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हमेशा की तरह दोस्त से मुलाकात हुई। ऑफिस एक ही है, इसलिए रोज मिलते हैं। ऐसी मुलाकात एक आदत-सी हो गई है। कभी मिल नहीं पाए तो दिन अधूरा लगता है। ऑफिस की कैंटीन में, एक कोने में, आसपास के कोलाहल, रोजमर्रा के चेहरों को भुला कर किसी नए विषय पर बात करना रिफ्रेशिंग लगता है। किताबों में, सिनेमा में उसकी खास रुचि है। इन दोनों विषयों के संबंध में, दुनिया भर में जो भी नया घट रहा है, उसकी जानकारी उसे रहती है। सबसे अहम बात यह है कि, इन सब के बारे में बात करने का उत्साह भी उसके पास है। उसे बोलना अच्छा लगता है, और मुझे सुनना। हमारी ये मुलाकातें दिलचस्प होती हैं।

लेकिन परसों जब हम मिले तो बात कुछ अलग ही थी। वह चुप्पी साधे हुए था। अस्वस्थ और बेचैन दिख रहा था। मैंने कुछ पूछने की, बोलने की कोशिश की, लेकिन किसी भी बातचीत को जारी रखने के मामले में अपनी मर्यादाओं का मुझे अहसास है। सो मेरे न चाहने पर भी कुछ क्षणों का एक दीर्घ विराम आया। जो उसे असहनीय लगा।

‘गॉड… गिव मी अ ब्रेक… छुटकारा चाहिए मुझे… आय वांट टु बी अलोन…’

‘क्यों? क्या बात है?’

‘खुद के लिए समय ही नहीं बचता आजकल, पूरा समय बच्चे के पीछे लगे रहना पड़ता है। अपने यहाँ घर-गृहस्थी बसाना बडा डिमांडिंग काम है। वेस्टर्न कंट्रीज में, वन कॅन बी अ हाऊसहोल्डर एंड स्टिल रिटेन वन’स इंडिविजुआलिटी… अपने यहाँ शादी हो जाए तो दो पैरों की रेस और बच्चा हो जाए तो तीन पैरोंवाली रेस शुरू हो जाती है…’

मुझे उसकी बातों का आशय समझ में आ गया। अभी तो घर-गृहस्थी की असली शुरुआत हुई थी और बंदा परेशान हो गया था।

‘कुछ ही दिनों की बात है, धीरे-धीरे सब एड्जस्टमेंट हो जाती है। बाप बनना हो तो इन अनुभवों से गुजरना ही पड़ता है। हमारे माँ-बाप ने हमें पाल-पोस कर बड़ा किया तब उन्हें भी ये सब झेलना पडा होगा…’

उसे और थोड़ा उकसाने के लिए मैंने कहा।

‘बस… अब हमें निकलना चाहिए…’

वह उठ खड़ा हुआ। हम कैंटीन से बाहर निकले। उसकी छटपटाहट मैं समझ रहा था।

*

उसका पढ़ना, फिल्में देखना, लोगों से मिलना, और सबसे अहम बात यानी अपनी मर्जी का मालिक होना, इस सब पर अचानक कुछ बंधन आ गए थे और, अब बाकी जिंदगी इन जिम्मेदारियों को निभाने में कट जाएगी, अपने लिए समय ही नहीं बचेगा, किताबें, फिल्में, दोस्त – सबसे संपर्क टूटता जाएगा… इस कल्पना से ही वह बेचैन हो गया था।

कुछ ही दिनों में उसे जो चाहिए था वह मौका मिला। दस दिन ही सही, वह अकेला रहनेवाला था। उन दस दिनों में पढ़ने के लिए दो मोटी ऑटोबायोग्राफीज, अकेले में, शांति से सुनने के लिए कुछ सीडीज, ऐसा सब इंतजाम भी उसने कर लिया था। ऑफिस से भी छुट्टी ले रखी थी।

हमारी नियमित मुलाकातें बंद थीं।

एक दिन, उसने खास तौर पर मुझे फोन करके घर बुला लिया। मैं उसके घर गया। किताबों के, सीडीज के बारे में सुनने की तैयारी से मैं गया था, लेकिन वैसा कुछ भी नहीं हुआ। थोडी देर इधर-उधर की बातें हुईं और फिर वह बेडरूम में जा कर एक बड़ा-सा फोटो अल्बम ले आया। उसके बच्चे के फोटो। किसी का निजी फोटो अल्बम देखने में मुझे संकोच होता है। अत्यधिक आग्रह हुआ तो सरसरी नजर डाल कर मैं अल्बम लौटा देता हूँ, लेकिन वैसा संभव नहीं हो सका। हर एक फोटो दिखा कर उसके डीटेल्स भी बताए जा रहे थे। जैसे ही अल्बम पूरा हुआ, मैंने किताबें उठाईं और निकलने के लिए उठ खड़ा हुआ।

– ‘मैंने खास फोन कर के तुम्हें बुला लिया और फोटो अल्बम दिखाता रहा, सच कहूँ तो मुझे अकेलापन बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मै अकेला नहीं हूँ – खास मेरा अपना कोई है, ये बात किसी को विस्तार से बता कर मै खुद को आश्वस्त करना चाहता था। पहले तीन-चार दिन खूब पढ़ा, लेकिन बाद में अचानक मन उचट गया। पिछले दो दिन तो मैंने यहाँ – इस कुर्सी में बैठ कर निकाले – जिस सन्नाटे को मैं हमेशा चाहता था अब उसी ने जैसे मुझे घेर लिया था। कुर्सी से उठने में भी डर लगने लगा…’

अकेलेपन और एकांत में रहने का शौक पूरा हुआ दिख रहा था।

3

वह बदल रहा था। लेकिन पूरी तरह नहीं, कुछ दिनों बाद फिर से अकेलेपन की तलब आएगी मैं जानता था। तब उसे बताने के लिए मैंने एक छोटी-सी घटना चुन रखी है।

मैं एक दुकान के सामने फुटपाथ पर खडा सिगरेट पी रहा था। अचानक एक फैमिली, स्कूटर से आ कर रुकी। बच्चे को बाप के साथ दुकान में जाना था, बाप मना कर रहा था, माँ रोकने की कोशिश कर रही थी। बच्चा जिद कर रहा था, रो रहा था। उनसे थोड़ी दूर एक महिला खड़ी थी। वह ये सब देख रही थी। उस से रहा नहीं गया, वह उनके पास आई और बोली –

‘बच्चा है, दुकान में जाने की जिद कर रहा है, ले जाइए उसे – बड़ा हो जाएगा तब आप मिन्नतें करोगे फिर भी आप के साथ नहीं आएगा – मेरे दो बच्चे हैं, मुझसे दूर रहते हैं, जब वे छोटे थे – मेरे पास उनके लिए समय नहीं था, अब उनके पास मेरे लिए समय नहीं है – ‘

बस इतना बोल कर वह महिला चली गई। उसकी बात रखने के लिए या हो सकता है, बात का मतलब समझ कर – बाप बच्चे को साथ ले गया।

कोई भी – जिसमें मैं भी शामिल हूँ, लोगों से दूर जाने की बात करने लगे तो मुझे वह घटना याद आती है और मैं आसपास की भीड़ में खो जाने की कोशिश करता हूँ।

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