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हमारी बेटियाँ
घर को सहेजती-समेटती
एक-एक चीज का हिसाब रखतीं
मम्मी की दवा तो
पापा का आफिस
भैया का स्कूल
और न जाने क्या-क्या।
इन सबके बीच तलाशती
हैं अपना भी वजूद

बिखेरती हैं अपनी खुशबू
चहरदीवारियों से पार भी
पराये घर जाकर
बना लेती हैं उसे भी अपना
बिखेरती है खुशियाँ
किलकारियों की गूँज की।

हमारी बेटियाँ
सिर्फ बेटियाँ नहीं होतीं
वो घर की लक्ष्मी
और आँगन की तुलसी हैं
मायके में आँचल का फूल
तो ससुराल में वटवृक्ष होती हैं
हमारी बेटियाँ।

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पेशे से प्रवक्ता। साहित्य, लेखन और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में सक्रिय। नारी विमर्श, बाल विमर्श और सामाजिक मुद्दों से सम्बंधित विषयों पर प्रमुखता से लेखन। लेखन-विधा- कविता, लेख, लघुकथा एवं बाल कविताएँं। अब तक 3 पुस्तकें प्रकाशित- “आधी आबादी के सरोकार“ (2017), “चाँद पर पानी“ (बाल-गीत संग्रह-2012) एवं “क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा“ (संपादित, 2007)। देश-विदेश की प्रायः अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और इंटरनेट पर वेब पत्रिकाओं व ब्लॉग पर रचनाओं का निरंतर प्रकाशन। व्यक्तिगत रूप से ‘शब्द-शिखर’ और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’, ‘सप्तरंगी प्रेम’ व ‘उत्सव के रंग’ ब्लॉग का संचालन। 60 से अधिक प्रतिष्ठित पुस्तकों / संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से समय-समय पर रचनाएँ, वार्ता इत्यादि का प्रसारण। व्यक्तित्व-कृतित्व पर डॉ. राष्ट्रबंधु द्वारा सम्पादित ‘बाल साहित्य समीक्षा’ (नवम्बर 2009, कानपुर) का विशेषांक जारी। अनेक राष्ट्रीय / अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित।