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न्होंने अबके दशहरे में जलाने को रावण का आधा पौना पुतला तैयार किया और मेरे घर मेरी कस्टडी में इसलिए छोड़ गए कि मैं पुलिस विभाग का बंदा हूं। कम से कम मेरे पास से रावण भागेगा नहीं। वैसे ये बात दूसरी है कि आजकल जो कोई भाग रहा है तो पुलिस की सुरक्षा से ही भाग रहा है।

अपनी कम, अपने विभाग की अधिक नाक बचाने के लिए मैंने रावण के पुतले को कमरे में बंद किया और अपने आप दूसरे कमरे में सोने चला गया। पहले तो सोचा कि पुतले के साथ ही सो जाऊं। पर फिर डरा! गंदे लोग तो बुरे होते ही हैं , उनके पुतले उनसे भी गंदे होते हैं। बरसों से बंदे को जला रहे हैं, पर देखो न, उसके बाद भी बंदा जल ही नहीं रहा। हर साल किसीको जलाने के बाद भी जो न जले, इस बात से ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि बंदा किस लेवल का बेशर्म है।

उसे दूसरे कमरे में बंद कर मैं चैकन्ना होकर सोने ही लगा था कि बंद कमरे में आहट सी हुई। दबे पांव डरते हुए कमरे का ताला खोला तो देखा कि रावण का पुतला जैसे सांस ले रहा हो। उसको सांस लेते देखा तो मेरी सांस ही निकल गई। यार! अजीब रावण है ये भी! इधर देश में जिंदे लोग भी मरे जा रहे हैं और एक ये पुतला है कि पुतला होने के बाद भी जिंदा होने की कोशिश कर रहा है? इसकी नाभि में अभी भी अमृत कुंड होगा क्या?

सावधानी बरतते हुए मैं उसके जरा और करीब गया। देखा तो ज्यों उसके भीतर गुपचुप तरीके से जैसे एक नेता अपने घोर स्वार्थों की पूर्ति हेतु दूसरे दल में प्रवेश करता है, उसी तरह से पुतले में आत्मा प्रवेश कर रही हो जैसे। पुतले में आत्मा? रावण के पुतले में आत्मा? पुतलों में भी आत्मा निवास करती है? पुतलो में भी प्रवेश करने को आत्मा लालायित रहती है? कई प्रश्नल एकसाथ मन में कौंधने लगे कि लेटे हुए पुतले ने मुस्कुराते हुए पास रखी कुर्सी पर रखा अपना मुकुट ठीक करते पूछा,‘ क्यों सहोदर ! चैंक गए?’

‘हां! बात ही चैंकाने वाली है। इधर देश में लोगों के महंगाई के मारे शरीर से प्राण निकले जा रहे हैं और एक तुम हो कि….’

‘बुराइयों की यही तो एक खासियत होती है दोस्त! उन्हें जितना जलाने की कोशिश करो वे उतनी ही तेजी से फैलती और पनपती हैं। अब रही बात पुतले में आत्मा की तो बता दूं आजकल पुतलों में ही आत्मा सेफ है। जिंदा शरीरों की आत्माएं तो आजकल में माहौल में हरपल डरी सहमी रहती हैं कि क्या पता कब जैसे कोई…… ,’ कह उस पुतले ने एक बार फिर जोर से वैसा ही रावण वाला ठहाका लगाया जैसा उसने अबके सीता हरण के समय मुहल्ले की रामलीला में लगाया था तो पूरे चैक पर खड़ी जनता वाह! वाह कर उठी थी।

‘पर यार तुम अबके तो हद नहीं कर गए? भागने की कोशिश कर रहे हो तो यह गलत है। अबके तुम किसी ऐसे वैसे के नहीं, पुलिसवाले के घर में हो,’ मैंने उसे अपने विभाग का डर दिखाना चाहा तो बंदा डरने के बदले फिर हंसा,‘ जानता हूं तुम वही पुलिस वाले विभाग के सरकारी दामाद हो न जिनकी जरूरत पर रिवाल्वर न चलने पर अपराधी को डराने के लिए मुंह से ही ठांय ठांय करनी पड़ती है। तुम वही पुलिस वाले विभाग से हो न जहां मीटिंग के बीच तुम्हारे अफसर सोए रहते हों। तुम उसी…’ हद है, बंदा तो अपने विभाग के बखिए ही उधेड़ने पर आ गया। बदतमीज जीवों की यही पहचान होती है। मुझे लगा कि इससे पहले वह मेरे आगे ही मेरे विभाग के और बखिए उधेड़े, क्यों न इसको दूसरी ओर ही घुमा लिया जाए।

‘हे मित्र! बदले में जो चाहे ले लो पर मेरे विभाग कि मेरे सामने और टोपी न उछालो।
‘बंधु! टोपी नहीं, पगड़ी उछाली जाती है,’ बंदे ने कहा तो मुझे एकबार फिर विश्वाीस हो गया कि रावण सच्ची को बहुत बुद्धिमान था। पर जो यह इत्ता बुद्धिमान था तो उससे मी टू कैसे हो गई?

‘हो जाती है। जैसे आजकल हो रही है,’ पता नहीं कैसे उसने मेरे मन की बात भांप कहा तो मैं हक्का बक्का! यार , जब रावण का पुतला ही बुद्धिमान है तो अपने समय में रावण कितना बुद्धिमान रहा होगा?? मैं सोचने लगा तो उसने मुझसे पूछा,‘ मेरी एक सहायता कर सकते हो?’
‘कहो? कल जलने से पहले तुम्हारी क्या अंतिम इच्छा है? भगवद्गीता सुनाऊं?’
‘अरे वह उनको सुनाओ जो गर्मयोगी अपने का कर्मयोगी बताते फिर रहे हैं।’
‘तो??’ में झेंपा।
‘मैं जरा बाहर घूमना चाहता हूं। सुबह वापस आ जाऊंगा।’
‘किससे मिलने जाना है?’
‘मी टू के आरोपियों से।’
‘क्यों?’
‘वे भी तो मेरे ही वंशज हैं न!’
‘मतलब??’
‘उनसे मिल कर बस सुबह मुहल्ले वालों के जागने से पहले आ गया! प्रॉमिस!’ उसने जितने विश्वास से प्रॉमिस कहा तो मुझे उस पर विश्वाुस हो गया और उससे उसका मोबाइल नंबर ले उसे जाने दिया।

सुबह हुई! पर वह नही आया। दोपहर को मुहल्ले का किलो के बजाय आठ सौ ग्राम सब्जी बेचने वाला राम का रूपधारण कर तैयार हो गया तो रावण दहन कमेटी के प्रधान चार मुस्टंडों को लेकर आ धमके,‘ रावण लेने आए हैं। कमरा खोल,’ मुझे काटो तो खून नहीं। सुबह से बीसियों बार उसे मोबाइल मिला चुका था। वह हरबार कोई न कोई बहाना बना टाल रहा था।

उनके सामने मैंने उसे एकबार फिर उसे फोन मिलाया,‘ कहां हो यार! अब तो आ जाओ मेरे बाप! वरना ये लोग तुम्हारी जगह मुझे ही जला डालेंगे,‘ मैंने कहा तो उसने ठहाका लगाते कहा,‘ चलो इस बहाने देश से एक रावण तो कम होगा।’
‘देखो, मुझे सबकुछ पसंद है पर मजाक नहीं। सीधे तरीके से आ जाओ वरना…’ मैंने विभागीय धमकी दी तो उसने कहा,‘ क्या कर लोगे मेरा? रावण के पुतले को धमकी दे रहे हो?’
‘पूरे शहर की नाकाबंदी करवा दूंगा।’

‘नाकाबंदी के बाद क्या होगा? नाकाबंदी के बाद तुमने पकड़े ही कितने अपराधी? तुम्हारे ही बंदे मुझे बाहर निकाल देंगे । देश से जितने भी अपराधी भागने में सफल हुए, वे नाकाबंदी के बाद ही हुए हैं।
‘पर यार! प्लीज! मेरी नाक का सवाल है! जनता तुम्हारा दहन देखने को मैदान में आना शुरू हो गई है।’
‘नाक तो तुम लोगों के पास है ही नहीं। देखो दोस्त, तुम्हारे पास रावणों की कोई कमी नहीं। ऐसे में एक पुतले को लेकर इतने परेशानी क्यों? किसीसे में से भी…. मैं तुम्हारा यह ड्रामा देखते देखते बहुत तंग आ गया हूं….’ कह उसने फोन काट दिया।

मेरे प्राण सूखे जा रहे हैं। अब आप ही सजेस्ट कीजिए कि हम मुहल्ले वाले रावण के बदले किसे जलाएं? जल्दी बताइए प्लीज! उधर नेताजी रेस्ट हाउस आ चुके हैं। उनका बार बार फोन आ रहा है कि सब तैयारियां हों तो वे आएं।

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हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की अर्की तहसील के म्याणा गांव में जन्में डॉ. अशोक गौतम हिमाचल प्रदेश के उच्चतर शिक्षा विभाग में एसोशिएट प्रोफेसर के  पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से साठोत्तर प्रमुख हिंदी नाटकों में अस्तित्ववादी-चेतना शोध विषय पर पीएच.डी किया है। मुख्य रूप से वे व्यंग्य लिखते हैं और “लट्ठमेव जयते”, “गधे ने जब मुंह खोला”, “झूठ के होलसेलर”, “खड़ा खाट फिर भी ठाठ”, “ये जो पायजामे में हूं मैं”, “साढ़े तीन आखर अप्रोच के”, “मेवामय ये देश हमारा”, “फेसबुक पर होरी”,  “पुलिस नाके पर भगवान”, “वफादारी का हलफ़नामा” और “नमस्कार को पुरस्कार” उनके प्रकाशित व्यंग्य संग्रह हैं। उनकी रचनाएं विगत 30 वर्षों से देश के प्रतिष्ठित अखबारों, पत्रिकाओं और वेब-पोर्टल्स में निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। संपर्कः- गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212 (हिमाचल प्रदेश) मोबाइल नम्बर : 9418070089, ई-मेल : [email protected]