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फ़िल्म का नाम  : पैडमैन
हिंद वॉच मीडिया रेटिंग  :  ढ़ाई स्टार


बैनर : कोलंबिया पिक्चर्स, होप प्रोडक्शन्स, कृअर्ज एंटरटेनमेंट और मिसेज  फन्नीबोन्स मूवीज
सेंसर सर्टिफिकेट : U/A 
जॉनर : ड्रामा
अवधि : 1घंटा, 40मिनट
निर्देशक : आर. बाल्की
लेखक : स्वानंद किरकिरे और आर. बाल्की
सिनेमेटोग्राफर : पी. सी. श्रीराम
एडिटर : चन्दन अरोड़ा
गीत : कौसर मुनीर
संगीत : अमित त्रिवेदी
कलाकार : अक्षय कुमार, राधिका आप्टे और सोनम कपूर

ब सुपर हीरो की बात होती है तब अनेक नाम सामने आते हैं, जैसे सुपरमैन, स्पाइडर मैन, बैट मैन, आयरन मैन आदि-आदि। लेकिन गौर से सोचिये तो इन सभी काल्पनिक सुपर हीरोज के बीच असली मर्द अगर कोई है तो वो है “पैडमैन”। औरत की अस्मिता, स्वास्थ्य और सम्मान की रक्षा करने वाले को ही तो हम असली मर्द यानी सुपर हीरो मानेंगें। “औरत की शर्म से बड़ी कोई बीमारी नहीं है।” यह कड़वी सच्चाई है कि औरत से जुड़ी सारी समस्याओं की जड़ यह शर्म ही है। औरत किस बात के लिए शर्मिन्दा है? वह माँ होने के लिए शर्मिन्दा है और बिना माहवारी के माँ नहीं बना जा सकता है। औरतों की माहवारी एक बायोलॉजिकल प्रोसेस है। शर्म के लिए इससे क्लासिक और इससे वाहियात उदाहरण दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। अभी-भी हमारे देश की 18 प्रतिशत महिलाएँ ही माहवारी के दौरान सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं और 82 प्रतिशत शर्म और गरीबी के गर्त में हैं। यह बहुत गंभीर मामला है, क्योंकि यह हमारी आधी जनसंख्या के स्वास्थ्य का मामला है। इस फिल्म के लिए “पैडमैन” की पूरी टीम  को बधाई।

एक संवाद और कमाल का है, “एक औरत की हिफ़ाज़त में नाकामयाब इन्सान खुद को मर्द कैसे कह सकता है”। यह साफ तौर पर मर्दों का नारी-विमर्श है। लेकिन अरुणाचलम एक मर्द हो कर अपने व्यवहार से स्त्रियों के स्वास्थ्य के लिए जो त्याग करते हैं, वह खोखले विमर्शों का मूँह हमेशा के लिए बंद कर देते हैं।

यह फिल्म की अरुणाचलम मुरुगनंतम के जीवन से प्रेरित है। अरुणाचलम ने लगभग एक दशक पहले चेन्नई आई.आई.टी. में सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली मशीन का प्रदर्शन किया था। सन 2016 में हमारे भारत के रत्न अरुणाचलम मुरुगनंतम को पद्मश्री का राष्ट्रीय सम्मान मिला।

“पैडमैन” की कड़ी को “स्वच्छ भारत मिशन” और “खुले में शौच मुक्त भारत” के सपने  से आसानी से जोड़ा जा सकता है। यह अरुणाचलम मुरुगनंतम की बेहतरीन बायोपिक भी हो सकती थी। हालाँकि अरुणाचलम मुरुगनंतम के ऊपर ‘मेंस्ट्रुअल मैन’ नाम की डॉक्यूमेंट्री अमित वीरमानी ने बनायी है, जिसका लाभ अरुणाचलम को मिला है। अब यह सारा लाभ “पैडमैन” को मिल रहा है। इसका एक पॉलिटिकल फायदा भी है,जो अमूर्त है। अमिताभ बच्चन एक निहायत ही भव्य प्रभाव डालने वाले सीन में कहते हैं कि अमेरिका के पास सुपरमैन है, बैडमैन है, स्पाइडर मैन है, लेकिन इंडिया के पास पैडमैन है। फिर उनका वक्तव्य अरुणाचलम के उद्यम से देश के उद्यम और सरकार की पंचवर्षीय योजनाओं वाले महात्म्य पर रंग-अबीर उड़ाते हुए समाप्त हो जाता है।

“पैडमैन” का पहला फ्रेम शहनाई की मनमोहक धुन और श्रीमती कान्ता चौहान के सुपुत्र लक्ष्मीकांत चौहान और श्रीमती शकुंतला चौबे की सुपुत्री गायत्री चौबे के मैरिज कार्ड के क्लोज शॉट से शुरू होता है। नर-नारी शादी के फेरे लगा रहे हैं। पहले ही फेरे में माँ इशारे से अपने बेटे से कहती है,‘दाँत मत चियार’। अक्षय के स्वाभाविक रूप से दाँत दिखाने के गुण को आर। बाल्की ने कहानी में अच्छी तरह से पिरो दिया है। “आज से तेरी सारी गलियाँ मेरी हो गयीं, आज से मेरा घर तेरा हो गया”, बहुत ही अच्छा गाना है। यह गाना आपका मूड सेट कर देता है।

इस फिल्म की कहानी ट्विंकल खन्ना की लघु कथा ‘द लिजेंड ऑफ़ लक्ष्मी प्रसाद’ पर आधारित है। इसे तमिलनाडु के कोयम्बटूर से मध्यप्रदेश के मालवा में स्थान्तरित कर दिया गया। मांडू और महेश्वर का लोकेशन मन को भाता है। कहानी का नायक लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) एक वेल्डिंग की दुकान में ईमानदारी और मेहनत से काम करता है। उसके परिवार में माँ, तीन बहनें और उसकी पत्नी (राधिका आप्टे) है। एक बहन की शादी हो चुकी है। उसकी पत्नी को मासिक धर्म के दिनों में बाहर रहना पड़ता है और उसकी माँ उसे छूने भी नहीं देती। उसकी पत्नी का पीरियड चल ही रहा होता है। इसी बीच एक दिन लक्ष्मीकांत को यह पता  चलता है कि उसकी पत्नी गंदे कपड़े का इस्तेमाल करती है। ऐसा कपड़ा जिससे वह अपना साइकिल भी पोंछना पसंद नहीं करेगा। उसे यह बात बहुत बूरी लगती है। वह बहुत पढ़ा-लिखा नहीं है; लेकिन एक क्लासिक आदमी है, जिसे हम बोलचाल में हीरा कह देते हैं। यह कहानी का पहला प्रस्थान बिन्दु है।

वह बाज़ार से सैनिटरी नैपकिन खरीदकर लाता है, लेकिन जब उसकी पत्नी को पता चलता है कि उसकी कीमत 55 रुपये है तो वह पैड का इस्तेमाल करने से साफ मना कर देती है। वह गायत्री को समझाता है कि रानी मुखर्जी के ज़माने में वह देविका रानी जैसी बातें क्यों कर रही है। लेकिन वह खाँटी हिन्दुस्तानी औरत निकलती है। मजबूरन लक्ष्मीकांत को पैड वापस लेना पड़ता है।

शादी के बाद से ही वह अपनी पत्नी की सुविधा के लिए कुछ-न-कुछ बनाते रहता है। जैसे उसने गायत्री के लिए एक स्वचालित गुड्डा बनाया है, जो प्याज काटता है। वह अपनी बुद्धि लगाकर जीरो कॉस्ट पर सैनिटरी नैपकिन बनाता है, लेकिन फ्लॉप हो जाता है। वह बहुत मुश्किलों और संघर्षों से गुजर कर इस्तेमाल किये जाने लायक पैड बना पाता है। जो बेटी अपने पिता से कल तक चॉकलेट के लिए पैसा माँगती थी, वही किसी दिन पैड के लिए पैसा माँग लेती है तो कौन-सा अपराध हो जाता है। उसकी पत्नी पैड बनाने के उसके काम में उसका पूरा साथ नहीं देती है। लक्ष्मीकांत पहली बार रजस्वला हुई एक बच्ची को रात में चुपके-से पैड देने जाता है। पूरी सोसाइटी उसे रात में दिन-दहाड़े पकड़ लेती है। उसकी माँ, उसकी बहनों, उसकी पत्नी और गाँव वालों को लगता है कि वह बहुत ही ढीले नाड़े का आदमी है। अब इससे नीच आदमी धरती पर नहीं हो सकता। उसे गाँव छोड़कर जाना पड़ता है। वह पैड बनाने वाली मशीन बनाता है। उसकी ज़िन्दगी में परी (सोनम कपूर) आती है और देखते ही देखते पूरी दुनिया में उसका नाम हो जाता है।

आर. बाल्की प्रतिभावान हैं और वे जैसी फिल्म बनाना चाहते थे, उन्होंने वैसी ही बनायी है। कौसर मुनीर के गीत के बोल दिल को छू जाते हैं और अमित त्रिवेदी का संगीत अच्छा है। अक्षय कुमार के काम को लोग पसन्द करेंगे। राधिका आप्टे ने अपने रोल के साथ पूर्णतः न्याय किया है। उन्होंने एक बेबस घरेलु-स्त्री को चरितार्थ कर दिया है। वह इतनी बेबस है कि अपने पति का साथ भी नहीं दे पाती है। आप्टे बहुत कन्विंसिंग लगी हैं। सोनम कपूर का तबला वाला इंट्रोडक्शन आर. बाल्की के कैरियर का सबसे फालतू सीन होगा। सोनम कपूर का काम सोनम कपूर वाला है। शेष सभी कलाकारों ने अच्छा काम किया है।

फिल्म पैडमैन अपने कारोबारी और सामाजिक मकसद में  कामयाब होती हुई सी दिखती है लेकिन अगर मुद्दे की बात करें तो अभी संघर्ष की राह बहुत लंबी है। हम उस देश में रहते हैं जहाँ मासिक धर्म की स्थिति में (रजस्वला मुद्रा) देवी की पूजा की जाती है। शायद ही दुनिया में और कहीं ऐसी किसी पूजा का उदाहरण देखने-सुनने को मिले। यह भारत ही है जहाँ रजस्वला स्त्री की पूजा होती है। कामाख्या मंदिर में अम्बुवाची पर्व के दौरान माँ भगवती रजस्वला होती हैं और उनकी गर्भ गृह स्थित महामुद्रा (योनि-कुण्ड) से निरंतर तीन दिनों तक जल-प्रवाह के स्थान पर रक्त-प्रवाह होता है।

“योनि मात्र शरीराय कुंजवासिनी कामदा,
रजोस्वला महातेजा कामाक्षी ध्येताम सदा।”

यह माँ भगवती का रजस्वला पर्व होता है, लेकिन वहीं दूसरी ओर इसी समाज में एक स्त्री को अगर खुद सेनेटरी नैपकीन दुकान पर जाकर खरीदना हो तो वह असहज हो जाती है। हमारे देश को एक फिल्म के अलावा अनेक पैडमैन पैदा करने होंगे। समाज को माहवारी के प्रति और संवेदनशील बनाना होगा ताकि कभी अचानक जरुरत पड़ने पर एक स्त्री न सिर्फ दवाई की दूकान बल्कि किसी भी गैर-पारंपरिक आउटलेट जैसे पेट्रोल पंप, पान की दूकान, चाय-सब्जी की रेहड़ी, मिल्क-बूथ, पोस्ट-ऑफिस, ग्राम-पंचायत, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, मेट्रो स्टेशन, शिक्षण संस्थान या कार्यस्थल कहीं से भी सेनेटरी नैपकीन बेझिझक प्राप्त कर सके। एड्स नियंत्रण के लिए सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं ने मिलकर जिस तरह कंडोम की उपलब्धता गैर-पारंपरिक आउटलेट्स पर करवाई है, वैसे ही सेनेटरी नैपकीन को भी सुलभता से उपलब्ध करवाना होगा।

आशा है, “पैडमैन” का हमारे समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और पुरुष माहवारी और स्त्रियों के प्रति अधिक संवेदनशील बन पाएँगें।

इस फिल्म का ऑफिसियल ट्रेलर नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके देखा जा सकता है :

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सिनेमा में गहरी रूचि और समझ रखने वाले विनोद सिंह एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। मायानगरी मुंबई में रहकर वे हिंद वॉच मीडिया के लिए नियमित तौर पर सिनेमा से जुड़े विषयों पर लिखते रहे हैं। उनकी फिल्म समीक्षा पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय है। विनोद सिंह हिंद वॉच मीडिया संपादक मंडल के सदस्य होने के साथ-साथ सिनेमा सेक्शन के उप-संपादक भी हैं। सरल भाषा और सपाट बयानी उनकी लेखनी को विशिष्ट पहचान देती है। हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|