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र तीज त्योहार को अपने घर मिठाई ले जाना भूल जाऊं तो भूल जाऊं, पर जिन अफसरों से मेरा साल भर काम करवाने के लिए वास्ता पड़ता रहता है, उनके घर मिठाई ले जाना नहीं भूलता। उन्हें भी पता है कि कोई तीज त्योहार पर उनके घर आए या न , पर मैं जरूर आऊंगा। इसलिए वे मेरे आने का इंतजार करते रहते हैं।

पिछले त्योहारों की तरह अबके फिर दीवाली को सारे काम छोड़ अपने काम आने वाले अफसरों के घर मिठाई देने की रस्म निभाने बाजार की तरफ ज्यों ही निकलने लगा कि बीवी ने मेरे रास्ते में टांग अड़ाते कहा,‘ अजी, कहां जा रहे हो? लक्ष्मी के आने का वक्त हो रहा है और तुम…’

‘अरी भागवान! मेरी लक्ष्मी तो वे हैं जिनकी वजह से सारा साल रेत की दीवारें चिनता रहता हूं। आज उनकी पूजा का दिन है सो…. आप तो जानते ही हैं कि तीज त्योहार के बहाने जो किसी काम आने वाले अफसर को गिफ्ट दे दिया जाए तो साल भर के डर का झंझट खत्म हो जाता है। तभी तो मेरी बगल में रहने वाले अफसर के घर तीज त्योहार पर गिफ्ट देने वालों की इतनी भीड़ लगी होती है कि जितनी छोटे मोटे गिफ्ट वाले की दुकान पर भी न लगती होगी।

तीज त्योहार असल में अफसरों को गिफ्ट देने का एक शास्त्रसम्मत बहाना होता है। उन्हें भी पता होता है कि फलां बंदे ने त्योहार पर साल भर का एडवांस उन्हें दे रखा है। अब जैसे भी हो उसका काम तो करना ही पड़ेगा, गिफ्ट की लाज तो बचानी ही पड़ेगी। अपनी बचे या न। आजकल समाज में अपनी लाज से अधिक बड़ी गिफ्ट की लाज हो गई है सर!

इसलिए गिफ्ट देने का एक और पवित्र बहाना हाथ आया देख मैं घरवाली की परवाह किए बिना उठा और सीधा मिठाई वाले की दुकान पर जा पहुंचा। तथाकथित त्योहारी हलवाई उस वक्त मिठाई की चाश्‍नी में सना अपने गमछे से मिठाई पर से मक्खियां उड़ा रहा था। मैंने मिठाई पर बैठी मक्खियों की ओर कोई ध्यान इसलिए नहीं दिया क्योंकि मुझे पता था कि यह मिठाई कौन सी अपने घर ले जा रहा हूं। मुझे तो एक परंपरा निभानी है बस। सो हलवाई से कहा,‘ भैया! मिठाई के आठ डिब्बे देना।’
‘कौन से वाली? इधर वाली या उधर वाली?’
‘इधर उधर वाली से क्या मतलब? अरे ये दे दो,’ मैंने उसकी उस ओर की मिठाई को दूर से उंगली लगाई। राम जाने दीवाली की खुशी के बहाने कंबख्त क्या बेच रहा होगा? कहीं छूने भर से ही जो बीमारी ने लपक लिया तो…. सैंपल भरने वालों का क्या! वे तो उससे दीवाली वसूल अपने हो लिए हैं। मिठाइयों के सैंपल जाएं भाड़ में। खाने वाले जाएं भाड़ में।
‘ अरे बाबू जी भड़क काहे रहे हो? मिठाई दो तरह की है। ये वाली अलग, वो वाली अलग।’
‘दो तरह की बोले तो?’
‘ एक चाटने वाली तो दूसरी बांटने वाली।’
‘मतलब? मिठाई तो जो भी हो, चाटने वाली ही होती है न?’
‘जो घर को ले जानी हो तो चाटने वाली ले जाओ और जो किसीको गिफ्ट देनी है तो बांटने वाली। बोलो कौन सी दूं?’ उसने मिठाइयों का त्योहार सम्मत वर्गीकरण किया।
‘बांटने को ले जानी है,’ मैंने दबे स्वर में कहा तो वह चहकते बोला,‘ तो खुलकर बोलो न बाबूजी! तीज त्योहारों पर लोग बांटने वाली ही मिठाई अधिक ले जाते हैं।’

‘तो बांटने वाली ही दे दो,’ मैंने चार पैसे बचाने की सोची और बगल में बांटने वाली मिठाई के थ्री डी डिब्बे दबा उनके घर को हो लिया, उन्हें दीवाली शुभ कहने।

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हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की अर्की तहसील के म्याणा गांव में जन्में डॉ. अशोक गौतम हिमाचल प्रदेश के उच्चतर शिक्षा विभाग में एसोशिएट प्रोफेसर के  पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से साठोत्तर प्रमुख हिंदी नाटकों में अस्तित्ववादी-चेतना शोध विषय पर पीएच.डी किया है। मुख्य रूप से वे व्यंग्य लिखते हैं और “लट्ठमेव जयते”, “गधे ने जब मुंह खोला”, “झूठ के होलसेलर”, “खड़ा खाट फिर भी ठाठ”, “ये जो पायजामे में हूं मैं”, “साढ़े तीन आखर अप्रोच के”, “मेवामय ये देश हमारा”, “फेसबुक पर होरी”,  “पुलिस नाके पर भगवान”, “वफादारी का हलफ़नामा” और “नमस्कार को पुरस्कार” उनके प्रकाशित व्यंग्य संग्रह हैं। उनकी रचनाएं विगत 30 वर्षों से देश के प्रतिष्ठित अखबारों, पत्रिकाओं और वेब-पोर्टल्स में निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। संपर्कः- गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212 (हिमाचल प्रदेश) मोबाइल नम्बर : 9418070089, ई-मेल : [email protected]