(Illustrated by Tapas Guha, published by Pratham Books with the story Marching to Freedom by Subhadra Sen Gupta)
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अभी बकरी की निष्‍पक्ष जांच चल ही रही थी कि अचानक जांच बीच में रूक गई तो मुजरिमों के बदले मैं परेशान हो उठा। पता करने पर पता चला कि बकरी की मौत की निष्‍पक्ष जांच करने वाले अपनी ही निष्‍पक्ष जांच में उलझ गए हैं। जांच निष्‍पक्ष हो, इसलिए सरकार उन्हें छुट्टी पर भेजना चाह रही है, पर वे छुट्टी पर न जाने के लिए अड़े हैं।


मैं दाढ़ी से साम्यवादी हूं तो वे बकरी से गांधीवादी। वे हाथ से कांग्रेसी हैं तो वे भगवा से दक्षिणपंथी, वे पहरावे से कट्टरपंथी। कुल मिलाकर हमारा मुहल्ला रिश्‍ते नातों से नहीं, किस्म किस्म के ‘वादियों’ और ‘पंथियों’ से भरा है।

बकरी पालक गांधीवादीजी को पता नहीं क्यों लगा कि अब उन्हें बकरी से मुक्ति पा लेनी चाहिए? हालांकि बकरी अभी भी अच्छा दूध दे रही थी। सच पूछो तो वे अपने गांधीवादी दर्शन को बकरी का दूध पिला ही हृष्‍ट पुष्‍ट रखे थे। वे बकरी को कई बार तो इतना दुह लेते कि…. वे दफ्तर में जनता का खून पीने के बाद सुबहो शाम जमकर बकरी का दूध पीते थे। कई बार मन तो उनका बकरी को खाने को भी करता , पर पता नहीं किस शर्म के मारे चुप रहते। वे सरकारी नौकरी पर से शाम को जो भी ऊपर का कमा कर लाते, उससे मेवे खरीदते और बकरी को खिला देते ताकि उन पर कोई ये लांछन न लगाए कि वे अपने लिए रिश्‍वत लेते हैं। गांधीवादी थे सो गौग्रास के बदले वे बकरीग्रास के नाम पर ही रिश्‍वत लेते।

और एक दिन उनकी बकरी मर गई या कि उन्होंने गांधीवाद से छुटकारा पाने के लिए बकरी को मार दिया, ये बकरी की आत्मा जाने, या वे। पर उनकी पत्नी ने मुहल्ले में दबे स्वर में यह कइयों को बताया भी कि उन्हें कई दिनों से असल में गांधीवाद का बोले तो बकरी का दूध पच नहीं रहा था। सो उन्होंने गांधीवादी बकरी से छुटकारा पाने का बदनाम तरीका सोचा और बकरी को कीड़े पड़ी कीड़े मारने वाली दवाई मेवों में खिला मार दिया।

बकरी के अपने आप मरने या उनके द्वारा बकरी को मारने के बाद उन्हें लगा कि क्यों न बकरी की मौत को सनसनी बनाया जाए। बकरी की मौत का शुद्ध देसी गाय के घी वाला हलवा बनाया जाए। किसी वादी को उसमें फंसाया जाए। और उन्होंने आव देखा न ताव, प्रेस कांफ्रेंस कर शंका फैला दी कि किसी वादी ने उनकी गांधीवादी बकरी को मार दिया। मैं यह सुन हक्का बक्का! अरे मैं तो खुद ही अब तिल तिल मर रहा हूं। किसीको क्या खाक मारूंगा? बकरी को मारने की उन्होंने अज्ञात के खिलाफ पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई तो पुलिस वाले पहली बार बिन कुछ लिए हरकत में आए। मामला गांधीवादी बकरी की मौत का जो था। आदमी की मौत का होता तो उसकी आत्मा तक से रिष्वत लेने के बाद ही कुर्सी पर से उठते।

फिर उन्हें लगा कि सौ-सौ रूपए में बिकने वाले पुलिसवाले बकरी की मौत की निष्‍पक्ष जांच नहीं करेंगे। दूसरे आज का दौर सीबीआई से जांच करवाने का दौर है। सो बकरी की मौत को और भी राजनीतिक बनाने के लिए उन्होंने सीबीआई की निष्‍पक्ष जांच की मांग कर डाली। वैसे भी अपने देश की सीबीआई के पास और दूसरी निष्‍पक्ष जांच करने को तो बची नहीं। वहां पर तो हर कोई उनकी जांच में टांग अड़ा उसे पक्षीय बना देता रहा है।

इस देश को पता नहीं इन दिनों क्या हो गया है? सब अपने अपने पक्ष में खड़े होने के बाद भी मांग निष्‍पक्षता की ही करते हैं। खुद अनैतिक होने के बाद भी नैतिकता के आधार पर एक दूसरे से इस्तीफे मांगते फिरते हैं।

उनकी अर्जी पर गंभीरता से गौर करते हुए सीबीआई को लगा कि वे अब तो कम से कम अपने को जस्टिफाई कर पाएंगे। अपनी जांच का हुनर बकरी की आत्मा को दिखा पाएंगे।

…..और देखते ही देखते सीबीआई हमारे मुहल्ले के आवारा शोहदों की तरह जब मन करता चक्कर लगाने लगी। बकरी के मौत के असली कारणों को जानने के लिए सबूत जुटाने लगी।

सीबीआई ने जांच शुरू करते ही कुछ काल्पनिक लाइव सीन क्रिएट किए। इसके लिए बकरी की आत्मा को हुनरमंदों की कोशिश से स्वर्ग से वापस बुलवाया गया।

पता नहीं क्यों, बकरी की मौत का सबसे अधिक शक मेरी सफेद होती दाढ़ी पर हो रहा था। बकरी की मौत की सुई इधर उधर जाने लगती तो वे पकड़ कर उसे मेरी दाढ़ी की ओर मोड़ देते। उनको लगता था कि बकरी हाथ से मिल सकती है। बकरी भगवे से मिल सकती है, पर दाढ़ी से नहीं मिल सकती। अंधों तक ने बकरी और दाढ़ी को एक दूसरे का धुर विरोधी जो मान लिया है।

मैंने भी सोचा कि चलो, कम से कम बकरी की मौत की निष्‍पक्ष जांच तो इस देश में हो ही जानी चाहिए ताकि मेरी दाढ़ी में झूठ का लगा तिनका देखने वालों के मुंह बंद हों।

बीवी को हर तरह का सहयोग देने वालों की तरह मैंने बकरी की जांच करने वाले सीबीआई के अफसरों का पूरा सहयोग दिया। मैं भी चाहता था कि बकरी के असली हत्यारों का पता लगना ही चाहिए।

अभी बकरी की निष्‍पक्ष जांच चल ही रही थी कि अचानक जांच बीच में रूक गई तो मुजरिमों के बदले मैं परेशान हो उठा। पता करने पर पता चला कि बकरी की मौत की निष्‍पक्ष जांच करने वाले अपनी ही निष्‍पक्ष जांच में उलझ गए हैं। जांच निष्‍पक्ष हो, इसलिए सरकार उन्हें छुट्टी पर भेजना चाह रही है, पर वे छुट्टी पर न जाने के लिए अड़े हैं। अजीब विविधताओं से भरे हैं अपने देश के दफ्तर भी। एक मेरे दफ्तर के वे हैं कि बिन छुट्टी ही हफ्तों दफ्तर से गायब रहते हैं और एक वे हैं कि उन्हें सरकार छुट्टी भेज रही है तो वे छुट्टी के विरूद्ध अपील कर रहे हैं।

इधर अपनी मौत का पता होने के बाद भी अपनी मौत की रूकी निष्‍पक्ष जांच को लेकर बकरी की आत्मा भूखी प्यासी परेशान है तो दूसरी तरफ वे एक दूसरे पर कीचड उछालते अपने मामले की निष्‍पक्ष जांच करते। ऐसे में वे अब अपने मामले को निष्‍पक्षता से निपटाएं या बकरी के मामले को?

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हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की अर्की तहसील के म्याणा गांव में जन्में डॉ. अशोक गौतम हिमाचल प्रदेश के उच्चतर शिक्षा विभाग में एसोशिएट प्रोफेसर के  पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से साठोत्तर प्रमुख हिंदी नाटकों में अस्तित्ववादी-चेतना शोध विषय पर पीएच.डी किया है। मुख्य रूप से वे व्यंग्य लिखते हैं और “लट्ठमेव जयते”, “गधे ने जब मुंह खोला”, “झूठ के होलसेलर”, “खड़ा खाट फिर भी ठाठ”, “ये जो पायजामे में हूं मैं”, “साढ़े तीन आखर अप्रोच के”, “मेवामय ये देश हमारा”, “फेसबुक पर होरी”,  “पुलिस नाके पर भगवान”, “वफादारी का हलफ़नामा” और “नमस्कार को पुरस्कार” उनके प्रकाशित व्यंग्य संग्रह हैं। उनकी रचनाएं विगत 30 वर्षों से देश के प्रतिष्ठित अखबारों, पत्रिकाओं और वेब-पोर्टल्स में निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। संपर्कः- गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212 (हिमाचल प्रदेश) मोबाइल नम्बर : 9418070089, ई-मेल : [email protected]