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मालिक की पूंजी का पेट मुनाफे से ही भरता है, इसलिए अखबार को हल हाल में छपना होता है। चाहे आतंकवादियों की गोली हो या न्यूजरूम का तनाव, पत्रकार की मौत के अगले दिन अखबार एक कॉलम प्रकाशित कर उसको याद करने की रिवायत पूरी कर लेता है और फिर सब यथावत चलने लगता है क्यूंकि “शो मस्ट गो ऑन” ।


“शो
मस्ट गो ऑन”। पत्रकारिता जगत में भी इस कहावत को किसी रिवायत की तरह अमल में लाया जाता है। आपको याद होगा, जनवरी 2015 में व्यंग्य पर आधारित फ्रांसीसी साप्ताहिक अखबार शार्ली एब्दो के दफ्तर पर हमला करके आतंकवादियों ने मुख्य संपादक स्टेफन चार्बोनिए सहित 9 पत्रकारों और मकान के केयर टेकर की हत्या कर दी थी। इसके बावजूद अखबार अपने चिरपरिचित अंदाज में तीखे व्यंग्य के साथ अगले सप्ताह फिर प्रकाशित हुआ।

दुसरा उदाहरण सिर्फ दो महीने पहले का है जब आतंकियों ने 14 जून 2018 को ‘राइजिंग कश्मीर’ के संपादक शुजात बुखारी की श्रीनगर में गोली मारकर हत्या कर दी थी। उनके जाने के बाद राइजिंग कश्मीर की टीम ने अपने संपादक के जज़्बे को कायम रखते हुए फिर उसी बेबाकी के साथ 15 जून का अखबार प्रकाशित किया।

इसी कड़ी में अगली कहानी देश के एक बड़े मीडिया समूह के न्यूज़ रूम में कोलेप्स हो जाने वाले समूह संपादक कल्पेश याग्निक जी की है। ख़बरों में डूब जाने वाले कल्पेश जी ने खबर बनाते-बनाते ही अंतिम साँस ली। अगले दिन जब अखबार छपा तब दैनिक भास्कर ने अपने समूह संपादक के निधन पर एक कॉलम प्रकाशित कर उनके योगदानों को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसी बीच कुछ पत्रकारों ने सोशल मीडिया में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पत्रकारिता की दुनिया के काले सच को उजागर किया। कल्पेश जी के इस तरह दुनिया से चले जाने पर इस बात पर चर्चा तेज हो गयी है कि क्या तनाव की भठ्ठी में तपता न्यूजरूम पत्रकारों का कत्लगाह बनता जा रहा है?

इसमें कोई शक नहीं है कि पूंजी और बाज़ार के गठजोड़ ने अखबार को एक उत्पाद और पत्रकार को उस उत्पाद का सेल्समैन बना दिया है। ऐसे में उत्पाद को बेचने और बेचकर ‘हर हाल में’ मोटा मुनाफा सुनिश्चित करने के लिए न्यूज रूम को स्टीम इंजन की भट्टी की तरह तपाया जाता है। यह भट्टी जितनी लाल होकर तपती है, मुनाफाखोरी की रेल उतनी ही तेज भागती है। रफ़्तार की इस धुन में किसी को इस बात की परवाह नहीं होती है कि तनाव की इस तपती भठ्ठी में कितने खबरनवीसों की आहुति दी जा रही है।

कल्पेश याग्निक जी की मौत कोई पहली घटना नहीं है। न्यूजरूम का तनाव जानलेवा साबित हो चुका है। अहम सवाल यह है कि अगर आतंकियों की होली से मरने वाले पत्रकारों की मौत को अगर बड़ी कुर्बानी की तरह देखा जाता है तो क्या न्यूजरूम में काम के दबाव और जानलेवा तनाव की वजह से मरने वाले पत्रकारों की मौत को महज उनके स्वास्थ्य से जुड़ा मामला मानना क्या सही है?

मालिक की पूंजी का पेट मुनाफे से ही भरता है, इसलिए अखबार को हल हाल में छपना होता है। वजह चाहे आतंकवादियों की गोली हो या न्यूजरूम का तनाव, पत्रकार की मौत के अगले दिन अखबार एक कॉलम प्रकाशित कर उसको याद करने की रिवायत पूरी कर लेता है और फिर सब यथावत चलने लगता है क्यूंकि “शो मस्ट गो ऑन”।

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