संसद में भारत की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज का भावनात्मक भाषण, जिसे देश में भक्तगण मंत्री का मार्मिक क्रंदन बता रहे हैं, वह उकसावे और उन्माद की राजनीति की रणनीतिक रूदाली से अधिक कुछ भी नही है। यह पहली बार नहीं है कि हमने आक्रोश और भावुकता के ऐसे मार्मिक क्रंदन का अभिनय देश की संसद में देखा हो और ऐसा भी नही कि केवल सुश्री सुषमा स्वराज ही इस फन की माहिर हों। दरअसल, भाजपा और पाकिस्तान की दक्षिणपंथी राजनीति में ढ़ेरों नेता इस फन के माहिर फनकार हैं। इनका फन भी मौके और जरूरत के हिसाब से जाहिर होता है।

1996 में भारत ने पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दिया था। परंतु पाकिस्तान ने अभी तक भी भारत को यह दर्जा नही दिया है। कुछ साल पहले अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से 6.62 बिलियन अमेरिकी डालर का कर्ज लेते हुए पाकिस्तान ने आईएमएफ को आश्वासन दिया था कि वह भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देने पर सकारात्मक रूख अख्तियार करेगा परंतु नतीजा जस का तस है और पाकिस्तान ने कभी भी भारत को यह दर्जा नही दिया।

पाकिस्तान में इस भारत विरोध की राजनीति वालों और भारत में पाकिस्तान विरोध की राजनीति वालों के लिए दोनों एक दूसरे की जरूरत हैं। यदि पाकिस्तान न हो, तो जरा सोचिये कि पीएम नरेन्द्र मोदी क्या जुमला छोड़कर गुजरात में सर पर नाचती हार को टालते। उन्होंने तो पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व राष्ट्रपति और एक सेना प्रमुख को ही पाकिस्तान के साथ अपने खिलाफ साजिश करने वाला बता दिया।

सुषमा तो केवल रूदाली करने के अंदाज में भावुक भाषण कर रही थी परंतु नरेन्द्र मोदी ने तो पाकिस्तानी साजिश के तिलिस्म का राज ही गुजरात में सामने ला दिया था। और अब उनके वकील अरूण जेटली संसद में कह रहे हैं कि उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व उपराष्ट्रपति की निष्ठा पर कोई शक नही है। वास्तव में दोनों तरफ का यह विरोध दोनों देशों की जनता को ठगने वाला और दोनों देशों की जनता के असली सवालों से उनका ध्यान हटाकर उन्हें बेवजह के मसलों में उलझाने वाला भर है।

पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाक के साथ जल संधि की समीक्षा करने का दावा करते हुए एक बयान में कहा था कि पानी और खून साथ-साथ नही बह सकता। परंतु वह देश से यह छिपाते हैं कि भारत ने पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड देश का दर्जा दे रखा और विभिन्न प्रकार की रियायतें और सहूलियतें भी इस दर्जे में शामिल हैं। वह देश को यह नही बताते हैं कि जितना सालाना व्यापार दोनों देशों के बीच औपचारिक रूप से होता है उससे कहीं ज्यादा आनौपचारिक व्यापार दोनों देशों के बीच होता है। अपने करीबी उद्योगपति सज्जन जिंदल की नवाज शरीफ के साथ व्यवसायिक साझेदारी और उनके बार-बार मोदी-शरीफ की मुलाकातों को करवाने की चर्चा भी मोदीराज में नही की जाती है। वास्तव में यह दुश्मनी दोनों देशों की उन्माद की राजनीति करने वाले दक्षिणपथियों के लिए संजीवनी की तरह है और यदि यह दुश्मनी खत्म हो जाती है तो हो सकता है कि दोनों तरफ की यह उकसावे और उन्माद की राजनीतिक दुकाने ही बंद हो जायें।

यह भी पढ़ें :  ABVP के छात्रों ने नजीब मामले में लाइ डिटेक्टर टेस्ट कराने से किया मना

भारतपाक के बीच व्यापार 

1996 में भारत ने पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दिया था। परंतु पाकिस्तान ने अभी तक भी भारत को यह दर्जा नही दिया है। कुछ साल पहले अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से 6.62 बिलियन अमेरिकी डालर का कर्ज लेते हुए पाकिस्तान ने आईएमएफ को आश्वासन दिया था कि वह भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा देने पर सकारात्मक रूख अख्तियार करेगा परंतु नतीजा जस का तस है और पाकिस्तान ने कभी भी भारत को यह दर्जा नही दिया। असल में भाजपा-संघ के नेता कितनी भी जुमलेबाजी करें लेकिन पाकिस्तान को एमएफएन देश का दर्जा उसे भारत के साथ व्यापार करने की सुविधा देता है। इसी दर्जे का नतीजा है कि मोदी लाख जुमलेबाजी करें कि पानी और खून साथ साथ नही बह सकता परंतु वास्तविकता यह है कि ‘‘मुनाफा, जुमले और खून साथ साथ बह रहे हैं”।

सदन की कार्रवाही के सीधा प्रसारण में दिए जाने वाले भाषणों में जब पाकिस्तान के खिलाफ नकली गुस्से से आग-बबूला होने का अभिनय करते हुए विदेश मंत्री बोलतीं हैं, तब दोनों देशों के बीच के व्यापारिक सम्बन्धों वाले आंकड़ों पर चतुराई से पर्दा डाल दिया जाता है और भोली जनता भावना की बहती बयार में भाव विभोर हो उठती है|

भारत सरकार के विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) के अनुसार पाकिस्तान और भारत के बीच सालाना 2.61 बिलियन (अमेरिकी) डालर का औपचारिक व्यापार होता है तो वहीं एक अध्ययन के अनुसार इसके अलावा 4.71 बिलियन (अमेरिकी) डालर सालाना का अनौपचारिक व्यापार भी होता है।

अर्थात दोनों देशों के बीच सालाना लगभग 7.32 बिलियन (अमेरिकी) डालर का सालाना व्यापार होता है। सदन की कार्रवाही के सीधा प्रसारण में दिए जाने वाले भाषणों में जब पाकिस्तान के खिलाफ नकली गुस्से से आग-बबूला होने का अभिनय करते हुए विदेश मंत्री बोलतीं हैं, तब दोनों देशों के बीच के व्यापारिक सम्बन्धों वाले इन आंकड़ों पर चतुराई से पर्दा डाल दिया जाता है और भोली जनता भावना की बहती बयार में भाव विभोर हो उठती है|

मोदीशरीफ की दोस्ताना बैठकें 

2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में मोदी ने अपनी राजनीतिक जुमलेबाजी से एकदम उलट समारोह में नवाज़ शरीफ को आमंत्रित किया था। मोदी के कदम पर राजनीतिक हलकों में हैरानी थी। मोदी और उनकी पार्टी बेशक इसे पड़ोसियों से दोस्ती जैसे सकारात्मक राजनीति होने का दावा करें परन्तु जानकारों का मानना है कि दोस्ती के पीछे असल में मोदी के करीबी माने जाने वाले जिदंल स्टील्स के सज्जन जिंदल और उनके कारोबारी हित ज्यादा थे। उसके बाद भी सज्जन जिंदल ने ऐसी कोशिशे जारी रखी और एकबार तो उनकी पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ मीटिंग खासी चर्चा में रही थी। परंतु सज्जन जिंदल की मोदी-शाह के बीच संबंध सुधारने की कोशिशों का नतीजा क्या रहा यह भी समझना होगा।

सज्जन जिंदल के नवाज शरीफ परिवार के साथ कारोबारी रिश्ते हैं। उनकी कंपनी जिंदल स्टील्स और शरीफ के परिवार की कंपनी इत्तेफाक ग्रुप ऑफ कंपनीज के बीच कारोबारी साझेदारी है और इसीलिए वह बार-बार मोदी-शरीफ के बीच की कड़ी बनकर उभरते हैं। मोदी का अचानक 25 दिसंबर को बगैर किसी कार्यक्रम के पाकिस्तान में नवाज शरीफ का जन्मदिन मनाने पहुंच जाना कोई पड़ोसी से संबंध सुधारने की कूटनीतिक कोशिश नहीं थी। यह सरासर अपने कारोबारी दोस्तों के हितों को साधने का प्रयास था।

यह भी पढ़ें :  हाथरस में स्वच्छता अभियान रस्मअदायगी बन कर रह गया

अडानी पाकिस्तान में 4000 मेगावाट का पावर संयत्र लगाना चाहते थे और अक्टूबर 2015 में अडानी ने अपना एक प्रतिनिधि भी पाकिस्तान भेजा था जिसकी भारतीय मीड़िया में भी काफी चर्चा रही थी। अब यह कोई इत्तेफाक नही है कि अक्टूबर के बाद मोदी दुनिया के सामने सार्क देशों की बैठक में 1 दिसंबर 2015 को केवल हाथ मिलाते हैं और फिर दोनों के बीच पर्दें के पीछे एक घण्टे लंबी मुलाकात होती है। लेकिन मोदी की कोशिश यहीं नहीं ठहरती है, वह 25 दिसंबर को अचानक पाकिस्तान की धरती पर यारी निभाने उतर जाते हैं। बगैर किसी पूर्व कार्यक्रम के, बगैर किसी को देश में खबर किये। मोदी-नवाज की दोस्ती और सज्जन जिंदल की अतिरिक्त सज्जनता पाक सेना को रास नही आती है और 2 जनवरी 2016 को पठानकोट पर आतंकी हमला हो जाता है।

उसके बाद सज्जन जिंदल के अप्रेल 2017 में एक बार फिर पाकिस्तान में पहुंचकर शरीफ से मुलाकात करते हैं। सज्जन और भारतीय सत्ताधारी नेता इसे व्यक्तिगत मुलाकात कहते हैं तो वहीं दूसरी शरीफ पाक सेना प्रमुख को बताते हैं कि यह तनाव खत्म करने का कूटनीतिक प्रयास था जो असफल रहा। शायद अप्रैल 2017 में सज्जन जिंदल की सज्जनता पाक सेना को एकबार फिर नागवार गुजरती है और पाकिस्तानी सेना की बीटीए मई 2017 में सीमा के भीतर 250 मीटर दाखिल होकर दो भारतीय जवानों का सर काटकर, उनके शवों को क्षत-विक्षत करके वापस सुरक्षित चली जाती है। एक बार फिर एक के बदले दस सिर लाने वाली राजनीति फिर जुमलेबाजी करती रह जाती है। अब मोस्ट फेवर्ड नेशन की ऐसी राजनीति और भारतीय रूदालियों के गान की समानता यही है कि उन्मादी और उकसावे वाली बयानबाजी से ना केवल देश की जनता को ठगा जाये बल्कि गंभीर संकट का सामना कर रहे जाधव परिवार को भी उसका शिकार बनाया जाये।

भारतपाक संबंध और हथियारों का कारोबार 

वास्तव में भारत और पाकिस्तान के बीच इस तनाव का सबसे बड़ा फायदा दुनियाभर में हथियारों का कारोबार करने वाले देशों को है। भारत ने पिछले साल अपनी जीडीपी को कुल 2.3 प्रतिशत अर्थात लगभग 51.3 बिलियन (अमेरिकी) डालर अपने रक्षा बजट पर खर्च किया तो वहीं पाक ने अपनी जीडीपी का कुल 3.4 प्रतिशत अर्थात कुल 9.5 बिलियन (अमेरिकी) डालर रक्षा बजट पर खर्च किया है। पाकिस्तान ने 735 मिलियन (अमेरिकी) डालर हथियारों पर खर्च किये तो वहीं भारत ने 2015 में 3078 मिलियन (अमेरिकी) डालर हथियारों पर खर्च किये और हथियारों पर इतना खर्च तब है, जबकि दोनों देशों की 20 प्रतिशत से अधिक आबादी रोजाना 1.25 (अमेरिकी) डालर से भी कम पर गुजारा करती है। हथियारों के इस खर्च का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह दोनों देश दुनिया के बड़े हथियार खरीददार हैं। यदि इनके बीच तनाव खत्म हो जायेगा तो स्वाभाविक है कि हथियार बेचने वाले देशों के हथियार के कारोबार पर भारी असर पड़ेगा।

असल में यह हथियार बनाने वाले देशों की लाॅबी चाहती है कि यह तनाव लगातार बना रहे और दोनों देश अपने रक्षा बजट को स्वास्थ्य बजट और शिक्षा के खर्च से ज्यादा रखें और उनके हथियार बिकते रहें। उसके लिए चाहे देश की जनता को जुमलेबाजी से ठगा जाये अथवा जाधव परिवार पर राजनीतिक रूदाली करके एक परिवार की भावनाओं को भावुकता भरे बाजार में सजाकर बेचा जायेगा और मुनाफे और जुमलों के बीच बस यूंही बहता रहेगा बेगुनाहों का खून।

इन हथियारों के कारोबार की खरीद और देशों के आपसी संबंध को अमेरिका के पाकिस्तान के प्रति बदलती भाषा और चीन के पाकिस्तान के प्रति नरम रूख से समझा जा सकता है। एक समय में पाकिस्तान अमेरिका का सबसे बड़ा हथियार खरीददार था परंतु हाल ही में यह स्थिति बदली है और आज पाकिस्तान चीन का सबसे बड़ा हथियार ग्राहक है और वहीं भारत की हथियार खरीद अमेरिका से बढ़ी है। मौजूदा दौर में भारत अमेरिका का सातवें नंबर का सबसे बड़ा हथियार ग्राहक है तो पाकिस्तान इस सूची में 17वें नंबर पर है। अब पाक के प्रति अमेरिका के बदले रवैये और चीन की पाक के प्रति नरमी को समझा जा सकता है। असल में यह हथियार बनाने वाले देशों की लाॅबी चाहती है कि यह तनाव लगातार बना रहे और दोनों देश अपने रक्षा बजट को स्वास्थ्य बजट और शिक्षा के खर्च से ज्यादा रखें और उनके हथियार बिकते रहें। उसके लिए चाहे देश की जनता को जुमलेबाजी से ठगा जाये अथवा जाधव परिवार पर राजनीतिक रूदाली करके एक परिवार की भावनाओं को भावुकता भरे बाजार में सजाकर बेचा जायेगा और मुनाफे और जुमलों के बीच बस यूंही बहता रहेगा बेगुनाहों का खून।

यह भी पढ़ें :  आखिरकार लालू को मिली सजा- साढ़े 3 साल की जेल और 5 लाख का जुर्माना

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

इस पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया ⇓
data-matched-content-ui-type="image_card_stacked"

Print Friendly, PDF & Email