प्रधानमंत्री की पत्नी सहित लगभग 24 लाख महिलाएं बिना तलाक़ के पति से अलग रहने को हैं मजबूर

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देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवायी वाली सरकार मुस्लिम महिलाओं और तीन तलाक के सवाल पर बेहद चिंतित जान पड़ती है। प्रधानमंत्री और पूरी सरकार इस सवाल को ऐसे पेश कर रही है कि मानों देश में तीन तलाक ही भारतीय महिलाओं की सारी समस्याओं की जड़ है। परंतु यदि हम जनगणना के आंकड़ों के हवाले से देश में महिलाओं की स्थिति पर नजर डालें तो आंकंड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। आकंड़े बताते हैं कि तीन तलाक तो छोड़िये ऐसे दस तलाकों से भी अधिक दर्दनाक स्थिति उन महिलाओं की है जिन्हें पुरूषों ने बिना कोई कारण बतायें और बगैर किसी कारण के ही छोड़ दिया है। 2011 की जनगणना के मुताबिक लगभग 24 लाख महिलाएं ऐसी हैं, जिन्हें बिना तलाक के ही छोड़ दिया गया है। इनमें सबसे ज्यादा संख्या हिंदू महिलाओं की है। देश में करीब 20 लाख ऐसी हिंदू महिलाएं हैं, जिन्हें परिवार और समाज से अलग कर दिया गया है और बिना तलाक के ही छोड़ दिया गया है। वहीं, मुस्लिमों में ये संख्या 2 लाख 8 हजार, ईसाइयों में 90 हजार और दूसरे अन्य धर्मों की 80 हजार महिलाएं हैं। ये महिलाएं बिना पति के रहने को मजबूर हैं।

दर्दनाक हैं ये आंकड़े : 

अगर बिना तलाक के अलग कर दी गईं और छोड़ी गई औरतों की संख्या का औसत देखें, तो हिंदुओं में 0.69 फीसदी, ईसाई में 1.19 फीसदी, 0.67 मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यों (जैन, सिख, पारसी, बौद्ध) में 0.68 फीसदी है। इस तरह से देखा जाए तो मुस्लिमों में बिना तलाक के छोड़ी गई महिलाएं दूसरे धर्म की तुलना में कम है।

भारत में तलाकशुदा औरतों की संख्या भी दस लाख के करीब है, जिन्हें सामाजिक और सरकारी मदद की जरूरत है। इतना ही नहीं, अलग की गई और छोड़ी गई महिलाओं का मुद्दा भी तीन तलाक के मुद्दे से कहीं ज्यादा गंभीर है।

पिछली जनगणना के मुताबिक भारत में करीब 24 लाख पति से अलग की गई परित्यक्ता औरतें हैं, जो कि तलाकशुदा औरतों की संख्या के दोगुने से ज्यादा है। 20 लाख ऐसी हिंदू महिलाएं हैं, जिन्हें अलग कर दिया गया है या छोड़ दिया गया है। मुस्लिमों के लिए यह संख्या 2.8 लाख, ईसाइयों के लिए 90 हजार, और दूसरे धर्मों के लिए 80 हजार है। ससुराल वाले उनके पक्ष में इसलिए नहीं आते, क्योंकि उनके बेटे ने उसे छोड़ दिया है और मायके में उनकी अनदेखी इसलिए होती है क्योंकि परंपरागत तौर पर उन्हें पराया धन समझा जाता है, जिसकी जिम्मेदारी किसी और की है।

वे फिर से शादी या परिवार शुरू नहीं कर सकतीं क्योंकि उन्हें कानूनी तरीके से तलाक नहीं दिया गया है। इनमें से ज्यादातर सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद कठिन परिस्थितियों में अपना जीवन गुजार रही हैं। साथ ही उनका दूसरों द्वारा शोषण का खतरा भी बना रहता है। वे अपने पति के साथ रहना चाहती हैं, बस उनके बुलाने भर का इंतजार कर रही हैं।

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ऐसा ही एक उदाहरण प्रधानमंत्री की पत्नी जसोदाबेन का भी है। 43 वर्षों से अपने पति के साथ नहीं रह रहीं जशोदाबेन मोदी ने 24 नवंबर, 2014 को कहा था कि अगर वे एक बार भी मुझे बुलाएं तो मैं उनके साथ चली जाऊंगी लेकिन उनके पति ने कभी जवाब नहीं दिया। 2015 में जशोदाबेन ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था, लेकिन उनका आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि ‘उनके पास न तो शादी का कोई प्रमाण-पत्र था न ही पति के साथ कोई साझा हलफनामा ही था’। उन्होंने इसके लिए काफी संघर्ष किया। आखिरकार उन्हें अपने पति के पासपोर्ट के ब्यौरे के लिए एक आरटीआई लगानी पड़ी। जो भी लोग तीन तलाक का भुलावा देकर मुस्लिम महिलाओं की हालत सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें देश की करीब 24 लाख छोड़ दी गई औरतों की तकलीफों की भी जानकारी होनी चाहिए। इसके अलावा देश की 4.3 करोड़ विधवा महिलाओं की भी चिंता करनी चाहिए। उन्हें पुनर्विवाह करने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए या उनका जीवन चलाने के लिए कार्यक्रमबद्ध वित्तीय मदद मुहैया कराने की ओर ध्यान देना चाहिए।

हिंदू महिलाओं के सशक्तिकरण का घोर विरोधी रहा है आरएसएस :

वास्तव में भारतीय हिंदू समाज में इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं की दुर्दशा का कारण सामाजिक और सांस्कृति अधिक है। यदि हम पौराणिक हिंदू ग्रंथों को देखें तो उसमें आपको कोई तलाक जैसा प्रावधान कहीं नही मिलेगा। इसका कारण सामाजिक और सांस्कृतिक है। असल में पूरी दुनिया के अधिकतर धर्म जहां विवाह को एक सामाजिक समझौता मानते हैं तो वहीं भारतीय हिंदू समाज के लिए स्त्री और पुरूष का वैवाहिक संबंध जन्म जन्मांतर का होता है और इसका निर्णय समाज नही बल्कि उपर परलोक में ही होता है। अब जिस संबंध का निर्धारण परलोक में होता है तो जाहिर है कि उसे धरती पर तो किसी कानून से बदला नही जा सकता है। यही कारण है कि हिंदू संस्कृति की ठेकेदारी करने वाले संगठन आरएसएस ने भारत का संविधान तैयार होने के समय हिंदू कोड़ बिल और उसमें महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए किये गये प्रावधानों का डटकर विरोध किया था। हिंदू कोड बिल में तलाक का प्रावधान था तो वहीं महिलाओं को पैतृक संपति में अधिकार हासिल था। इसके अलावा देश में पहली बार बहुविवाह की प्रथा पर रोक और उसे गैर कानूनी बनाने का प्रावधान भी डाॅ. अबेंडकर ने किया था। जिसका आरएसएस और उसके संगठनों ने डटकर विरोध किया था। आरएसएस और उससे जुड़े हुए संगठन हिंदू कोड बिल के विरोध में सड़कों पर उतरे और हिंदू कोड बिल को संविधान के साथ लागू नही होने दिया गया।

हिंदू कोड बिल के प्रावधानों बहुविवाह पर रोक और महिलाओं को तलाक, संपति में अधिकार के खिलाफ मार्च 1948 में एक एंटी हिंदू कोड बिल कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी का मानना था कि किसी को भी हिंदू समाज के पसर्नल मामलों में दखल करने का अधिकार नही है। आज जो तर्क मुस्लिम पसर्नल लाॅ बोर्ड दे रहा है एंटी हिंदू कोड बिल के तर्क उससे कई गुणा आगे और हास्यास्पद थे। अपनी मर्जी से शादी करने और तलाक के अधिकार और पैतृक संपति में महिला की हिस्सेदारी को हिंदू विरोधी बताया गया। यह लड़ाई केवल तर्कों तक ही नही थी बल्कि आरएसएस ने इसे मैदान में भी साकार किया। जिसके लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में 11 दिंसबर 1949 को एक जनसभा का आयोजन किया गया। आरएसएस के नेताओं ने एक के बाद एक अपने भाषणों में हिंदू कोड बिल का विरोध किया। संघ और उसके सहयोगी नेताओं ने मनु और याज्ञवलक्य के बनाये गये विधान को अक्षुण्ण और अपर्रिवतर्नीय बताया और उसे बचाने के लिए देश में सैंकड़ों जनसभाओं का आयोजन किया गया। पूरे देश में घूम घूमकर संघ और उसके संगठनों ने हिंदू कोड़ बिल में महिलाओं को सशक्त करने वाले प्रावधानों को चुनौती दी।

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संघ टोले का यह अभियान केवल मैदानी अभियान यह संघी नेताओं तक सीमित नही था। भाजपा के आदर्श नेता और भाजपा और संघ के एक प्रेरणा स्रोत श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस लड़ाई के एक अहम हिस्सा थे और ना केवल श्यामा प्रसाद मुखर्जी बल्कि आज के उनके जीवित आदर्श अटल बिहारी वाजपेयी भी इस महिला सशक्तिकरण विरोधी लड़ाई में पीछे नही थे। 1949 के उस दौर में अटल बिहारी वाजपेयी संघ से जुड़े हुए अखबार पांचजन्य के संपादक थे और यदि आप दिसंबर 1949 के उनके अखबार में छपे आलेखों के शीर्षकों को पढ़े तो हिंदू महिला सशक्तिकरण विरोध में अटल की भूमिका और उनके मानस को समझ सकते हैं। उनके अखबार के आलेखों के शीर्षक काफी रोचक थे जिसमें वो कहते हैं कि यह कोड बिल दांपत्य संबंधों पर कुठाराघात है, यह वैवाहिक संस्था को तोडने वाला बिल है। 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या के बाद बापू की हत्या पर मिठाई बांटने वाले लोग हिंदू कोड बिल के विरोध में बापू के नाम का इस्तेमाल करने से भी नही चुके। पांचजन्य ने अपने एक अंक में हिंदू कोड बिल विशेषकर तलाक का विरोध करते हुए लिखा था कि बापू ने भी कभी तलाक पर कुछ नही कहा अर्थात वह भी यथास्थिति बनाये रखने के पक्ष में थे। ध्यान रहे बापू की हत्या के बाद संघ पर रोक के साथ ही आर्गेनाइजर के प्रकाशन पर भी रोक लगा दी गई थी। संघ से जुड़े समाचार पत्रों ने अपने विरोध में उन्होंने केवल हिंदू कोड बिल को ही निशाना नही बनाया बल्कि पूरे संविधान को निशाना बनाया और कहा कि डाॅ. अंबेडकर का तैयार किया गया संविधान ‘‘अंग्रेजी बैण्ड़ पर डांस‘‘ जैसा है और नवनिर्मित संविधान और कुछ नही बल्कि ‘‘भानुमति का पिटारा भर है।‘‘ यहां तक इन ब्राहमणवादी ताकतों ने साफ कहा कि हमारे दिलों में मनु बसे हैं और मनुस्मृति हमारा दण्ड़ विधान है। हम मनु और याज्ञवलक्य के होते किसी अंग्रेजी संविधान को नही मान सकते हैं। ध्यान रहे भारतीय संविधान और महिलाओं को मिलने वाले अधिकारों का ऐसा विरोध करने वाले अखबार के संपादक कोई और नहीं बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। इसके अलावा संघ से जुड़े हुए दूसरे समाचार पत्र आर्गेनाइजर ने भी इसी प्रकार से हिंदू कोड़ बिल और संविधान का विरोध किया यहां तक कि तिरंगे को भी खारिज करते हुए अपने अखबार के मुखपृष्ठ पर भगवा झण्ड़े के समर्थन में द्विभाषी आलेख और संपादकीय छापा और शीर्षक दिया हमारा ध्वज (आवर फ्लैग)। इस आलेख में तिरंगे को खारिज करते हुए भगवा तिकोने ध्वज को ही अपना राष्ट्रीय ध्वज बताया था।

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हिंदू महिलाओं के अधिकारों का विरोध करने वाली वही राजनीति और ब्राहमणवादी संस्कृति आज मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के नाम पर जान देने के लिए तैयार है। यहां तक कि देश के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद स्वयं प्रेस को संबोधित करते हुए एक महावीर योद्धा की तरह मुस्लिम महिलाओं के सबसे बड़े पैरोकर सिद्ध करने की होड़ में लगे दिखाई देते हैं और यह भी बताना भूल जाते हैं कि संविधान सभा में उनके पूर्वज और राजनीति गुरू श्यामा प्रसाद मुखर्जी की लाइन हिंदू महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ थी और उनका मातृ संगठन आरएसएस पूरे देश में हिंदू महिलाओं को मिलने वाले अधिकारों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे।

दरअसल संघ और उससे जुड़े हुए सभी संगठन और लोग बुनियादी तौर पर महिला सशक्तिकरण के विरोधी रहे हैं। आज मौका मिलते ही उन्होंने महिला सशक्तिकरण के सवाल को हिंदू-मुसलमान में बांटकर रख दिया है। उनका मुस्लिम महिलाओं के प्रति प्रेम केवल उनकी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति का हिस्सा ही है और कुछ नही। बहुविवाह प्रथा को गैर कानूनी बनाये जाने पर कोहराम मचाने वाला और महिलाओं को तलाक का अधिकार अथवा संपति में अधिकार मिलने पर हिंदू धर्म को और अपने संस्कृति को खतरे में बताने वाला संघ इस सवाल पर राजनीति करके देश में यह संदेश देना चाहता है कि मुस्लिम महिला विरोधी नहीं बल्कि हम महिला अधिकारों के बड़े वकील हैं। जबकि वास्तविकता इसके एकदम विपरीत है। औरतों को सती होने और जौहर को महिमामंड़ित करने वाले लोग कैसे महिला सशक्तिकरण के पैरोकार हो सकते हैं?

(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

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सामाजिक न्याय के प्रखर पैरोकार महेश राठी वरिष्ठ पत्रकार हैं| प्रमुख अखबारों, पत्रिकाओं और वेब-पोर्टल्स में उनके आलेख प्रकाशित होते रहे हैं| दिल्ली से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक अखबार मुक्ति संघर्ष के साथ जुड़े रहते हुए वे स्वतंत्र रूप से राजनैतिक, सम-सामायिक और जन-सरोकार के विषयों पर लिखते हैं| महेश राठी का लेखन निर्भीक और जमीनी पत्रकारिता का बेहतरीन उदाहरण है| जनवाद की पुरजोर पैरवी करते हुए उनकी कलम कभी सत्ता से जा टकराती है, तो कभी छद्म-राष्ट्रवाद को बेनकाब करती है| हिंद वॉच मीडिया के लिए वे नियमित रूप से लिखते रहे हैं|