(फाइल फोटो)
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नागपुर : पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी ने कहा कि देश के प्रति निष्ठा रखना ही देशभक्ति है। विविधता हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, सहिष्णुता हमारी सबसे बड़ी पहचान है। विचारों में समानता के लिए संवाद जरूरी है। सबने कहा है कि हिन्दू एक उदार धर्म है। राष्ट्रवाद किसी धर्म, जाति से नहीं बंधा। भारतीय राष्ट्रवाद में एक वैश्विक भावना है। डॉ. मुखर्जी गुरुवार को यहां रेशमबाग स्थित डॉ. केबी हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर में चल रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 25 दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग ओटीसी-तृतीय वर्ष के समापन समारोह को बतौर मुख्य वक्ता संबोधित कर रहे थे। मंच पर उनके साथ सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत व अन्य पदाधिकारी मौजूद थे।

पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘मैं आज यहां देश, राष्ट्रवाद व राष्ट्रीयता की अवधारणा के बारे में अपनी बात साझा करने आया हूं। इन तीनों को आपस में अलग-अलग रूप में देखना मुश्किल है। देश यानी एक बड़ा समूह जो एक क्षेत्र में समान भाषाओं व संस्कृति को साझा करता है। राष्ट्रीयता देश के प्रति समर्पण और आदर का नाम है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘भारत खुला समाज है। हमने संस्कृति, आस्था, आविष्कारों और महान व्यक्तियों की विचारधारा को साझा किया है। बौद्ध धर्म पर हिंदुओं का प्रभाव रहा है। यह भारत, मध्य एशिया, चीन तक फैला।

मैगस्थनीज आए, ह्वेनसांग भारत आए। इनके जैसे यात्रियों ने भारत को प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था, सुनियोजित बुनियादी ढांचे और व्यवस्थित शहरों वाला देश बताया। हम सभी को परिवार के रूप में देखते हैं। हमारी राष्ट्रीय पहचान जुड़ाव से उपजी है। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में महाजनपदों के नायक चंद्रगुप्त मौर्य थे। मौर्य के बाद भारत छोटे-छोटे रियासतों में बंट गया। 550 ईसवी तक गुप्तों का शासन खत्म हाे गया। कई सौ सालों बाद दिल्ली में मुस्लिम शासक आए। बाद में इस देश पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1757 में प्लासी की लड़ाई जीतकर राज किया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्रशासन का संघीय ढांचा बनाया। 1774 में गवर्नर जनरल का शासन आया। 2500 साल तक बदलती रही। राजनीतिक स्थितियों के बाद भी मूल भाव बरकरार रखा। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि कोई नहीं जानता कि दुनियाभर से भारत में कहां-कहां से लोग आए और यहां आकर भारत नाम की व्यक्तिगत आत्मा में तब्दील हो गए।’’

डॉ. मुखर्जी ने कहा, ‘‘वर्ष 1895 में कांग्रेस के सुरेंद्रनाथ बैनर्जी ने अपने भाषण में राष्ट्रवाद का जिक्र किया था। महान देशभक्त बालगंगाधर तिलक ने कहा था कि स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा। हमारी राष्ट्रीयता को रूढ़वादिता, धर्म, क्षेत्र, घृणा व असहिष्णुता के तौर पर परिभाषित करने का किसी भी तरह का प्रयास हमारी पहचान को धुंधला कर देगा। हम सहनशीलता, सम्मान और अनेकता से अपनी शक्ति प्राप्त करते हैं और अपनी विविधता का उत्सव मनाते हैं। हमारे लिए लोकतंत्र उपहार नहीं, बल्कि एक पवित्र कार्य है। राष्ट्रवाद किसी धर्म, जाति से नहीं बंधा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘50 साल के अपने सार्वजनिक जीवन के कुछ सार आपके साथ साझा करना चाहता हूं। देश के मूल विचार में बहुसंख्यकवाद और सहिष्णुता है। ये हमारी समग्र संस्कृति है जो कहती है कि एक भाषा, एक संस्कृति नहीं, बल्कि भारत विविधता में है। 1.3 अरब लोग 122 भाषाएं और 1600 बोलियां बोलते हैं। सात मुख्य धर्म हैं, लेकिन तथ्य, संविधान व पहचान एक ही है- भारतीय। मेरा मानना है कि लोकतंत्र में देश के सभी मुद्दों पर सार्वजनिक संवाद होना चाहिए। विभाजनकारी विचारों की हमें पहचान करनी होगी। हम सहमत हो सकते हैं, नहीं भी हो सकते। लेकिन हम विचारों की विविधता और बहुलता को नहीं नकार सकते।’’

 ‘‘हमने अर्थव्यवस्था की बारीक चीजों और विकास दर के लिए अच्छा काम किया है। लेकिन हमने हैप्पिनेस इंडेक्स में अच्छा काम नहीं किया है। हम 133वें नंबर पर हैं। संसद में जब हम जाते हैं तो गेट नंबर-6 की लिफ्ट के बाहर लिखा है- जनता की खुशी में उसके राजा की खुशी है। कौटिल्य ने लोकतंत्र की अवधारणा से काफी साल पहले जनता की खुशी के बारे में कहा था।महात्मा गांधी ने कहा था कि हमारा राष्ट्रवाद आक्रामक व ध्वंसात्मक नहीं है। डिस्कवरी ऑफ इंडिया में पंडित नेहरू ने राष्ट्रवाद के बारे में लिखा था- मैं पूरी तरह मानता हूं कि भारत का राष्ट्रवाद हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और दूसरे धर्मों के आदर्श मिश्रण में है।” डॉ. मुखर्जी ने कार्यक्रम स्थल पर डॉ. हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक एमएस गोलवलकर को श्रद्धांजलि अर्पित की।

डॉ. भागवत ने कहा- हमारे लिए कोई पराया नहीं

कार्यक्रम के प्रारंभ में डॉ. भागवत ने कहा कि संघ सर्वसमाज के लिए है। हम सर्वसमाज को संगठित करना चाहते हैं। हमारे लिए कोई पराया नहीं है। यहां पक्ष-विपक्ष की चर्चा का भी कोई अर्थ नहीं है। डॉ. मुखर्जी आदरणीय व्यक्ति हैं। उनके यहां आने पर विवाद उचित नहीं है। मिल-जुलकर रहना हमारी संस्कृति है। डॉ. मुखर्जी जी को कैसे बुलाया और वो कैसे जा रहे हैं, ये चर्चा निरर्थक है। हर साल हम देश के सज्जनों को कार्यक्रम में आमंत्रित करते हैं। हमारे न्योते को डॉ. मुखर्जी ने दिल से स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि भारत में जन्मा हर व्यक्ति भारतीय है।

संघ केवल हिन्दू के लिए ही नहीं है, बल्कि सभी के लिए काम करता है। संघ डेमोक्रेटिक माइंड वाला संगठन है। संगठित समाज ही भाग्य परिवर्तन की पूंजी है। सबकी माता भारत माता हैं। सबके पूर्वज समान हैं। संगठन में शक्ति होती है।कोई भी कार्य संपन्न होता है तो शक्ति के आधार पर होता है। अनियंत्रित शक्ति खतरे वाली बात है। इसलिए शक्ति को शील का नियंत्रण चाहिए। समाज की समस्याओं के हल के लिए मतभेद भूलाकर काम करना होगा। हम विविधता में एकता को लेकर चल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आजादी से पहले सभी विचारधाराओं वाले महापुरुषों की चिंता थी कि हमारे विचार से कुछ भला होगा, लेकिन सदा के लिए बीमारी नहीं खत्म होगी। डॉ. हेडगेवार को अपने लिए कार्य करने की कोई इच्छा नहीं थी। वे सब कार्यों में रहे। कांग्रेस के आंदोलन में दो बार जेल गए, उसके कार्यकर्ता भी रहे। समाजसुधार के काम में सुधारकों के साथ रहे। धर्म संस्कृति के संरक्षण में संतों के साथ रहे। डॉ. हेडगेवार ने वर्ष 1925 में विजयादशमी के मौके पर 17 लोगों को साथ लेकर संघ की शुरुआत की।”

डॉ. हेडगेवार मां भारती के सपूत

पूर्व राष्ट्रपति कार्यक्रम में शामिल होने से करीब ढाई घंटे पहले संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार का पुस्तैनी मकान देखने पहुंचे। वहां पहुंचने पर उनका डॉ. भागवत ने स्वागत किया। पूर्व राष्ट्रपति ने विजिटर्स बुक में लिखा, “डॉ. केबी हेडगेवार मां भारती के महान सपूत थे। मैं यहां उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने आया हूं। ” डॉ. हेडगेवार का पुस्तैनी मकान नागपुर शहर के शुक्रवारी इलाके में है। इसी मकान में डॉ. हेडगेवार ने 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन संघ की स्थापना को लेकर पहली बैठक की थी।

उल्लेखनीय है कि डॉ. मुखर्जी ने जब से संघ का आमंत्रण स्वीकार किया है, कांग्रेस में घमासान मचा हुआ है। पार्टी के कई नेता, मुखर्जी के संघ के कार्यक्रम में जाने का विरोध कर रहे थे। पार्टी नेताओं ने उनसे अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था। डॉ. मुखर्जी की पुत्री शर्मिष्ठा मुखर्जी, पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम, जयराम रमेश, सीके जाफर शरीफ समेत 35 से ज्यादा पार्टी नेताओं ने मुखर्जी से संघ के कार्यक्रम में नहीं जाने की अपील की थी। इन नेताओं का कहना था प्रणब के कार्यक्रम में जाने से संघ की विचारधारा को बल मिलेगा। हालांकि मुखर्जी ने स्पष्ट रूप से कह दिया था कि वह इस मुद्दे पर जो भी बोलना होगा नागपुर में ही बोलेंगे।

समापन समारोह में ये रहे उपस्थित

समापन समारोह में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पोते अर्धेंदु बोस, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र सुनील शास्त्री, अरविंद मिल्स के संजय लालभाई, मफतलाल इंडस्ट्रीज के विशाल मफतलाल, सीसीएल प्रोडक्ट्स के छल्ला राजेंद्र प्रसाद, फुटबॉल खिलाडी कल्याण चौबे और अमेरिका स्थित इनफिनिटी फाउंडेशन के संस्थापक भारतीय मूल के राजीव मल्होत्रा भी मौजूद थे। इन सभी को संघ ने कार्यक्रम में आमंत्रित किया था। इसके अलावा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर, महाराष्ट्र सरकार के ऊर्जा मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले, भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय संगठन महामंत्री संजय जोशी, अभिनेता गजेंद्र चौहान समेत कई प्रमुख लोग मौजूद थे।

डॉ. मुखर्जी का हुआ जोरदार स्वागत

कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी संघ के कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए बुधवार शाम को ही नागपुर पहुंच गए थे। नागपुर एयरपोर्ट पर पहुंचने पर उनका संघ के प्रमुख पदाधिकारियों ने जोरदार स्वागत किया था। स्वागत करने वालों में सह-सरकार्यवाह वी.भगैया भी शामिल थे। हालांकि एयरपोर्ट पर कांग्रेस के कार्यकर्ता नहीं दिखे। मुखर्जी नागपुर के राजभवन में ठहरे हैं। वह नागपुर एयरपोर्ट से शुक्रवार सुबह नई दिल्ली के लिए प्रस्थान करेंगे।

क्या है ओटीसी

संघ शिक्षा वर्ग, तृतीय वर्ष (ओटीसी-तृतीय वर्ष) संघ का सर्वोच्च सांगठनिक प्रशिक्षण है। यह हर साल नागपुर में आयोजित होता है। इसमें इस साल देशभर के 708 स्वयंसेवक भाग ले रहे हैं। इनमें इंजीनियर, डॉक्टर, आईटी एक्सपर्ट, पत्रकार, किसान और विभिन्न वर्ग के युवा शामिल हैं। ओटीसी-तृतीय वर्ष के लिए ओटीसी-प्रथम और द्वितीय वर्ष अनिवार्य है। ये दोनों प्रशिक्षण प्रांत स्तर पर हर साल मई-जून में आयोजित किए जाते हैं। ओटीसी-प्रथम वर्ष के लिए प्राथमिक शिक्षा वर्ग (आईटीसी) अनिवार्य है, जो जिला स्तर पर आयोजित किया जाता है। यह प्रशिक्षण सात दिनों का होता है।

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