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सुदेश महतो के उदय की कहानी झारखण्ड के जन्म से ठीक पहले शुरू होती है। गठबन्धन के खेल में हमेशा से मुट्ठी भर विधायकों के साथ सुदेश झारखण्ड के सियासी आसमान में ध्रुव तारे की तरह चमकते रहे। यह बात अलग है कि अपनी ही सीट से पटखनी खाने और गठबंधन में रार की वजह से अब यह ध्रुवतारा इतना चमकीला नहीं रह गया लेकिन सियासी आसमान में इसकी मौजूदगी को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं है कि सुदेश की जीत-हार से आने वाले दिनों में झारखण्ड का मुस्तकबिल लिखा जाएगा। सुदेश के इर्द-गिर्द रहते हुए चुवावी समर का बहुपक्षीय विश्लेषण कर रहे हैं हिंद वॉच झारखण्ड के सह-संपादक कुमार कौशलेन्द्र

“हँसब ठठाय फुलाउब गालू” इस पंक्ति के आधार पर अगर यह कहा जाए कि गोस्वामी तुलसीदास भविष्यवाणी भी करते थे तो यह झारखण्ड की राजनीति उठापटक के सन्दर्भ में अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस पंक्ति का भावार्थ और प्रतिफल सूबे के सिल्ली और गोमिया विधानसभा उपचुनाव के सियासी समर में जगजाहिर हो गया। जिस एनडीए ने सुदेश महतो को अपनी आँख का तारा समझा था, वह आंख की किरकिरी से ज्यादा कुछ साबित नहीं हो पाए। यही कारण है कि एनडीए से डेढ़ दशक का गठबंधन होने के बावजूद सिल्ली में जहां आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो सियासी चक्रव्यूह में अकेले फंसे दिखे, वहीं गोमिया में आजसू कोटे के मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी के खासम-खास लंबोदर महतो भाजपा उम्मीद्वार पूर्व मंत्री माधव लाल सिंह और झामुमो प्रत्याशी बबीता देवी के साथ त्रिकोणीय संघर्ष में पसीना बहाते रहे।

सोमवार को सिल्ली और गोमिया विधानसभा उपचुनाव, 2018 का मतदान संपन्न हो गया। मतदाताओं का जनादेश इवीएम में कैद हो गया। सिल्ली विधानसभा उपचुनाव में 75.5 प्रतिशत और गोमिया में 62.61 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। झारखंड के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी एल ख्यांगते के अनुसार दोनों विधानसभा क्षेत्रों से किसी भी अप्रिय घटना की खबर नहीं आई। मतदान में पहली बार इवीएम के साथ वीवीपैट मशीन का प्रयोग किया गया था। मतों की गिनती 31 मई को सुबह आठ बजे से होगी।

लगभग डेढ़ दशक से एनडीए गठबंधन में होने के बावजूद आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो और उनकी पार्टी ऑल झारखण्ड स्टूडेंट्स यूनियन के चुनाव मैदान में अकेले उतर जाने से झारखण्ड की सियासी हवा गर्म हो गयी है। मतदान के खत्म होते ही इस बात पर गरमागरम चर्चाएँ होने लगीं हैं कि सुदेश महतो के हारने या जीतने पर झारखण्ड का सियासी गुणा-भाग क्या होगा।

इस उपचुनाव ने ये तो साफ कर दिया कि एनडीए में एक शब्द जो ‘अलायन्स’ है वह अब दरक चुका है। एनडीए खेमे में दिखी दरार की पटकथा कब, कहां और क्यों लिखी गयी इसकी विस्तृत पड़ताल में जुटे “हिंद वॉच” (झारखण्ड) को अपने भाजपा सूत्र से सप्रमाण-प्रसंगवार जो ब्यौरा और 2019 के चुनाव के मद्देनजर भाजपा नेतृत्व की भावी रणनीति से संबंधित जो जानकारी मिली, उसके आकलन से यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि सिल्ली और गोमिया उपचुनाव परिणाम आने के बाद सूबे झारखण्ड में सियासी समीकरण में भारी उथल-पुथल देखने को मिलेगा। चर्चा है कि गोमिया और सिल्ली उपचुनाव के परिणाम यदि विपरीत सियासी बयार के बावजूद आजसू के खाते में गये तो रघुबर सरकार में ख़ाली पड़े 12 वें मंत्री पद को लेकर सियासी रार अपने चरम पर पहुँच जाएगा। ठीक इसके विपरीत यदि सुदेश महतो और उनकी आजसू को इस उपचुनाव में पराजय का मुंह देखना पड़ा तो डेढ़ दशक का आजसू-भाजपा गठबंधन टूट जायेगा। उसके बाद सुदेश का भावी सियासी सफर एनडीए से खुली बगावत की राह पकड़ लेगा।

बताते चलें कि 28 मई को संपन्न सिल्ली और गोमिया विधानसभा उप चुनाव के मतदान के अंतिम पल तक सूबे का सियासी पारा गर्म ही रहा। सिल्ली के करीब डेढ़ लाख और गोमिया के पौने दो लाख मतदाताओं ने अपने भावी जनप्रतिनिधि का भविष्य ईवीएम में कैद कर दिया। झामुमो के कब्जे वाली इन दोनों सीटों को अपने पाले में करने के लिए सत्ताधारी भाजपा (गोमिया में) और आजसू (सिल्ली और गोमिया में) ने पूरा जोर लगाया। वहीं झामुमो अपनी सीटें किसी भी हाल में नहीं गंवाने की कवायद में विपक्षी एकता का झंडा बुलंद किये मतदाताओं को अंतिम समय तक अपने पाले करने में जुटा दिखा।

ज्ञातव्य है कि 2014 के आम चुनाव में सिल्ली विधानसभा में झामुमो के अमित महतो ने आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को 29,740 वोटों से शिकस्त दी थी। अमित को 79,747 वोट मिले थे, जबकि आजसू सुप्रीमो को 50,007 वोट से संतोष करना पड़ा था। गोमिया में झामुमो के योगेंद्र प्रसाद ने 97,799 वोट लाकर भाजपा के माधव लाल सिंह को 37,514 वोटों से पराजित किया था। माधव लाल को 60,285 वोट मिले थे। पिछले विधानसभा चुनाव में सिल्ली से बाजी मारने वाले झामुमो के युवा नेता अमित महतो की पत्नी सीमा महतो इस दफा सुदेश महतो के खिलाफ मोर्चा संभाल रही हैं। अंचल अधिकारी की मारपिटाई के एक मामले में सजा सुनाये जाने के कारण अपनी सदस्यता गंवाने वाले झामुमो के अमित महतो स्वयं तो चुनावी राजनीति से दूर हैं किन्तु अपनी पत्नी की जीत सुनिश्चित करने के लिये यूपीए के सहयोगी दलों के साथ क्षेत्र में उन्होंने पूरा जोर लगा दिया है। पूर्व सांसद सुबोधकांत सहाय, पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन, बाबूलाल मरांडी, भाकपा नेता भुवनेश्वर मेहता, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और राजद के दिग्गजों समेत झामुमो अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सिल्ली की जनता को जहां यूपीए समर्थित झामुमो उमीद्द्वार सीमा महतो के पक्ष में लामबंद करते दिखे, वहीं विगत चुनाव में झामुमो के अमित महतो से काफी अधिक मतों के अंतर से सियासी पटखनी खाने वाले आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो इस चुनौतीपूर्ण उपचुनाव में पूरा मैनेजमेंट अपने हाथों में ले अकेले ही अपनी खोई जमीन पुनः कब्जाने के लिये अंतिम समय तक पसीना बहाते रहे।

कुछ ऐसा ही नजारा गोमिया विधानसभा क्षेत्र में भी दिखा, जहां आजसू टिकट पर मैदान में ताल ठोक रहे राज्य प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी और आजसू कोटे से रघुबर दास मंत्रिमंडल की शोभा बढ़ा रहे चंद्रप्रकाश चौधरी के पीए रहे लंबोदर महतो झामुमो और भाजपा उम्मीद्वारों के त्रिकोणीय सियासी रण को पार पाने की कवायद में हलकान रहे। बताते चलें कि कोयला चोरी के एक मामले में सजा पाने के कारण विधानसभा बदर हुए झामुमो के पूर्व विधायक योगेन्द्र महतो इस दफा अपनी पत्नी बबीता देवी को चुनावी मैदान में उतार कर ताल ठोक रहे हैं। गोमिया में भी सिल्ली की भांति जहां सत्तारूढ़ एनडीए में समन्वय तार-तार दिखा, वहीं एकजुट यूपीए ने झामुमो उमीद्वार बबीता देवी को विधानसभा में बतौर माननीय प्रवेश दिलाने की रणनीति को अंजाम देने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। गोमिया में झामुमो से पूर्व विधायक योगेंद्र महतो की पत्नी बबीता देवी और आजसू के लंबोदर महतो जहां जातीय समीकरण और वोटों की सेंधमारी से जीत की फसल काटने की जुगत में लगे रहे, वहीं भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे पूर्व मंत्री माधवलाल सिंह अपने परंपरागत वोट बैंक को ईवीएम में समेटने के लिये मुख्यमंत्री रघुबर दास समेत भाजपा के पूरे काडर को लेकर जनता से जीत का आशीर्वाद लेते दिखे।

कोर्ट के डंडे से विधानसभा बदर हुए इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों के पूर्व विधायकों ने अपनी-अपनी पत्नियों को जहां सहानुभूति और एकजुट विपक्ष की नैया पर सवार करा कर चुनावी वैतरणी पार उतारने की हर सियासी चाल को आजमाते रहे, वहीं आजसू की स्थिति “हँसब ठठाय और फुलाउब गालू, एक संग नहीं होय भुवालू” वाली रामचरितमानस की पात्र कैकेयी वाली ही दिखी। एक ओर जहां संप्रग (यूपीए) साझीदार दल के नेता और कार्यकर्ता झामुमो उम्मीदवार सीमा महतो की जीत सुनिश्चित करने में जुटे रहे वहीं विगत डेढ़ दशक से एनडीए गठबंधन के साझीदार बने रहे आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो अकेले ही सिल्ली उपचुनाव के मैदान में अपने सियासी भविष्य पर आन पड़ी चुनौती से निपटने का जतन करते रहे। हालत यह हो गई कि अंततः सुदेश महतो की पत्नी को स्टार प्रचारक के तौर पर आजसू को मैदान में उतारना पडा।

सिल्ली की अपनी खोई सीट को पुनः कब्जाने के लिए मात्र डेढ़ साल की बाकी मियाद वाली वर्तमान झारखण्ड विधानसभा के सिल्ली सीट पर संपन्न उपचुनाव में ताल ठोक रहे पूर्व उपमुख्यमंत्री व आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को उनके गठबंधन सहयोगी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कैडर का सहयोग न तो मिलता दिखा और ना सुदेश इस हेतु प्रयासरत दिखे। भाजपा के एक स्थानीय नेता के मुताबिक सुदेश ने स्वयं भी भाजपा के झंडे और उसके काडर को अपने चुनावी अभियान से दूर ही रखा। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान अकेले डटे रहे सुदेश के पक्ष में जब जमशेदपुर से भाजपा सांसद विद्युत वरण महतो और ईचागढ़ के भाजपा विधायक साधु चरण महतो प्रचार हेतु पहुंचे तो उन्हें भी भाजपा के बजाये आजसू के झंडे तले और आजसू का मफलर पहनाकर जनता के बीच पेश किया।

एक ओर जहां गोमिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार माधव लाल सिंह की जीत सुनिश्चित करने के लिये सीएम रघुबर दास झारखंड भाजपा के संगठन मंत्री धर्मपाल, राजमहल विधायक अनन्त ओझा, पूर्व विधायक छत्रुराम महतो, बोकारो विधायक बिरंची नारायण, खादी ग्रामोउद्योग के अध्यक्ष संजय सेठ, भाजपा बोकारो जिला अध्यक्ष जगरन्नाथ राम समेत पूरे भाजपा कैडर के साथ धुआंधार प्रचार में जुटे रहे। वहीं सिल्ली में अपनी जीत के जुगाड़ में लगे आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो अकेले ही आजसू का झंडा लेकर चुनावी रण में डटे दिखाई दे रहे थे। सिल्ली में गठबंधन दल का अप्रत्यक्ष असहयोग और यूपीए की घेराबंदी से हलकान आजसू सुप्रीमो गोमिया से अपने दल के प्रत्याशी लंबोदर महतो के प्रचार हेतु समय तक नहीं निकाल पाये, बावजूद इसके उनका भाजपा प्रदेश या केन्द्रीय नेतृत्व से सहयोग की गुहार न लगाना उनकी भावी सियासी रणनीति का अघोषित ऐलान जैसा प्रतीत होता है।

सनद रहे कि सन 2000 में जब पृथक झारखण्ड राज्य का गठन हुआ, उसके बाद से झारखण्ड के सियासी सौर मंडल में कई दैदीप्यमान राजनेता रुपी नक्षत्रों का उदय हुआ। उसी काल खंड में बिहार विधानसभा के रास्ते बतौर यूजीडीपी विधायक झारखण्ड विधानसभा पहुंचे सिल्ली के विधायक सुदेश कुमार महतो का सियासी रसूख बुलंदियों को छूता चला गया। बाद के दिनों में आजसू सुप्रीमो के अवतार में सुदेश महतो आंकड़ों में अस्थिर झारखण्ड की एनडीए सरकारों में अपरिहार्य नंबर दो की हैसियत वाले नेता के रूप में स्थापित होते चले गये। सुदेश के साथ-साथ उनके रिश्तेदार रामगढ़ के विधायक चंद्रप्रकाश चौधरी भी कमोबेश सभी सरकारों में मंत्री पद पर रहे।

2014 की सियासी उलटफेर में कई अन्य दिग्गजों के साथ आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को भी सिल्ली की जनता ने विधानसभा प्रवेश से रोक कर सत्ता की राजनीति से दूर कर दिया। डेढ़ दशक बाद झारखण्ड में रघुबर दास के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की बहुमत वाली सरकार की ताजपोशी हुई। आजसू कोटे से चंद्रप्रकाश चौधरी को एनडीए गठबंधन ने पुनः मंत्री पद दिया, किन्तु गठबंधन के बावजूद आजसू सुप्रीमो की एनडीए से अघोषित दूरी बनी रही और उनके सरकार विरोधी राजनीतिक आयोजन जारी रहे।

एनडीए सरकार के अहम सहयोगी होकर भी क्यूँ रार की राह पर रहे सुदेश?
झारखण्ड के गठन काल से ही एनडीए फ़ोल्डर में रहकर सत्ता सुख भोगते रहे सुदेश का मोहभंग एनडीए से क्यूँ हो गया और उनके तेवर तल्ख़ क्यूँ होते गये, इस अहम सियासी घटना की विस्तृत पड़ताल के दौरान हिंद वॉच को प्रदेश भाजपा सूत्र ने बताया कि एनडीए गठबंधन में शामिल सुदेश महतो और उनके दल आजसू ने अबतक जुगाड़ के बहुमत वाली एनडीए सरकारों से जमकर अपने समर्थन की कीमत वसूल की लेकिन 2014 के बदले बहुमत के अंकगणित ने उनकी धमक कम कर दी और सुदेश के तेवर बदलने लगे। एनडीए की अगुवाई कर रहे भाजपा के नेतृत्व ने बदले सियासी समीकरण के बावजूद आजसू को आंखों का तारा बनाये रखना चाहा लेकिन आजसू सुप्रीमो गठबंधन में रहकर भी एनडीए की आँख की किरकिरी बने रहे। झारखण्ड के सियासत की विलक्षण बात यह है कि सुदेश महतो अपनी पार्टी से जिस गठबंधन में एक मंत्री को जगह दिलवाते हैं उसी गठबंधन के खिलाफ खुले तौर पर मोर्चा भी खोल देते हैं। हमारे सूत्र बताते हैं कि गोमिया उपचुनाव में आजसू और उसके सुप्रीमों के अकेले पड़ जाने की पटकथा विगत लम्बे समय से लिखी जा रही थी। भाजपा केन्द्रीय अलाकमान ने भी उत्तर प्रदेश के अपना दल की अनुप्रिया पटेल और रालोसपा प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा की एनडीए में भाजपा से बिग साइज़ दिखने की हालिया कवायदों से सबक लेते हुए सुदेश और उनकी आजसू को अगामी लोकसभा चुनाव 2019 से पहले ही कट साइज़ करने की रूपरेखा तय कर ली थी।

सूत्र के मुताबिक केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देशानुसार गठबंधन के बावजूद रघुबर सरकार के लिये असहज स्थितियाँ खड़ी करने में जुटे रहे आजसू सुप्रीमो को 2014 विधानसभा में मिली सियासी शिकस्त के बावजूद राज्य विकास परिषद् का उपाध्यक्ष बना कर कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया ताकि वो रघुबर सरकार के लिये असहज हालात ना पैदा करें और 2019 के चुनावी तैयारी को गठबंधन सहयोगी दल के साथ धार दिया जा सके। किन्तु आजसू सुप्रीमो ने रघुबर सरकार से रार की राह नहीं छोड़ी और गठबंधन की सरकार में शामिल होने के बावजूद आजसू सुप्रीमो राजव्यापी दौरे कर नीतिगत मुद्दों पर रघुबर सरकार की फ़जीहत करते रहे। इसी बीच सिल्ली और गोमिया उपचुनाव की घोषणा हो गयी। भाजपा नेतृत्व ने आजसू सुप्रीमो के पास अपने संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह और उपाध्यक्ष दीपक प्रकाश को गोमिया से भाजपा और सिल्ली से सुदेश की उम्मीदवारी के प्रस्ताव के साथ भेजा किन्तु सुदेश महतो और उनकी पार्टी ने भाजपा के इस प्रस्ताव को सिरे से ख़ारिज कर दिया। भाजपा सूत्र के मुताबिक आजसू की इस हठधर्मिता को भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व ने गंभीरता से लिया और मुख्यमंत्री रघुबर दास को इस उपचुनाव की कमान अपने हाथ लेने का निर्देश मिला। भाजपा ने एनडीए गठबंधन की दुहाई देते हुए सिल्ली सीट तो आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो के लिये छोड़ दी, किन्तु गोमिया से पूर्व विधायक व मंत्री माधव लाल सिंह को मैदान में दमखम के साथ उतार दिया।

विगत 6 मई 2018, रविवार को बिना कारकेड के निजी इनोवा गाड़ी से मुख्यमंत्री रघुबर दास भाजपा के प्रदेश मुख्यालय पहुंचे। उनके आगे-पीछे न सायरन लगी गाड़ियां थी और न ही कोई सुरक्षाकर्मी। साथ थे सिर्फ प्रेस सलाहकार अजय कुमार और वरीय आप्त सचिव अंजन सरकार। मुख्यमंत्री दोपहर 11.50 बजे तक कांके रोड स्थित अपने आवास पर लोगों से मिलजुल रहे थे। एकाएक उन्होंने भाजपा ऑफिस जाने की इच्छा जताई। यह भी कहा कि साथ में कारकेड नहीं जाएगा। 12.10 बजे वे पार्टी मुख्यालय पहुंचे। वहां दो घंटे रुके। इस दौरान पार्टी के संगठन मंत्री धर्मपाल जी एवं अन्य नेताओं के साथ उप चुनाव की रणनीति बनाई गयी । गोमिया से माधव लाल सिंह के नाम की घोषणा के बाद मुख्यमंत्री ने गोमिया से टिकट के दावेदार रहे छत्रुराम महतो, गुणानंद महतो और लक्ष्मण नायक से बात की। प्रदेश संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह, महामंत्री अनंत ओझा और दीपक प्रकाश भी बैठक में थे। मुख्यमंत्री ने कहा, यह प्रतिष्ठा की लड़ाई है। इस चुनाव को हमें हर हाल में जीतना है। सभी अपनी-अपनी ताकत लगाएंगे। कार्यकर्ताओं के दम पर ही भाजपा के पास आज केंद्र और राज्य की सत्ता है। टिकट किसी एक को ही मिल सकता है, लेकिन जीत व्यक्ति की नहीं पार्टी की होती है। गोमिया के कुल 64 पंचायत में पार्टी के एक-एक नेता को छह से सात पंचायत की जिम्मेवारी दी गयी। तय हुआ कि मुख्यमंत्री भी चुनाव प्रचार में जायेंगे और संगठन महामंत्री सात मई से गोमिया में प्रवास करेंगे।

गोमिया विधानसभा उपचुनाव के लिए भाजपा द्वारा प्रत्याशी के नाम की घोषणा के साथ ही राज्य में राजनीतिक पारा चढ़ने लगा और एनडीए की दरार उजागर हो गयी। विगत विधान सभा चुनाव में एनडीए की ओर से भाजपा के तत्कालीन प्रदेश युवा मोर्चा अध्यक्ष रमाकांत महतो को सिल्ली विधानसभा चुनाव का प्रभारी बनाया गया था किन्तु इस दफा सिर्फ प्रदेश मुख्यालय से समर्थन की घोषणा कर सुदेश को अकेला छोड़ दिया गया।

“तू सिल्ली-मैं दिल्ली” की विरोधी हवा से भी हलकान रहे सुदेश
रांची लोकसभा क्षेत्र से लगातार सांसद चुने जाते रहे भाजपा के कद्दावर कुर्मी नेता रामटहल चौधरी से अदावत भी सुदेश महतो के लिये इस उपचुनाव में परेशानी का सबब बनता दिखा। सांसद और उनके समर्थक इस उप चुनाव में सुदेश के पक्ष में बिल्कुल सक्रिय नहीं दिखे। इतना ही नहीं राहे प्रखंड की सांसद प्रतिनिधि रेखा महतो खुलेआम झामुमो प्रत्याशी सीमा महतो के पक्ष में मतदान की अपील करती दिखीं। उल्लेख रोचक होगा कि “तू सिल्ली – मैं दिल्ली” के तथाकथित तालमेल के तहत रांची लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कुर्मी बहुल सिल्ली विधानसभा क्षेत्र के विधायक हमेशा सांसद की गुडबुक में होते थे। सुदेश महतो और रामटहल चौधरी का तालमेल भी नजीर हुआ करता था किन्तु विगत लोकसभा चुनाव में भाजपा सांसद राम टहल चौधरी के खिलाफ़ ताल ठोकना सुदेश महतो के लिये इस उप चुनाव में परेशानी का सबब बनता दिखा।

महतो और आदिवासी मतदाताओं के बंटे होने का पड़ेगा असर
सिल्ली उपचुनाव में मुद्दों के अंडर करंट के बीच बहुसंख्यक महतो और आदिवासी वोटर विपरीत खेमों में बंटे दिखाई दिये। मतदान भी 75 प्रतिशत से ज्यादा हुआ फलतः टक्कर कांटे की हो गई है। महतो को आदिवासी बनाये जाने का मुद्दा भी वोटर के साथ मतदान केन्द्र तक उत्प्रेरक तत्व के रूप में हावी रहा। फिलहाल सीलबंद ईवीएम क्या परिणाम देगा इस पर दावा न तो सुदेश कर रहे हैं और न सीमा महतो। हां, हार-जीत के आंकड़ों का आकलन करनेवाले कम अंतर की बात जरूर कर रहे हैं।

गोमिया में मुख्यमंत्री रघुबर दास की प्रतिष्ठामूलक जोर आजमाइश के बावजूद मतदाताओं का रूख अस्पष्ट दिखाई दिया। यहां भी भारी मतदान और नेताओं के भीतरघात की खबरों से भाजपा समेत सभी प्रत्याशियों की नींद उड़ गई है। स्थानीय राजनीति के विश्लेषकों के मुताबिक सुदेश की पुरानी सियासी धमक और हैसियत के मद्देनजर यह तय है कि यदि सिल्ली की जनता इस उप चुनाव में उन्हें विधानसभा का प्रवेश पत्र दे देती है तो वे पुनः सत्ता की सियासत के केन्द्र बन कर उभरेंगे। देखना दिलचस्प होगा कि सुदेश का सियासी मुख्यधारा में लौटना भाजपा के लिये कितना सहज होगा, फ़िलहाल तो सुदेश भाजपा के साथ एनडीए गठबंधन में होने के बावजूद असहज स्थितियां ही बनाते दिख रहे हैं। उल्लेख अप्रासंगिक नहीं होगा कि सिल्ली और गोमिया उपचुनाव के परिणाम मुख्यमंत्री रघुबर दास के लिये भी चुनौती ही साबित होंगे क्योंकि गोमिया में भाजपा उम्मीदवार की जीत का सेहरा यदि उनके सर बंधेगा तो हार का ठीकरा भी उन्हें ही झेलना पड़ेगा। सूबे की वर्तमान सियासी हलचल से इतना तो तय दिख रहा है कि 2019 के चुनावी रण से पहले झारखण्ड की सियासी आबोहवा में कई बदलाव दिखेंगे।

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