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छऊ भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक अभिन्न हिस्सा है और यह सभी भारतीय नृत्यों एवं नाट्य कलाओं का भारतीय मानस के अनुरूप समावेश कर निर्मित एक ठेठ स्वदेशी नृत्य शैली है। ‘छऊ’ संस्कृत शब्द छाया से लिया गया है, जिसका अर्थ है प्रतिबिम्ब अथवा छाया। मास्क अर्थात मुखौटा इस नृत्य शैली का एक प्रमुख उपकरण है और इसे स्थानीय भाषा में ‘छाऊ’ कहा जाता है। यह मार्शल आर्ट पर आधारित झारखण्ड का एक पारंपरिक नृत्य है जिसमे जनजातीय एवं गैर जनजातीय समुदाय की एक सामान भागीदारी होती है छऊ का उद्गम स्थल झारखण्ड का सरायकेला क्षेत्र है। सरायकेला में यूं तो सालों भर छऊ की छटा बिखरी रहती है लेकिन ख़ास तौर पर यह नृत्य समारोहपूर्वक वसंत के मौसम के दौरान सूर्य-त्योहार या चैत्र पर्व में किया जाता है।

(मंच पर सरायकेला छऊ नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति)

छऊ के प्रचलित विषयों में वीर कर्म, पारंपरिक लोकगीत और रामायण व महाभारत के प्रसंग शामिल होते हैं। इस नृत्य में चेहरे के भाव और स्वर की कोई भूमिका नहीं है। आवश्यकतानुसार विभिन्न भावों एवं भावनाओं का प्रदर्शन शरीर की गतिविधियों के माध्यम से किया जाता है| सरायकेला छऊ में “तलवार और ढाल” का प्रयोग बहुधा किया जाता है जिससे सिद्ध होता है कि इस नृत्य शैली में युद्ध कौशल का भी समावेश है|

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