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त्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के जलालपुर स्थित कोल्ड स्टोरेज के मालिक ने पिछले दिनों अपने गोदाम में एक साल से भरा आलू निकाल कर सड़क पर फेंक दिया। लोगों ने लूटा, जानवरों ने खाया फिर भी चारों ओर आलू सड़ता रहा। ऐसे में सड़क पर पड़े तकरीबन 20 लाख का 20 हजार बोरी आलू का हमारी कृषि नीति पर सवाल उठाना लाजिमी है। सच तो यह है कि 50 किलो की एक बोरी कोल्ड स्टोरेज में रखने का किराया 90 रुपए होता है और आज इतनी कीमत तो नए आलू की ही नहीं मिल रही। ऐसे में किसान को अपने श्रम को बिसरा देने की मजबूरी ही है। बीते एक साल के दौरान जिन किसानों ने दाम बढ़ने की उम्मीद में अपना माल कोल्ड स्टोरेज में रखा था। लेकिन किसानों को कोल्ड स्टोरेज से माल ढोने व किराया चुकाने में जितना पैसा लग रहा था उतना तो उन्हें माल बेच कर भी नहीं मिलता। इस कारण उन्होंने अपना माल कोल्ड स्टोरेज में लावारिस छोड़ दिया। पूर्वाचंल के अकेले एक जिले गाजीपुर  के कोल्ड स्टोरेज में लगभग 13 मीट्रिक टन आलू पड़ा है। बीते एक साल के दौरान इसका आठ फीसदी भी नहीं बिका। इस तरह उनकी एक साल की लागत, मेहनत सब कुछ बेकार गई।

किसान 50-55 किलोग्राम आलू का एक बोरा बनाता है। इसको कोल्ड स्टोरेज में रखने का  किराया 90 से 110 रुपया तक होता है। खाली बोरी 17 या 18 रुपये में मिलती है। सुतली, पल्लेदारी, ट्रैक्टर का किराया आदि मिलाकर 25 रुपये और खर्च होते हैं। इस तरह लागत तो प्रति बोरा 132-153 रुपयों की, लेकिन अभी व्यापारी आलू 80-90 रुपये में एक बोरा खरीद रहे हैं। इससे कोल्ड स्टोरेज का किराया तक नहीं निकल रहा है। उधर किराये की बची रकम और बोरी के दाम के साथ मालिकों से लिया गया लोन किसानों पर चढ़ा हुआ है। अब यह कोल्ड स्टोरेज मालिक किसानों के लोन के खाते में डालकर अगले वर्ष वसूलेंगे। आलू की आर्थिकी किसान को घाटे में डालने के साथ कर्ज को बढ़ाने वाली बन चुकी है।

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सच तो यह है कि पूरे उत्तर प्रदेश का आलू किसान अपने खेत में जानदार फसल देख कर ही तनाव में है। राज्य के कोल्ड स्टोरेज में पहले से ही 90 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा आलू भरा है। बाहरी राज्यों से मांग न होने से निकासी हो नहीं रही है। उधर अगस्त महीने में कर्नाटक में आलू की फसल आने से दक्षिणी राज्यों के निर्यात का रास्ता बंद हो गया। स्थानीय बाजार में आलू के दाम अधिकतम 100 रुपए क्विंटल भी नहीं हैं। इससे किसान की लागत भी नहीं निकल रही। हालात यही रहे तो इस बार कोल्ड स्टोरेज में आलू सड़ेगा। वैसे भी सरकारी समर्थन मूल्य 487 रुपये प्रति क्विंटल की दर से तो कोल्ड स्टोरेज किराया व रखरखाव आदि की पूर्ति भी बामुश्किल हो पाती है।

पंजाब के हालात भी अलग नहीं है। वहां इस साल आलू की पैदावार में 10-15 प्रतिशत की गिरावट आई है। वहां के किसानों को पिछले साल भी लागत का पैसा भी नहीं मिला था। भारत के कुल आलू उत्पादन में पंजाब का योगदान 5 प्रतिशत रहता है। यहाँ के जालंधर, कपूरथला, एसबीएस नगर तथा होशियारपुर जिले प्रमुख उत्पादन केंद्र हैं। वैसे पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश आलू के बड़े उत्पादक हैं लेकिन वे बीज पंजाब से खरीदते हैं।

सनद रहे कि इस साल जुलाई में जब मध्य प्रदेश का किसान प्याज के दाम को ले कर आंदोलन कर रहा था तभी सरकार को चेताया गया था कि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश के आलू किसान भी मध्य प्रदेश की तरह बंपर फसल का स्यापा करने वाले हैं। इसके बावजूद सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की। दुखद है कि हुक्मरान संकट होने तथा बवाल मचने का इंतजार करते हैं और बाद उसके मुआवजा बांटने का सियासती चाल चलते हैं।

सलद रहे कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी को समर्पित तकरीबन  64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है। लेकिन दुखद यह है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरंदाज किया जाता रहा है। पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया। फसल बीमा की कई योजनाएं तो बनीं, उनका प्रचार भी हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा – कभी नकली दवा या खाद के फेर में, तो कभी मौसम के हाथों। किसान जब ‘‘कैश क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है।

हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक के कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मशहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फेंक कर अपनी हताशा का प्रदर्शन करते हैं। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर किसान के चेहरे पर आयी चमक पल भर के लिए ही होती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है। घर का नया छप्पर, बहन की शादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा जैसे न जाने कितने ही सपने सड़क पर मिर्चियों के साथ बिखर जाते हैं। और सवार हो जाती है चिंता कि मिर्ची की खेती के लिए बीज, खाद के लिए गए कर्ज को कैसे उतारा जाएगा ? विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।

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देश के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूंगफली तो कभी गोभी किसानों को ऐसे ही हताश करती है। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है तभी वहां से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किए रहते हैं। दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आए साल आलू की टनों फसल बगैर उखाड़े मवेशियों को चरा देने की घटनाएं सुनाई देती हैं। लेकिन गाजियाबाद, नोएडा, या दिल्ली में आलू के दाम पहले की ही तरह तने दिखते हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, और उत्तर प्रदेश के दर्जनों जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनाएं हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती है। जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है तो तब शुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर बहुत कम दाम देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काट कर खरीदी केंद्र तक ढो कर ले जाना, फिर घूस दे कर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिए दो-तीन साल चक्कर लगाना – यह तमाम किसान को घाटे का सौदा दिखता है।

कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृषि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे गौण दिखते हैं। सब्जी, फल और दूसरी कैश-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुष्परिणाम दाल, तेल-बीजों (तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फसल और कितनी उगाई जाए और पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन हो – इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें।

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आज आलू किसानों को कर्ज से दबने से बचाने के लिए सरकारी संस्थाओं को पहले वेयर हाउस में रखा माल न्यूनतम मूल्य पर खरीद कर उसे राशन की दुकानों या मिड-डे-मील या इन दिनों समुद्री तूफान से अस्त-व्यस्त दक्षिणी राज्यों में बतौर राहत भेजने जैसी योजनाओं में तत्काल खपाने पर विचार करना चाहिए। नष्ट होती फसल केवल पैसे का अपव्यय ही नहीं है वरन श्रम, प्रकृति और देश के हर दिन भूखे सो रहे लाखों लोगों का अपमान भी है।

गंभीर ख़बर से साभार 

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