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संत समाज में महामंडलेश्वर की पदवी चाहे जितने भी प्रतिष्ठित क्यों न हो लेकिन गहरे विवादों के कारण इसकी गरिमा और विश्वसनीयता दिन-ब-दिन धूमिल हो रही है। 

हाल ही में हैदराबाद में एक मंदिर के पुजारी ने एक दलित युवक को अपने कंधों पर बिठाया, और श्री रंगनाथ मंदिर के भीतर लेकर गए। कहा गया कि ऐसा करने से हालिया दिनों में दलितों के साथ हुए भेदभाव और उनके खिलाफ हुईं हिंसात्मक घटनाओं के विरुद्ध देशभर में मजबूत संदेश जाएगा। यह भी कहा गया कि दलित को कंधे पर बैठाकर मंदिर में प्रवेश करवाना एक पुरानी परम्परा है।

(दलित समुदाय से संन्यास लेकर संत बने कन्हैया प्रभु नंद गिरी)

ब्राह्मणों में उमड़े दलित प्रेम की नई बानगी के रूप में अब ये ख़बर आ रही है कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने दलित को महामंडलेश्वर बनाने का फैसला लिया है। दलित समुदाय से संन्यास लेकर संत बने कन्हैया प्रभु नंद गिरी को 2019 में होने वाले कुंभ के दौरान महामंडलेश्वर बनाया जाएगा। कबीर ने शायद इसलिए कहा था कि जाति न पूछो साधू की क्यूंकि संत की कोई जाति नहीं होती, उनका मोल सिर्फ उनके ज्ञान से ही किया जा सकता है, लेकिन कन्हैया प्रभु को विशेष रूप से महामंडलेश्वर बनाने के लिए दलित समाज से आने की वजह से चुना जाना यह साबित करता है कि चाहे कोई संत बन जाए या धर्म बदल ले, जाति उसका पीछा नही छोडती है।

इससे पहले भी यह देखने को मिला है कि कुछ व्यक्तियों को महामंडलेश्वर की उपाधि दिए जाने पर भारी बवाल हुआ है। 2015 में इलाहाबाद में बियर बार और डिस्को थिक के मालिक बिल्डर सचिन दत्ता को महामंडलेश्वर की पदवी दी गई थी। बालाजी कंस्ट्रक्शंस के नाम से रियल एस्टेट कारोबार चलाने वाले नोएडा के बिल्डर सचिन दत्ता का नोएडा के सेक्टर 18 में बीयर बार और डिस्को थिक चलाते थे।

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ये ख़बर अचानक ही आई थी कि सचिन दत्ता अब महामंडलेश्वर सच्चिदानंद गिरि बन गए हैं और इलाहाबाद में पूरे ताम-झाम और रीति-रिवाज के साथ उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी से नवाजा गया है। निरंजनी अखाड़े के सचिव और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि ने खुद सच्चिदानंद का पट्टाभिषेक किया था। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव भी मौजूद थे और उन्होंने बाकायदा अपने सरकारी हेलीकॉप्टर से कार्यक्रम के दौरान फूलों की बारिश भी करवाई थी।

आपको याद होगा कि उस समय सचिन दत्ता के कारोबारों की खबर आते ही अखाड़ा परिषद बचाव की मुद्रा में आ गया था। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि ने कहा था कि सच्चिदानंद गिरि के बारे में पूरी पड़ताल की जाएगी और आरोप सही पाए गए तो उनकी पदवी वापस ले ली जाएगी। सवाल उठने लगे कि आखिर महामंडलेश्वर की पदवी मिलने से सचिन को क्या लाभ होगा क्योंकि संत समाज में महामंडलेश्वर का पद बहुत ऊंचा और सम्मानित माना जाता है। कुंभ में होने वाले शाही स्नान में महामंडलेश्वर रथ पर सवार होकर निकलते हैं। कुंभ में महामंडलेश्वर के लिए अलग शिविर की व्यवस्था होती है। इनकी सुरक्षा के भी खास इंतजाम किए जाते हैं। यह सवाल पूछे जाने लगे थे कि आखिर एक करोडपति सचिन दत्ता उर्फ सच्चिदानंद गिरि को किन नियमों के तहत अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाया गया है? यह भी कयास लगाये जाने लगे थे कि सचिन पर करोड़ों रुपये का कर्ज है और इन्हीं से बचने के लिए सचिन धर्म का गलत इस्तेमाल कर रहा है। बहरहाल, एक करोडपति कारोबारी का बियर बार से महामंडलेश्वर तक का सफ़र विवादों से भरपूर घिरा रहा था।

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इसी तरह आप भूल नहीं पाए होंगें कि रातों रात प्रसिद्धी और ऎश्वर्य पाने वाली राधे मां को जूना अखाड़े द्वारा महामंडलेश्वर की उपाधि देना किस तरह विवादों में घिरा रहा था। मीडिया ने उनके लाल शोर्ट स्कर्ट पहन कर मादकता से नाचते गाते वीडियो को बार-बार दिखाकर खूब टीआरपी बंटोरा था। महामंडलेश्वर बनते ही मीडिया ने उनके छोटे कपडे में अनेक तस्वीरों और वीडियो का प्रसारण करना शुरू कर दिया था, जिसमें सोफे पर लेटी हुई उनकी एक तस्वीर जिसे लगभग आधा सेंसर या ब्लर करके दिखाया जाता था, खासी सुर्खियाँ बंटोर रही थी। बाद में उन पर लगे आरोप सही पाए जाने पर अखाड़े ने उनसे महामंडलेश्वर की उपाधि वापिस भी ले ली थी।

विवादित संतों को पदवी दिए जाने का सिलसिला यहीं नहीं थम गया। जूना अखाड़े की तरफ से राधे मां को महामंडलेश्वर बनाए जाने को लेकर विवाद चल ही रहा था कि पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी की ओर से विवादित संत नित्यानंद स्वामी को महामंडलेश्वर बना दिया गया। नित्यानंद स्वामी सेक्स स्कैंडल में पकड़े जा चुके थे। जिस समय नित्यानंद ध्यानपीठम के पीठाधीश्वर नित्यानंद स्वामी को महामंडलेश्वर बनाया गया, उस समय उन पर गंभीर चारित्रिक आरोप लगे हुए थे। उनका मामला अदालत में विचाराधीन था। निरंजनी अखाड़ा के सचिव श्रीमहंत नरेंद्र गिरि ने उस समय कहा था कि किसी संत को महामंडलेश्वर बनाना अखाड़े का अधिकार है लेकिन इस पद की गरिमा और मर्यादा होती है, जिस पर रमता पंचों को विचार करना चाहिए, लेकिन इस बारे में पारदर्शिता नहीं बरती गई। उन्होंने साफ कहा कि नित्यानंद स्वामी इस पद के योग्य नहीं है।

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संत समाज में महामंडलेश्वर की पदवी चाहे जितने भी प्रतिष्ठित क्यों न हो लेकिन इन गहरे विवादों के कारण इसकी गरिमा और विश्वसनीयता दिन-ब-दिन धूमिल होती रही है। ताजा मामले को देखें तो अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का दलित को महामंडलेश्वर बनाने का फैसला भी किसी बड़े हिंदुत्व के एजेंडे को और गहरा रंग देने की कवायद से ज्यादा और कुछ नहीं दिखता है।

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समानता का अधिकार और लोकतंत्र में गहरी आस्था रखने वाले सुशील एक निर्भीक पत्रकार होने के साथ-साथ प्रगतिशील युवा कवि और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं एवं साहित्यिक ई–पोर्टल्स में उनकी कविताएँ, आलेख और लघुकथाएँ प्रकाशित हो चुकी है। ग्रास-रूट जर्नलिज्म (ज़मीनी पत्रकारिता) उनके काम की विशेषता है। लेखन के साथ–साथ सामाजिक–सांस्कृतिक क्षेत्र में भी वे बेहद सक्रिय हैं। उन्होंने लम्बे समय तक एच.आई.वी./एड्स जागरूकताकेलिए उच्य जोखिम समूह के साथ काम किया है। सुशील हिंद वॉच मीडिया समूह के संपादक हैं। हिंद वॉच मीडिया समूह जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है। भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है।