं सदी का मीड़िया है जो देश के अलग अलग हिस्सों में रोजना आबरू लुटाती अनुसूचित जाति और जनजाति की बेटियों की चीखों पर खामोश रहता है और उनके परिवारों की लूटती संपति और टूटती जिंदगियों पर मूक बन रहता है। उसे इन घटनाओं में कोई स्टोरी कंटेंट नही दिखता है। संभवत, देश के समाचार घरानों के संपादकमंडलों में कुंडली मारे बैठे ब्राहमणवादी दिमाग समझते हैं कि देश की बहुजन आबादी के उपर होने वाले यह नियमित हमले स्वाभाविक हैं और उनके ब्राहमणवादी समाज की दैनिक क्रिया का एक भाग ही तो हैं। इसमें खबर जैसा अथवा कार्रवाई किये जाने जैसा क्या है। इस निरंतर जुल्म, अत्याचार और हमलों को स्वाभाविक मानकर खामोश रहना ही इस ब्राहमणवादी षड़यंत्र की एकता का सूत्र है और उनके प्रभुत्व के बने रहने का मूल मंत्र भी।

वर्तमान समय में बहुजनों पर हमलों में तेजी और हमलों पर खामोशी का फैलता जाना चिंतनीय तो परंतु आश्चर्यजनक नही है। 1 जनवरी 1818 की भीमा कोरेगांव की जीत का जश्न बहुजन समाज कई वर्षो से लगातार मनाता रहा है, परंतु कभी उस पर ऐसा विवाद नही हुआ जैसा 2018 की 1 जनवरी को हो गया है। यह हिम्मत केवल इस कारण से है कि इस हमले को अंजाम देने वाली ताकतें समझती हैं कि राज्य और देश में दोनों जगह उनकी सरकार है और उन्हें बचा लिया जायेगा। ऐसा हो सकता है क्यूंकि प्रशासन और मीड़िया का भगवा रंग और उसके पीछे के हिन्दुत्ववादी संगठनों के नामों पर अनजान बने रहना, इसी बात की और इशारा कर भी रहा है।

(यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं)

 

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