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प कंक्रीट के जंगल में खो गए हों और अचानक से आपको हरियाली और कल-कल बहते हुए झरने दिख जाएँ| आप सुकून से लबालब हो जाते हैं| यह फ़िल्म देखते हुए आपको ऐसा ही लगेगा| हिन्दी सिनेमा में तो प्रेम कहानियों की भरमार है| “क़रीब-क़रीब सिंगल” की कहानी के धागे आपको ‘कमिंग ऑफ़ ऐज’ (नवाचार) सिनेमा ही नहीं, पॉपुलर सिनेमा में भी मिल जायेंगे| इस फ़िल्म की खासियत है किस्सागोई का अनोखा अंदाज़| कहानी हौले-हौले से आगे बढ़ती है और आपके मन में उतरती जाती है| जया (पार्वती) को देखकर ऐसा लगता है कि हिरोइन एक सचमुच की औरत भी होती है| आपको लगता है कि मेन स्ट्रीम सिनेमा की हिरोइनें कितनी नकली हैं| उनमें सबकुछ दिखता है लेकिन एक औरत गायब होती है, मतलब इंसान गायब होता है| तनुजा चंद्रा आपको एक औरत और एक मर्द से मुखातिब करवाती हैं, जिसे उपभोक्तावाद लील रहा है| यह आदम-हव्वा का मिलन है| यही तो सनातन है|

मर्द लोग कितना नीचे गिर गये हैं| पुरुष-औरतों के बारे में कितना गंदा सोचता है| यह जानने की स्वाभाविक उत्सुकता योगी (इरफान) में होती है| जया को अपने स्मार्ट फोन का कमेंट बॉक्स योगी को दिखाना पड़ता है| इस तरह से दोनों में बातचीत का सिलसिला शुरू होता है| ऑनलाइन डेटिंग साइट पर मिलने के बाद ऑफलाइन की सच्ची ज़िन्दगी शुरू होती है| एक तरफ इरफान की बकबक तो दूसरी तरफ पार्वती की चुप्पी| लेकिन पार्वती की उँगलियाँ कीबोर्ड पर खूब बोलती हैं| पार्वती एक आधुनिक लड़की है जो एकाकी जीवन के घुटन का शिकार है| वहीँ इरफान का देसीपन और उनकी सच्चाई धीरे-धीरे पार्वती का मन मोह लेती है| डेटिंग साइट पर इरफान का प्रोफाइल देखते हुए पार्वती उन्हें इसलिए चुनती है क्योंकि उनकी रूचि कविता में है| इरफान एक शायर हैं, जिन्होंने अपनी किताबें खुद छपवाई हैं लेकिन बिकी एक भी नहीं| दोनों कलाकारों का अभिनय देखने लायक है| चेहरे के हाव-भाव से अपनी भावनाओं को दिखाने में दोनों अभिनेता वाकई कमाल करते हैं, आप देखते रह जायेंगे| पर्दे पर दोनों की केमेस्ट्री जादू करती है| राजस्थान, ऋषिकेश और गंगटोक का लोकेशन फ़िल्म के ढाँचा को मजबूत ही नहीं करता बल्कि कहानी के नैरेशन में बहुत कुछ जोड़ता भी है| यह फ़िल्म का यूएसपी बन गया है| फ़िल्म के गाने कहानी के साथ सीप और मोती की तरह मिले हुए हैं|

‘क़रीब क़रीब सिंगल’ कामना चंद्रा की लिखी कहानी पर आधारित है, जिसे उनकी सुपुत्री तनुजा चंद्रा ने निर्देशित किया है| उनकी फ़िल्म एक लम्बे अंतराल के बाद आयी है| उनके काम को फ़िल्म इंडस्ट्री में गंभीरता से लिया जाता है|

यह एक ऐसी फ़िल्म है, जहाँ कुछ नहीं होते हुए भी सबकुछ हो रहा है| यहाँ ज़िन्दगी, ज़िन्दगी को बुलाती हुई मिलेगी| यहाँ आपको प्यार की परिभाषा मिलेगी| आइए ज़िन्दगी को एक बार इस तरह से समझते हैं|

फ़िल्म : क़रीब क़रीब सिंगल
निर्माता : राकेश भगवानी, शैलेजा केजरीवाल और अजय राय
कलाकार : इरफान खान, पार्वती, नेहा धूपिया, ईशा श्रवणी, नवनीत निशान, अमन शर्मा और ब्रिजेंद्र काला
निर्देशक : तनुजा चंद्रा
संगीत : नरेश चंद्रावकर और बनेडिक्ट टेलर
जॉनर (शैली) : रॉमकॉम (रोमांटिक कॉमेडी)
अवधि : 2 घंटा 10 मिनट
हिंद वॉच मीडिया रेटिंग : 

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सिनेमा में गहरी रूचि और समझ रखने वाले विनोद सिंह एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। मायानगरी मुंबई में रहकर वे हिंद वॉच मीडिया के लिए नियमित तौर पर सिनेमा से जुड़े विषयों पर लिखते रहे हैं। उनकी फिल्म समीक्षा पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय है। विनोद सिंह हिंद वॉच मीडिया संपादक मंडल के सदस्य होने के साथ-साथ सिनेमा सेक्शन के उप-संपादक भी हैं। सरल भाषा और सपाट बयानी उनकी लेखनी को विशिष्ट पहचान देती है। हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|