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सासनी। हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार, होलिका दहन, सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष के समय, या जब पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो, करना चाहिये। भद्रा, जो पूर्णिमा  तिथि के पूर्वार्द्ध में व्याप्त होती है, के समय होलिका पूजा और होलिका दहन नहीं करना चाहिये। सभी शुभ कार्य भद्रा में करने से अहित ही होता हैं। इसलिए होलिका दहन तथा किसी भी प्रकार का शुभकार्य भद्रा में नहीं करने चाहिए।

मंगलवार को यह जानकारी देते हुए आचार्य पं. मुकेश शास्त्री इगलास ने बताया कि होगा।  होलिका पूजन का समय 11,30 से 2,30 दोपहर तक और होलिका दहन शाम 8,09 से 9,43 रात्री तक तथा दो मार्च को सुबह 3,से 4,30 सुबह के समय ही उचित है।

क्योंकि होली दहन के दौरान भद्रा रहित, प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा तिथि उत्तम मानी जाती है। यदि भद्रा रहित, प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा का अभाव हो, मगर भद्रा मध्य रात्रि से पहले ही समाप्त हो जाए तो प्रदोष के बाद जब भद्रा समाप्त हो तब होलिका दहन करना चाहिये।

भद्रा मुख में होलिका दहन कदाचित नहीं करना चाहिये। धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार भद्रा मुख में किया होली दहन अनिष्ट का स्वागत करने के जैसा होता है जिसका परिणाम न केवल दहन करने वाले को वल्कि शहर और देशवासियों को भी भुगतना पड़ सकता है।

किसी-किसी वर्ष में भद्रा पंूछ प्रदोष के बाद और मध्य रात्रि के बीच व्याप्त ही नहीं होती तो ऐसी दशा में प्रदोष के समय होलिका दहन किया जा सकता है। कभी दुर्लभ स्थिति में यदि प्रदोष और भद्रा पूंछ दोनों में ही होलिका दहन सम्भव न हो तो प्रदोष के पश्चात होलिका दहन करना चाहिये।

होलिका दहन का मुहूर्त किसी त्यौहार के मुहूर्त से ज्यादा महवपूर्ण और आवश्यक है। यदि किसी अन्य त्यौहार की पूजा उपयुक्त समय पर न की जाये तो मात्र पूजा के लाभ से वञ्चित होना पड़ेगा परन्तु होलिका दहन की पूजा अगर अनुपयुक्त समय पर हो जाये तो यह दुर्भाग्य और समस्त पीड़ादायनी होती है।

इसलिए 1 मार्च को रात्रि 7,39 तक भद्रा हैं भद्रा के बाद ही होलिका दहन शुभ है।

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