नागालैंड में चुनावी सरगर्मी शबाब पर है। आमतौर पर यहां होने वाले चुनावों में बहुत ज़्यादा उठापठक नहीं दिखती लेकिन इस बार बैप्टिस्ट चर्च ने भाजपा को आड़े हाथों लेकर संकेत दे दिए हैं कि भाजपा इस राज्य में उतनी आसानी से वोट नहीं जुटा पाएगी, जितनी आसानी से से लग रहा था।

दरअसल इस राज्य के आमतौर पर सभी उम्मीदवार ईसाई समुदाय के हैं इसलिए चुनावी राजनीति में धर्म की भी कोई जगह नहीं बची है, लेकिन जब चर्च सामने आया है तो लगता है सियासी समीकरण बदल सकते हैं।

क्या है पूरा मामला आइये समझते हैं। आपको बता दें कि जैसा कि बैपटिस्ट चर्च ने बीजेपी पर सीधा हमला बोला है।

बैपटिस्ट चर्च की तरफ से कहा गया है कि अनुयायी पैसे और विकास की बात के नाम पर ईसाई सिद्धांतों और श्रद्धा को उन लोगों के हाथों में न सौंपे जो यीशु मसीह के दिल को घायल करने की फिराक में रहते हैं।

राज्य में बैप्टिस्ट चर्चों की सर्वोच्च संस्था नागालैंड बैपटिस्ट चर्च परिषद (एनबीसीसी) ने नगालैंड की सभी पार्टियों के अध्यक्षों के नाम एक खुला खत लिखा है। इस खुले खत में लिखा गया है 2015-2017 के दौरान आरएसएस समर्थित भाजपा सरकार में भारत ने अल्पसंख्य समुदायों के लिए में सबसे बुरा अनुभव अनुभव है।

महासचिव ने पत्र में कहा- ”प्रभु जरूर रो रहे होंगे जब नगा नेता उन लोगों के पीछे गए जो भारत में हमारी जमीन पर ईसाई धर्म को नष्ट करना चाहते हैं।”

चर्च के द्वारा लिए गए इस फैसले पर एनबीसीसी के महासचिव झेलहोउ केयहो ने कहा, ”इस बार आरएसएस समर्थित बीजेपी वाकई में खतरा बन चुकी है। इसलिए हमने सोचा के हमें एक मजबत फैसला लेना चाहिए न केवल चर्चों के लिए, बल्कि सामान्य रूप से देश में ईसाइयों के लिए भी।”

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किसी चर्च का इस तरह सामने आकर किसी पार्टी का विरोध करना हल्की बात नहीं है। वो भी तब जब ज्यादातर वोटर उसी सकमुदाय के हों। यह भाजपा के लिए चुनौती बढ़ाने से कम नहीं है।

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