हिंद वॉच मीडिया रेटिंग : 3 स्टार 
फ़िल्म का नाम : मानसून शूटआउट
सेंसर सर्टिफिकेट : U/A
जॉनर : क्राइम-थ्रिलर
अवधि : 1 घंटा, 32 मिनट
निर्माता : गुनीत मोंगा
निर्देशक : अमित कुमार
लेखक : अमित कुमार
कलाकार : नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, नीरज कबी, विजय वर्मा, गीतांजलि थापा, तनिष्ठा चटर्जी, जयंत गडेकर, ओमकार मणिकपुरी, श्रुति बाप्ना, सृजिता डे
संगीत : आतिफ अफजल, गिंगेर शंकर

ज़िन्दगी जब गन-पॉइंट पे हो और आपके निर्णय से हमेशा के लिए आपकी ज़िन्दगी बदल जाने वाली हो। आपके पास तीन रास्ते हों अच्छा, बूरा और बीच का तो आप क्या करेंगे? ‘मानसून शूटआउट’ का नायक इसी सवाल से जूझता है। अगर आपने निर्णय लेने में देरी की तो वक़्त निर्णय ले लेगा। ऐसे में नायक को निर्णायक होना होता है। फ़िल्म बताती है कि आदमी को निर्णायक होना ही चाहिए। क्या नायक सही निर्णय ले पाता है? यहाँ दर्शक नायक से जुड़ जाता है, क्योंकि जीवन में हमें भी रोज़ ही निर्णय लेना होता है।

फ़िल्म यहाँ से आपको बाँध लेती है। एक अच्छी फ़िल्म का सबसे पहला और अहम काम होता है, दर्शकों को बाँध लेना। फ़िल्म आपको अपने में समो लेती है और आप इस फ़िल्म के हिस्सा हो जाते हैं। तभी तो हम फ़िल्में देखते-देखते रोने और हँसने लगते हैं। यहाँ आपको रस मिलने लगता है, रोमांच का रस। आगे आपको मिलेगा हिंसा, थ्रिल और एक्शन। दर्शक कहानी में कालानुक्रम (टाइम सीक्वेंस) का भी मज़ा ले पाएँगे।

 मुंबई क्राइम ब्रांच के कॉप आदि (विजय वर्मा) के पहले ही असाइनमेंट में उसका सामना शातिर अपराधी शिवा (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) से होता है। अगर वह शिवा को गोली मार देता है तो क्या होगा? अगर वह शिवा को गोली नहीं मारता है तो क्या होगा? अगर वह शिवा से बात करता है तो क्या होगा? आपको फ़िल्म में तीनों व्याख्याएँ देखने को मिलेंगी।

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नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी एक रिफ़ाइन्ड एक्टर हैं। किलर के रोल में उन्होंने अपनी एक अलग छवि बनायी है। यह नये दौर के निर्देशकों द्वारा बनाया गया किलर है। वे अपने किरदार को चेहरे के हाव-भाव बॉडी लैंग्वेज और आँखों की खौफनाक चमक से साकार कर देते हैं। एक आदर्शवादी पुलिसकर्मी की परिस्थितियाँ और उसके विरोधाभास को विजय वर्मा ने अच्छा से निभाया है। नीरज कबी हिन्दी सिनेमा के लिए उपहार हैं। ग़जब का मझा हुआ और शिक्षित अभिनेता। उन्होंने बहुत कठिन साधना और तपस्या से अपने आप को निर्मित किया है। यह उनके आत्मविश्वास से पता चलता है। ये हमारे ऐसे अभिनेता हैं जिनपर फ़िल्म इंडस्ट्री को गर्व होना चाहिए। सभी कलाकारों का काम अच्छा है।

लेखक-निर्देशक अमित कुमार की डेब्यू फ़िल्म ‘मानसून शूटआउट’ अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में पसंद की गयी है। यह 2013 में कॉन्स में दिखायी गयी थी। कहानी का नैरेशन थोड़ा पेचीदा है लेकिन यह तो कहानी की माँग है।

यह आइडिया अमित कुमार को जहाँ से भी आया हो अपना काम उन्होंने अच्छा किया है। फ़िल्म के निर्देशन और कहानी के नैरेशन पर उनकी पकड़ है। सिनेमेटोग्राफर ने मुंबई की बारिश, यहाँ की गलियों और सड़कों पर फिल्माए गये दृश्यों को जीवंत कर दिया है।

अगर आपने समय रहते निर्णय नहीं लिया, तो कई बार ज़िन्दगी अच्छे से फींचकर सड़कों पर लंबे-लंबे डग भरने के लिए छोड़ देती है।

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सिनेमा में गहरी रूचि और समझ रखने वाले विनोद सिंह एक स्वतंत्र पत्रकार हैं| मायानगरी मुंबई में रहकर वे हिंद वॉच मीडिया के लिए नियमित तौर पर सिनेमा से जुड़े विषयों पर लिखते रहे हैं| उनकी फिल्म समीक्षा पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय है| विनोद सिंह हिंद वॉच मीडिया संपादक मंडल के सदस्य होने के साथ-साथ सिनेमा सेक्शन के उप-संपादक भी हैं| सरल भाषा और सपाट बयानी उनकी लेखनी को विशिष्ट पहचान देती है| हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रही है| साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करती है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|