स्पाइनल काॅर्ड इंजरी के बाद भी कैसे करें सेक्स, जानिए मेडिकल एक्सपर्ट्स की जुबानी

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स्पाइनल इंजरी के बाद सामान्य यौन जीवन में लौटना मुश्किल हो सकता है लेकिन यह असंभव नहीं है, बता रहे हैं इंडियन स्पाइनल इंजरीज सेंटर में स्पाइन सर्विस के प्रमुख और मेडिकल डायरेक्टर डाॅ. एच. एस. छाबड़ा

स्पाइनल इंजरी किसी के भी जीवन की त्रासदपूर्ण घटना हो सकती है। इससे व्यक्ति एक तरह से लकवाग्रस्त हो सकता है। इसलिए इंजरी जब गर्दन में हो, इससे टेट्राप्लेजिया हो सकता है यानी सभी चार अंगों और धड़ में लकवा। लेकिन यदि इंजरी गर्दन के नीचे हो तो इससे पाराप्लेजिया यानी दोनों टांगों और इंजरी से निचले धड़ में लकवा हो सकता है। केंद्रीय स्नायु तंत्र का हिस्सा होने के कारण स्पाइनल काॅर्ड की सेहत पर ही समस्त शरीर की सेहत निर्भर करती है। इंजरी के लेवल से कम स्थिति के कारण न सिर्फ गतिविधियां और इंद्रियां प्रभावित हो सकती हैं बल्कि आंत/ब्लाडर नियंत्रण तथा यौन सक्रियता भी प्रभावित हो सकती है। स्पाइनल काॅर्ड इंजरी ऊंचाई से गिरने, सड़क दुर्घटना होने, हिंसक या खेल की घटनाओं के कारण हो सकती है। स्पाइनल काॅर्ड इंजरी के नाॅन ट्राॅमेटिक कारणों में स्पाइन और ट्यूमर के टीबी जैसे संक्रमण शामिल हैं।

लेकिन संघर्ष करना ही जीवन का मूलमंत्र है और भाग्य भरोसे बैठे रहने के बजाय स्पाइनल इंजरी पीड़ित व्यक्ति को यथासंभव आत्मनिर्भर बनाने के लिए समग्र रूप से पुनर्वास किया जा सकता है, यह उसकी इंजरी पर निर्भर करता है कि वह लगभग सामान्य जिंदगी भी जी सकता है। हालांकि स्पाइनल इंजरी के एक पहलू पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है। वह है एशियाई देशों तथा भारत में खासतौर से प्रभावित व्यक्ति के यौन सेहत पर प्रभाव। भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से में यौन स्वास्थ्य पर चर्चा करना भी हमेशा से एक वर्जित विषय माना जाता रहा है, इसलिए इस विषय पर बात करने से लोग कतराते हैं और मरीज खामोशी से इसे सहता रहता है। शिक्षा, ज्ञान और जागरूकता के अभाव में लोग ऐसे मरीजों के बारे में समझने लगते हैं कि वे यौनेच्छा एवं यौन उत्कंठा से पीड़ित हैं। लेकिन सच तो यह है कि सामान्य व्यक्ति की तरह ही स्पाइनल इंजरी पीड़ित व्यक्ति के लिए भी यौन सक्रियता उतनी ही जरूरी है। यौन अभिव्यक्ति मानवीय हिस्सा का एक मौलिक हिस्सा है और यह किसी की पहचान का भी एक महत्वपूर्ण अवयव है तथा स्पाइनल इंजरी पीड़ित के लिए उतना ही जरूरी है।

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यह समझना जरूरी है कि एससीआई पीड़ित मरीजों में वैसे तो यौन गतिविधियां बदल सकती हैं लेकिन वे अभी भी सक्रिय रहते हैं। दरअसल स्पाइन इंजरी इच्छाशक्ति का स्तर तो प्रभावित नहीं करती लेकिन किसी व्यक्ति की यौन गतिविधि प्रभावित हो जाती है। कई बार ऐसा पार्टनर के अभाव में भी होता है। अन्य मामलों में यह मांसपेशियों पर नियंत्रण रखने वाले व्यायाम की कमजोर क्षमता के कारण भी हो सकता है। यौन अनिच्छा लिंग के आधार पर भी अलग-अलग हो सकती है। पुरुष जहां उत्तेजना के अभाव के कारण प्रभावित होते हैं, वहीं महिलाएं आम तौर पर शिथिल पार्टनर होने के कारण इससे कम प्रभावित होती हैं, खासकर भारतीय समाज में। लेकिन स्पाइनल इंजरी पीड़ित व्यक्तियों की यौन अनिच्छा को एक अच्छे सेक्सुअल रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम और निरंतर अभ्यास से बहुत हद तक दूर किया जा सकता है।
ऐसे मरीजों में आत्मविश्वास जगाना और यौन स्वास्थ्य के बारे में उनसे खुलकर बात करना बहुत जरूरी होता है। इसमें तंबाकू पूरी तरह से निषेध होना चाहिए। शारीरिक गतिविधियों का अभाव और दर्द के अलावा एससीआई मरीज आकर्षण, संबंधों और प्रजनन की क्षमता जैसे अन्य कारकों को लेकर भी चिंतित रहते हैं। समय के साथ जहां मरीज अपने नवजात शिशु के साथ जीना सीख जाते हैं और परिवर्तित जिंदगी अपना लेते हैं, वहीं वे अपने यौन स्वास्थ्य को लेकर अक्सर अनजान रहते हैं। मरीज के शरीर की कुछ खोई गतिविधियां बहाल करने के लिए व्यापक रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम के दौरान भी यौन समस्या की अनदेखी ही की जाती है।
एससीआई के मामले में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए अक्सर सेक्सुअल पार्टनर बनना ज्यादा आसान होता है जो न सिर्फ शारीरिक रचना के कारण बल्कि सक्रियता के स्तर पर भी संभव होता है। भारत जैसे रूढ़िवादी समाज में महिलाओं से यौन इच्छा की उम्मीद करना मुश्किल है, वहीं भारत की महिलाएं 80 प्रतिशत बार ऐसी पैसिव सेक्सुअल पार्टनर होती हैं जो खुद पहल नहीं करतीं। इसलिए पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए यौन स्वास्थ्य वापस पाना ज्यादा आसान होता है और उनका मुख्य लक्ष्य यौन सक्रियता वापस पाना तथा संभोग करने की क्षमता हासिल करना होता है।

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पुरुषों के मामले में समस्याएं उत्तेजना में कमी और स्खलन से ही जुड़ी होती हैं। उनकी उत्तेजना क्षमता और स्खलन में बदलाव आने के अलावा कामोत्तेजना की यौन संतुष्टि भी एक ऐसा क्षेत्र है जो एससीआई पीड़ित पुरुषों के लिए चिंता का कारण होता है। एक अन्य चिंता स्पर्म की क्वालिटी पर होने वाले प्रभाव और स्पर्म काउंट को लेकर होती है। ज्यादातर स्पाइनल इंजरी के मामले में वियाग्रा जैसी दवाइयों से उत्तेजना की समस्या दूर की जा सकती है। कुछ मामलों में वैक्यूम ट्यूमेसेंस कंस्ट्रिक्शन थेरापी (वीटीसीटी) या पेनाइल प्रोस्थेसिस जैसे उपकरण की भी जरूरत पड़ सकती है।

सेक्सुअल काउंसिलिंग और मैनेजमेंट विकासशील देशों में एससीआई के सबसे उपेक्षित पहलुओं में से एक है। लेखकों के एक अध्ययन से पाया गया है कि एससीआई से पीड़ित 60 प्रतिशत मरीजों और उनके 57 प्रतिशत पार्टनरों ने पर्याप्त रूप से सेक्सुअल काउंसिलिंग नहीं ली है। जिन फैक्टर्स पर बहुत कम जोर दिया जाता है, उनमें से एक है जागरूकता और सांस्कृतिक बदलाव। पति और पत्नी के बीच यौन संबंध का मकसद सिर्फ बच्चा पैदा करना ही माना जाता है। सेक्स के बारे में बातचीत को खराब माना जाता है। यौन समस्याएं न सिर्फ आम हो गई हैं, बल्कि सेक्स की अनदेखी, सेक्स के बारे में गलत धारणाओं और नकारात्मक सोच इसके मुख्य कारण माने जाते हैं और खासकर पारंपरिक वर्जना भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। सेक्सुअलिटी को प्रभावित करने वाले अन्य सामाजिक-पारंपरिक फैक्टर्स में यौन संबंधी सोच, माता-पिता के प्रति सम्मान तथा अन्य ऐसे कारण शामिल हैं जिनमें सेक्स को ‘खराब’ माना जाता है और पुरुषों तथा महिलाओं के लिए बर्ताव के दोहरे मानदंड अपनाए जाते हैं। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की स्थिति बदतर होती है।
अपने अध्ययन में हमने पाया है कि विकसित देशों की तुलना में भारत जैसे देश में स्पाइनल काॅर्ड इंजरी से पीड़ित व्यक्तियों की यौन गतिविधि की बारंबारता कम रहती है। ज्यादातर मरीज इंजरी से पहले की तुलना में मौजूदा स्तर पर अपने सेक्स जीवन को कमतर आंकते हैं। यह शायद एससीआई की समस्याओं, इंजरी के बाद पार्टनर की असंतुष्टि, यौन क्रिया के दौरान पार्टनर से कम सहयोग, आत्मविश्वास में कमी तथा अपर्याप्त सेक्सुअल रिहैबिलिटेशन के कारण भी हो सकता है। पश्चिमी देशों के मामलों की तरह बहुत कम पार्टनर संतुष्ट होते हैं। पुरुषों की तुलना में महिलाएं यौन संतुष्टि के अभाव की शिकायतें ज्यादा करती हैं। इसके पीछे प्रचलित सांस्कृतिक मान्यता है कि किसी बीमार महिला के साथ यौन संबंध बनाना नैतिकता के विरुद्ध है और इससे पुरुष पार्टनर में भी रोग संचारित हो सकता है। भारत समाज में महिलाओं की कमतर स्थिति, पार्टनर की भिन्न सोच, पाचन तंत्र और ब्लाडर की गड़बड़ी और निजता का अभाव भी इसके कुछ अन्य संभावित कारण हो सकते हैं।

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निष्कर्षतः स्पाइनल इंजरी को यौन जीवन का अंत नहीं मान लेना चाहिए। स्पाइनल इंजरी पीड़ित व्यक्ति को अपने नए शरीर में यौन सुख स्वीकार करने में मदद की जरूरत पडती है और कई बार उनके लिए अलग तरीके से सोचने की जरूरत होती है। परिवर्तित संवेदनशीलता, शारीरिक प्रतिबंध की स्वीकृति या उन्नत मसल कंट्रोल जैसे फैक्टर्स को समझने से स्पाइनल इंजरी मरीज को स्वस्थ यौन जीवन बहाल करने में मदद मिल सकती है। उनके सेक्सुअल रिहैबिलिटेशन के लिए मेडिकल प्रोफेशनल्स की मदद की जरूरत होती है। इस संबंध में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है, खासकर भारतीय समाज तथा प्रोफेशनल्स के बीच।

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