पद्मावत : जौहर का महिमागान

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फ़िल्म : पद्मावत
हिंद वॉच मीडिया रेटिंग : ढ़ाई स्टार  2.5 


बैनर : भंसाली प्रोडक्शन और वायाकॉम 18 मोशन पिक्चर्स
सेंसर सर्टिफिकेट: U/A
जॉनर : ड्रामा    
अवधि : 2घंटा, 43मिनट
निर्देशक : संजय लीला भंसाली
लेखक : प्रकाश कापड़िया, संजय लीला भंसाली
सिनेमेटोग्राफर : सुदीप चटर्जी
एडिटर : राजेश सी| पांडे
संगीत : संजय लीला भंसाली
कलाकार : दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर, रणवीर सिंह, अदिति राव हैदरी, जिम सारभ            

जौहर की महिमागाथा के बहाने बॉक्स ऑफिस की वसूली का खेल 

‘पद्मावत’ पहली फिल्म है, जिसके लिए दो स्क्रिप्ट लिखी गयी| एक स्क्रिप्ट वह जिस पर फिल्म बनी और दूसरी पटकथा वह जिसके अनुसार फिल्म के रिलीज होने के बाद भी धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं| यह पूँजी नियंत्रित खेल है| यहाँ कला, सिनेमा और समाज बाद में है, सबसे पहले है फायदा| दोनों ही पटकथाओं के लिए एक ही स्रोत से फंड लगता है| देश की न्यायपालिका के पद्मावत की रिलीज के फैसले के बाद भी कई राज्य सरकारें मनमानी कर रही हैं| ये कला विरोधी लोग अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं|

ज़रा सोचिये फिल्म बनाने के लिए यही विषय क्यों चुना गया और इस फिल्म से सीधा फायदा किसका हो रहा है? पहला कॉस्ट्यूम-ड्रामा और पीरियड सिनेमा में आप अनाप-शनाप पैसे खर्च भी कर सकते हैं और दूसरा उसे जैसा चाहे दिखा भी सकते हैं|  दो कौड़ी के विषय को दो सौ करोड़ का बना देते हैं और लोग वाह-वाह करते हैं कि देखो एक सौ नब्बे करोड़ की बड़ी फिल्म बन रही है| जिस आईडिया को घूरे (डस्टबिन) पर फेंक देना चाहिए उस आईडिया को महान निर्देशक ने हमारे सर का ताज बना दिया| 

 इतना महान फिल्मांकन कि न्यायसंगत सा दिखने लगा जौहर 

जौहर सीधे नारी की योनि-सुचिता से जुड़ा है और स्त्री-पुरुष के गौरव का केंद्र भी यही है| सती-प्रथा जौहर का एक छोटा रूप है, जिसका प्रचंड विरोध हमारे आधुनिक भारत और नवजागरण के अग्रदूत राजा राम मोहन राय ने किया था| ऐसे समय में जब हम पोलियो मुक्त भारत की तरह सती-प्रथा मुक्त भारत की ओर बढ़ ही रहे हैं कि गड़े मुर्दे को उखाड़कर उसे घूमर नाच नचाया जाता है| यह नाच इतना खुबसूरत फिल्माया गया है कि आपकी आँखें खुली की खुली रह जाती हैं| मैं तो बहुत भावुक हो गया और बरबस बोल पड़ा जुग-जुग जियो भंसाली| जब मैं फिल्मी दृश्यों के सम्मोहन से बाहर आया तो मुझे लगा कि फिल्मी दुनिया में प्रोपेगेंडा का ताज संजय लीला भंसाली के सिर पर शोभा देगा| इस जादूगर ने चाटुकार मीडिया के साथ मिलकर हमारे विवेक का हरण कर लिया है| हमारी बुद्धि कूड़े की विवेचना में लगी है| 1303 ईसवी की हड्डियाँ और राख हमारे विमर्श के केंद्र में हैं| संजय लीला भंसाली को दलाल मीडिया के सौजन्य से यह उपलब्धि प्राप्त हुई है|   

 फिल्ममेकिंग की जादूगरी 

जहाँ तक फिल्ममेकिंग क्राफ्ट का सवाल है, मैं निर्देशक का हाथ चूम लेना चाहता हूँ| हाथ इसलिए चूमना चाहता हूँ कि उनकी पकड़ क्राफ्ट के ऊपर बहुत मजबूत है, जिसके लिए अच्छे-अच्छों को तप करना पड़ता है और फिर भी वहाँ पहुँच नहीं पाते हैं|  लेकिन उनके अंतःकरण का क्या करें, जिसे उन्होंने बहुत ऊँची कीमत पर किसी पूँजीपति को पट्टे (lease) पर दे दिया है| इनकी निगाह हजार करोड़ के धंधे पर है, वह भी केवल भावनायें भड़काकर और भावनाओं के साथ खेलकर|

इस महान निर्देशक ने कॉर्पोरेट पूंजी के साथ साँठ-गाँठ करके भारतीय मेधा का मजाक बना दिया है| हिन्दुस्तानियों की बुद्धि के साथ फुटबॉल की तरह खेला है| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अपने स्वार्थ के लिए शातिराना विज्ञापन किया है और फिर चुप्पी मार कर बैठ गया| यह दूसरे स्क्रिप्ट में लिखा होगा कि देश जलता रहे लेकिन तुम शातिर राजनेता की तरह मूँह पर ताला लगाये रखना| ऐसे लोग कभी भी अभिव्यक्ति के खतरे नहीं उठाते| इसकी सजा तो इन्हें मिलनी ही चाहिए| लेकिन वीर करणी सेना तो इसकी सजा मासूम बच्चों को दे रही है| भंसाली विचार के स्तर पर करणी सेना से भिन्न नहीं हैं| ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं| इतिहास में इसे भी याद रखा जायेगा कि एक महान फिल्मकार जिन लोगों की प्रशस्तियाँ गा रहा है, वही उनका विरोध कर रहे हैं|

संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावत’ बॉलीवुड की एक बड़ी महत्त्वाकांक्षी फिल्म है| यह मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य ‘पद्मावत’ से प्रेरित है| यह सोलहवीं शताब्दी की रचना है जिसे जायसी ने अवधी भाषा में लिखा है| इस कथा की नायिका एक महान हिन्दू राजपूत रानी पद्मावती है| 

संजय लीला भंसाली अपने फिल्म के हर फ्रेम को कलात्मक बनाते हैं और किसी बेहतरीन पेंटिंग की तरह संवारते हैं| उनकी फिल्मों के सेट भव्य होते हैं| अपने क्राफ्ट पर उनकी पकड़ मजबूत है| उनकी फिल्मों के दृश्यों को आप एक समय सीमा तक भूल नहीं पाते हैं, क्योंकि वे छोटी-छोटी डिटेल पर बारीकी से काम करते हैं| भंसाली और सिनेमेटोग्राफर सुदीप चटर्जी अपने दृश्यों में पेंटिंग और कविता का सा जादू रचते हैं, 3डी से उसे और जीवंत बना दिया जाता है| ‘पद्मावत’ को आइमैक्स 3-डी में बनी पहली फिल्म बताया जा रहा है| यहाँ तकनीक और भव्य सेट मन मोहने वाले हैं| इन सबके बावजूद हम असली सिनेमाई सम्मोहन से वंचित रह जाते हैं| यह फिल्म तीन साल से बन रही थी और मुझे पूरा विश्वास था कि इस महाकाव्य के साथ कोई न्याय कर सकता है तो वो हैं भंसाली|

 खलनायक के किरदार खिलज़ी को महानतम दिखाती हुई सी प्रस्तुति 

उन्होंने जिस पात्र को सबसे ज्यादा उभारा है वो है अलाउद्दीन खिलजी| यह पात्र क्रूर, दुर्दान्त, लोलुप और कपटी है| उसके इन भावों को भंसाली ने नायकत्व में बदल दिया है| इस पात्र के चरित्र के कई आयाम हैं, जिन्हें उभारना आसान था| यह तो मानना ही पड़ेगा कि भंसाली और उनके लाडले रणवीर ने इस पर बहुत काम किया है और वह पर्दे पर दिखता भी है| रणवीर की आँखों में क्रूरता साफ दिखती है| वह एक महान खलनायक लगता है| इतना महान कि उसका खलनायकत्व नायकत्व में बदल जाता है| खिलजी के महिमामंडन ने उसे इस फिल्म का मुख्य किरदार बना दिया है| इस फिल्म का नाम ‘खिलजी द ग्रेट’ होता तो इस किरदार के साथ समुचित न्याय हो जाता| यूँ ही पाकिस्तान के सेंसर बोर्ड ने बिना किसी कट के इस फिल्म को ‘यू’ सर्टिफिकेट नहीं दे दिया| खिलजी आक्रान्ता था यह उनके लिए शर्म की बात नहीं होनी चाहिए है, क्योंकि फिल्म में उसका महिमागान उसे हीरो बना रहा है|

 खूबसूरती के जौहरी भंसाली 

पद्मावती जो इस फिल्म की तथाकथित नायिका है उसके सौन्दर्य को दिखाना भंसाली की दूसरी प्राथमिकता है| दीपिका ने पद्मावती को अपने अंदर उतार लिया है| उनकी खूबसूरती के जौहरी भंसाली ने जौहर तक उनकी खूबसूरती को कैमरे पर कम नहीं पड़ने दिया है| महाराजा रतनसिंह की भूमिका में शाहिद कपूर को जितना स्पेस मिला है उसके हिसाब से उन्होंने बहुत अच्छा काम किया है| जलालुद्दीन के किरदार को रजा मुराद ने अपनी अदायगी और दमदार आवाज से साकार कर दिया है| अदिति राव हैदरी और जिम सारभ ने अच्छा काम किया है|

 प्रेम पर भारी पड़ता खौफ़ 

अलाउद्दीन खिलजी के हरम और महाराजा रतनसिंह के रानीवास दोनों में रानियों की कमी नहीं है| अलाउद्दीन खिलजी एक खलनायक है क्योंकि वह महाराजा रतनसिंह के साथ छल करता है और उसमें दूसरी बुराइयाँ भी हैं| उसे पद्मावती को किसी कीमत पर पाना है इसलिए वह बहुत सक्रिय है| जबकि महाराजा रतनसिंह को कुछ पाने की हड़बड़ी नहीं है इसलिए वे बहुत सक्रिय नहीं दिखते हैं| ऐसे में पद्मावती और रतनसिंह का प्रेम सम्बन्ध फींका और अलाउद्दीन खिलजी का खौफ भारी पड़ जाता है|  

 जायसी सूरज, भंसाली दिया 

अपनी रचना ‘पद्मावत’ में मलिक मोहम्मद जायसी अपने पाठकों को कल्पना की जिस भूमि पर ले जाते हैं, भंसाली वहाँ तक नहीं पहुँच पाते हैं| वे मूल रचना से न्याय नहीं कर पाते हैं| हालाँकि फिल्म ‘पद्मावत’ को जायसी के महाकाव्य पर आधारित नहीं बल्कि उससे प्रेरित बताया गया है| इसे आलोचना और विरोध से बचने के लिए भंसाली की चाल कह सकते हैं| भंसाली ने दर्शकों के सामने अपनी तरह का ‘लार्जर दैन लाइफ’ व्यावसायिक सिनेमा परोसा है| फिल्म का कैनवास बड़ा है और टेक्सचर पर विशेष ध्यान दिया गया है जिसके कारण राजस्थान के रजवाड़ों का रंग उभर कर आया है|

उस समय की भाषा और संस्कृति को दिखाने के लिए जिस रिसर्च की जरूरत थी, उसपर समुचित ध्यान नहीं दिया गया है| यह काम आमतौर पर लेखक प्रजाति ही करती है और इनकी उपेक्षा सबसे ज्यादा है|  

 अस्वीकरण के बहाने 

“प्रस्‍तुत फिल्‍म ‘पद्मावत’ मलिक मोहम्‍मद जायसी द्वारा लिखे गए महाकाव्‍य ‘पद्मावत’ से प्रेरित है, जिसे प्रचलित रूप से काल्‍पनिक माना जाता है| फिल्‍म में दर्शाए गए सभी स्‍थल, किरदार, घटनाएं, जगह, भाषाएं, नृत्‍य, पहनावे इत्‍यादि ऐतिहासिक रूप से सटीक या वास्‍तविक होने का कोई दावा नहीं करते हैं| हम किसी भी सूरत में किसी भी इंसान, समुदाय, समाज,  उनकी संस्कृति, रीति-रिवाजों, उनकी मान्‍यताओं, परम्पराओं या उनकी भावनाओं को हानि पहुँचाना या उनकी उपेक्षा करना नहीं चाहते| इस फिल्‍म का उद्देश्‍य सती या ऐसी किसी भी प्रथा को बढ़ावा देना नहीं है|” इस लंबे डिस्‍क्‍लेमर के बाद संजय लीला भंसाली की फिल्‍म ‘पद्मावत’ पर्दे पर आरंभ होती है|

यह डिस्क्लेमर उस झीनी सफेद साड़ी की तरह होता है, जिसे पहनकर नायिका नहाती है और सेंसर बोर्ड की आँखों पर पर्दा पड़ जाता है| यह पारदर्शी कपड़ा सेंसर बोर्ड को एक नैतिक आवरण दे देता है| इसके बाद फिल्ममेकर जनता जनार्दन को जो दिखाना चाहता है, वह उसी को देखती है| क्या यह हमारी संस्कृति को परिभाषित नहीं करता है? चार्ली चैप्लिन मानते हैं कि जनता क्या देखेगी, यह पूरी तरह से फिल्ममेकर की ज़िम्मेदारी है|

 आखिरकार 

फिल्म की शुरुआत में डिस्क्लेमर दिखा देने से किसी नियम का अनुपालन तो शायद हो जाता हो लेकिन दामन के इस दाग से छुटकारा नहीं मिल सकता कि एक महत्वाकांक्षी और विवादित फिल्म का समूचा उद्देश्य जौहर की महिमागाथा के बहाने बॉक्स ऑफिस की वसूली भर था|

इस फिल्म के ऑफिसियल ट्रेलर को निचे दिए लिंक पर क्लिक करके देखा जा सकता है :

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