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उत्तर प्रदेश का कासगंज इन दिनों साम्प्रदायिक हिंसा की चपेट में है। गणतंत्र दिवस के मौके पर कासगंज में हुई सांप्रदायिक हिंसा इतनी लंबी चलेगी, किसी ने कल्पना तक नहीं की थी।

गणतंत्र दिवस के दिन यह हिंसा केवल तिरंगा यात्रा के लिए रास्ता न देने के लिए हुई थी क्योंकि दूसरे पक्ष के लोग तिरंगा फहराने के लिए सड़कों पर कुर्सी लगा रहे थे। लेकिन अब यह हिंसा इतनी व्यापक हो रही है कि पूरा देश तनाव में है।

हिंसा के शुरुआती मामले को लेकर स्थानीय निवासी मोहम्मज मुनाज़ीर रफी ने कहा “वे नारे लगा रहे थे। हमने उनसे आग्रह किया कि पहले हमारा गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम खत्म होने दें लेकिन वे अपनी बात पर अड़े रहे और वहां से नहीं हटे।”

रफी ने कहा “मैंने गणतंत्र दिवस मनाने के लिए 200 रुपए का अपनी तरफ से योगदान दिया था। मैं सुबह घर से कासगंज कोर्ट के लिए निकल गया था जहां पर तिरंगा फहराने का कार्यक्रम आयोजित किया गया था।
जब मैं वापस आया तो हमारे स्थानीय इलाके में लोग गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम के लिए कुर्सी लगा रहे थे। इसी दौरान अचानक 50-60 लोगों का एक ग्रुप बाइक पर वहां पहुंचा और कुर्सी हटाने के लिए कहने लगा।”

कासगंज एडिशनल एसपी पवित्र मोहन त्रिपाठी के अनुसार, पुलिस ने दोनों पक्षों को अलग कराया था। उन्होंने कहा बाइक सवार लोग फिर से एक जगह इकट्ठा हुए और तेहसील रोड के चक्कर लगाने लगे। वहां एक अन्य मुस्लिम बहुल इलाके के लोगों ने सोचा कि वे लोग प्रतिशोध की भावना से वहां चक्कर लगा रहे हैं। यहीं से हिंसा की शुरुआत हुई, जिसमें गोली लगने के कारण 28 साल के एक युवक की जान चली गई।”

इस मामले पर बात करते हुए आईजीपी ध्रुव कांत ठाकुर ने कहा ” जिस समय यह घटना हुई उस वक्त मुस्लिम समुदाय के लोग तिरंगा फहराने ही वाले थे।” बता दें कि इस घटना का एक वीडियो भी सामने आया है जहां पर करीब 60 लोगों का एक ग्रुप हाथ में तिरंगा और भगवा रंग का झंडा लिए चिल्ला रहे थे कि “बाइक तो यहीं से जाएगी।”

इस तरह बात छोटी सी लग रही थी लेकिन अब यह हिंसा राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है। हालांकि बात अब एक और मोड़ पर आकर बढ़ गयी है। 35 वर्षीय अकरम हबीब लखीमपुर खीरी जिले में हार्डवेयर स्टोर चलाते हैं, उन्होंने हिंसा में एक आंख गंवा दी। 22 साल का अभिषेक बी.कॉम फाइनल ईयर का छात्र था, इस हिंसा की भेंट चढ़ गया।

हालांकि पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि अभी इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि अभिषेक हिंसा भड़काने वाली भीड़ का हिस्साथा या नहीं।

अभी पद्मावत के नाम पर देश जल रहा था और अब कासगंज की इस हिंसा ने बता दिया है कि देश में एक छोटी सी चिंगारी कभी भी साम्प्रदायिक हिंसा की बड़ी आग बन सकती है।

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