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फिल्मकार और कला निर्देशक सुमित मिश्रा की शॉर्ट फिल्म “अमृता एंड आई” बहुत सराही जा रही है और अनेक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में 21 से अधिक पुरस्कार अपने नाम कर चुकी है। उन्होंने हिंदी फीचर फिल्म “अगम” का निर्देशन भी किया है। छोटे और बड़े पर्दे पर उनके किए काम की वजह से मायानगरी में एक विशिष्ठ स्थान बनाने वाले सुमित एक अच्छे चित्रकार भी हैं। हिंद वॉच मीडिया में यह उनका पहला आलेख है। रुपहले पर्दे की गंगा के बहाने हिंद वॉच के कैनवास पर भारतीय संस्कृति का विलक्षण शब्दचित्र उकेर रहे हैं सुमित मिश्रा  

                                                                                                                    〈〈 सुमित मिश्रा
सिनेमा अकेला ऐसा माध्यम है जिस में साहित्य, सभ्यता, संस्कृति और कला के सभी आयामों का संयोजन एक साथ होता है। इसलिए किसी भी देश की कला और संस्कृति के काल विशेष को जानने का सही माध्यम है सिनेमा। लेकिन किसी भी देश के शहरी विकास की पौराणिकता से आधुनिकता तक का मूल्यांकन करने के लिए भूगौलिक और ऐतिहासिक रूप से वहाँ की प्रमुख नदियों का अध्ययन करना ज़रूरी है। इसलिए भारत के शहरी विकास का भूगोल, इतिहास, साहित्य, सभ्यता, संस्कृति और कला की समग्रता से जानने के लिए गंगा नदी और सिनेमा दोनों को तुलनात्मक अध्ययन करना अथवा समान्तर रूप से देखने का प्रयास करना भी कभी-कभी ज़रूरी है।

मेरा मानना है कि वातावरण में घटते-बढ़ते तापमान को अथवा पर्यावरण की शुद्धि-अशुद्धि को नदी के अध्यन से समझा जा सकता है और देश अथवा समाज के कला एवं साहित्य के दिशा और दशा को सिनेमा में हो रहे बदलाव से समझा जा सकता है।

भारत में गंगा और सिनेमा जन-मानस का अभिन्न अंग रहा है एक आस्था तो दूसरा मनोरंजन के धरातल पर। बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलेगा की कथा और कथानक में भारतीयों की गहन दिलचस्पी रही है और इसका इस्तेमाल आस्था के लिए भी किया गया है। जहाँ आस्था को और सुदृढ़ करने के लिए कथानक का भरपूर इस्तेमाल किया गया है तो वहीँ कथा और सिनेमा को व्यावसायिक रूप से स्थापित करने एवं जन-मानस में प्रसिद्धि के लिए आस्था को उत्प्रेरक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है।

गंगा और सिनेमा दोनों का परिदृश्य कालांतर में बदलता रहा है। गंगा की निर्मलता जिस तरह से शहरी और आधुनिक परिवेश की वजह से निरन्तर प्रदूषित होती रही है, वैसे ही सिनेमा के विषय और शिल्प में बदलाव आता रहा है जिसे सीधे तौर पर प्रदूषित तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन शुद्धि में कुछ मिलावट ज़रूर हुई है। सिनेमा और गंगा के बदलाव को सिनेमाई शिल्प के जरिए समझने के लिए राज कपूर साहब के दो अलग अलग समय में बनाई हुई फिल्म के नाम का इस्तेमाल करना बेहतर होगा। 1960 में प्रदर्शित फिल्म “जिस देश में गंगा बहती है” और 1985 में प्रदर्शित फिल्म “राम तेरी गंगा मैली” के बीच डेढ़ दशक का अंतर है। इस डेढ़ दशक में जो बदलाव गंगा की निर्मलता में आया वैचारिक रूप से वो इन दोनों सिनेमा के नाम से समझा जा सकता है। और विस्तार से समझने के लिए गंगा और सिनेमा के बारे में सम्मिलित लेकिन समान्तर जानकारी रखना इस तालमेल को समझने और समझाने के लिए सरल होगा।

गंगा भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी है। यह कुल मिलाकर 2,510 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई उत्तराखण्ड में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुन्दरवन तक विशाल भू-भाग को सींचती है। देश की प्राकृतिक सम्पदा ही नहीं, जन-जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। 2,071 कि॰मी॰ तक भारत तथा उसके बाद बांग्लादेश में अपनी लंबी यात्रा करते हुए यह सहायक नदियों के साथ दस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। गंगा के प्रति विदेशी साहित्य में भी प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णन किये गये हैं।

भारतीय सिनेमा ने 20वीं सदी की शुरुआत से ही विश्व के चलचित्र जगत पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। भारतीय फिल्मों का अनुकरण पूरे दक्षिणी एशिया, ग्रेटर मध्य पूर्व, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्व सोवियत संघ में भी होता है। भारतीय प्रवासियों की बढ़ती संख्या की वजह से अब संयुक्त राज्य अमरीका और यूनाइटेड किंगडम भी भारतीय फिल्मों के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बन गए हैं। एक माध्यम के रूप में सिनेमा ने देश में अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की और सिनेमा की लोकप्रियता का इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि यहाँ सभी भाषाओं में मिलाकर प्रति वर्ष 1,600 तक फिल्में बनी हैं।

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जैसा की मैं पहले ही कह चूका हूँ की भारत और भारतीयों के लिए कथानक का विशेष महत्व रहा है जो भारतीय की आस्था को बढ़ाने में भी सहयोग देता रहा है इसलिए गंगा के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। मिथकों के अनुसार ब्रह्मा ने विष्णु के पैर के पसीने की बून्दों से गंगा का निर्माण किया। त्रिमूर्ति के दो सदस्यों के स्पर्श के कारण यह पवित्र समझा गया।

एक अन्य कथा के अनुसार राजा सगर ने जादुई रूप से साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति की। एक दिन राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिए एक यज्ञ किया। यज्ञ के लिए घोड़ा आवश्यक था जो ईर्ष्यालु इन्द्र ने चुरा लिया था। सगर ने अपने सारे पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया अन्त में उन्हें घोड़ा पाताल लोक में मिला जो एक ऋषि के समीप बंधा था। सगर के पुत्रों ने यह सोचकर कि ऋषि ही घोड़े के गायब होने की वजह हैं, उन्होंने ऋषि का अपमान किया। तपस्या में लीन ऋषि ने हजारों वर्ष बाद अपनी आँखें खोली और उनके क्रोध से सगर के सभी साठ हजार पुत्र जलकर वहीं भस्म हो गये। सगर के पुत्रों की आत्माएँ भूतबनकर विचरने लगीं क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं किया गया था। सगर के पुत्र अंशुमान ने आत्माओं की मुक्ति का असफल प्रयास किया और बाद में अंशुमान के पुत्र दिलीप ने भी।

भगीरथ राजा दिलीप की दूसरी पत्नी के पुत्र थे। उन्होंने अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार किया। उन्होंने गंगा को पृथ्वीपर लाने का प्रण किया जिससे उनके अंतिम संस्कार कर, राख को गंगाजल में प्रवाहित किया जा सके और भटकती आत्माएँ स्वर्ग में जा सकें। भगीरथ ने ब्रह्मा की घोर तपस्या की ताकि गंगा को पृथ्वी पर लाया जा सके। ब्रह्मा प्रसन्न हुए और गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिए तैयार हुए और गंगा को पृथ्वी पर और उसके बाद पाताल में जाने का आदेश दिया ताकि सगर के पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति सम्भव हो सके। तब गंगा ने कहा कि मैं इतनी ऊँचाई से जब पृथ्वी पर अवतरित होऊँगी तो पृथ्वी इतना वेग कैसे सह पाएगी? तत्पश्चात् भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और उन्होंने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोककर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा-सागर संगम तक गयीं, जहाँ सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयीं और पृथ्वीवासियों के लिए श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भागीरथी भी कहते हैं। इसी प्रकार एक पौराणिक कथा राजा शान्तनु और गंगा के विवाह तथा उनके सात पुत्रों के जन्म की है।

ये तो गंगा की कथा थी लेकिन चूँकि हम गंगा और सिनेमा की सामानांतर बात कर रहे है तो भारतीय सिनेमा का इतिहास भी जानना आवश्यक है।

भारतीय सिनेमा की शुरुआत कुछ इस तरह होती है की वर्ष 1895 में लन्दन में बनी फिल्म लुमिएरे (Lumière) की स्क्रीनिंग के बाद सिनेमा यूरोप भर में एक सनसनी बन गई और जुलाई 1896 में इस फिल्म को बंबई में प्रदर्शित किया गया था। अगले एक साल में प्रोफेसर स्टीवेंसन द्वारा एक फिल्म प्रस्तुति कलकत्ता स्टार थियेटर में एक स्टेज शो में की गयी। स्टीवेंसन के प्रोत्साहन और कैमरा से हीरालाल सेन, एक भारतीय फोटोग्राफर ने उस स्टेज शो के दृश्यों से ‘द फ्लॉवर ऑफ़ पर्शिया’ (1898) [फारस के फूल] फिल्म बनाई। एच एस भटवडेकर की द रेस्टलेर्स (1899) [पहलवान] जो मुंबई के हैंगिंग गार्डन में एक कुश्ती मैच को दिखाती है किसी भारतीय द्वारा शूट की हुई पहली फिल्म थी। यह पहली भारतीय वृत्तचित्र फिल्म भी थी।

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भारत की पहली पूरी अवधि की फीचर फिल्म “राजा हरिशचंद्र” (1913) का निर्माण दादासाहब फाल्के ने किया था। इस फिल्म में पुरुषों ने महिलाओं का किरदार निभाया। यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म का सिर्फ एक ही प्रिंट बनाया गया था और इसे ‘कोरोनेशन सिनेमेटोग्राफ’ में 3 मई 1913 को प्रदर्शित किया गया। फिल्म को व्यावसायिक सफलता मिली और इसने अन्य फिल्मो के निर्माण के लिए अवसर प्रदान किया। भारतीय सिनेमा थिएटर श्रृंखला में पहला नाम मदन थिएटर का आता है जो पारसी उद्योगपती जमशेदजी मदन का था । जमशेदजी 1902 से हर साल 10 फिल्मों का निर्माण और उनका भारतीय उपमहाद्वीप में वितरण करते थे। उन्होंने 1917 में सत्यवादी राजा हरिशचंद्र का निर्माण भी किया जो दादासाहब फाल्के की राजा हरिशचंद्र (1913) का रीमेक थी।

गंगा और सिनेमा के औपचारिक परिचय के बाद अब सिनेमा में गंगा और गंगा में सिनेमा के प्रत्यक्ष और परोक्ष तालमेल पर बात करते हैं।

राधू कर्माकर द्वारा निर्देशित और राज कपूर द्वारा निर्मित फिल्म जिस देश में गंगा बहती है 1965 में प्रदर्शित हुई थी। उस समय तक गंगा की धारा भी निर्मल थी और उसमें प्रदुषण की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी इसलिए सच्चाई और निष्ठा के प्रतीक के रूप में गंगा का प्रयोग होता था। इसलिए इस फिल्म की शुरुआत में ही पहाड़ की निर्मल और चंचल गंगा से होती है जो बनारस तक आ कर शांत और गंभीर हो जाती है। इस फिल्म में दृष्टिगत और वैचारिक दोनों स्तर पर गंगा को निर्मल और पावन बताया गया है जो उस समय गंगा का वास्तविक सच था। फिल्म का मुख्य पात्र राजू जो निहायत ही मासूम है वो अपना परिचय यही देता है है सबको जहाँ गंगा बहती है मैं वहाँ का वासी हूँ। उसकी स्वाभाव की निर्मलता बिलकुल गंगा जैसी है इस फिल्म में जो दुर्जन डाकुओं के साथ रहकर भी अपनी सज्जनता नहीं खोता है और अंत में अपने सानिध्य में उन डाकुओं को भी निर्मल कर देता है।

राजू का बार-बार ये कहना की गंगा जी की कसम खा कर कोई झूठ नहीं बोल सकता है सीधे तौर पर जन-मानस में खुद को स्थापित करता है और तत्कालीन दौर में गंगा का वास्तविक सच यही था, कितना भी मैल धोया जाए गंगा निर्मल ही रहेगी। अपनी सानिध्य में आए सभी पाप को धोने का सामर्थ है गंगा में और यही पौराणिक कथानक इस फिल्म की सांकेतिक कहानी थी।

ये वो दौर था जहाँ एक तरफ़ निर्मल गंगा बह रही थी, समाज और जीवनशैली में सहजता थी और इसलिए उस समय सिनेमा जगत में सुजाता, उसने कहा था, कोहिनूर, श्रीमान सत्यवादी और काजल जैसी फिल्में बन रही थी जिसका कथानक और शिल्प काफी सहज हुआ करता था।

लगभग डेढ़ दशक के अंतराल पर हम फिर से भारतीय सिनेमा और गंगा दोनों का जायजा लेते हैं तो स्थिति में काफी बदलाव नज़र आता है। इन पंद्रह सालों में ही गंगा की पवित्रता कम होने लगी। उसके तट पर बसे शहरों और उद्योगों की वजह से प्रदूषण बढ़ने लगा और गंगा की सफाई भी हमारा एक सामाजिक मुद्दा बना। इधर सिनेमा में भी विषय में खुलापन और खुलापन विषय बनने लगा। सोच की दिशा और दशा दोनों में बदलाव आया। विषय और शिल्प को लेकर मुक्तता बढ़ी। ये वो दौर था जब मेरी जंग और गुलामी जैसी आक्रोश वाली फिल्म तो बन ही रही थी साथ ही सम्बन्ध पर आधारित आखिर क्यों और पारिवारिक फिल्म घर द्वार और प्यारी बहना भी बन रही थी। एक और खास बात ये थी की तवायफ जैसी फिल्म भी इस वर्ष प्रदर्शित हुई और इसे सराहना भी मिली।

कहने का सार ये है कि इस दशक में एक तरफ तो गंगा को लेकर एक वैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टिकोण भी स्थापित होने लगा, गंगा की निर्मलता को प्रदूषित किया जाने का अंदेशा, जन-मानस को होने लगा। तो दूसरी तरफ सिनेमा की विषय की सरलता कम होती गयी और विषय एवं शिल्प में जटिलता बढ़ने लगी । सबसे बेहतर उदाहरण है राज कपूर साहब द्वारा निर्देशित फिल्म “राम तेरी गंगा मैली” जिसने कई स्थापित तथाकथित मान्यताओं को तोड़ा। स्तनपान जैसे दृश्य को दिखाने के दुस्साहस किया और संभ्रांत समूह द्वारा विरोध भी दर्ज किया गया। जिस के सजा स्वरूप सेंसर बोर्ड ने “U” प्रमाणपत्र को “U/A” में तब्दील कर दिया। साधु समाज को गंगा मैली शब्द में गंगा का अपमान और स्तनपान में अश्लीलता दिखने लगा। तथाकथित सभ्य समाज ने राज कपूर पर भारतीय सिनेमा को प्रदूषित करने का आरोप तक लगाया जिसे गंगा की वास्तविक प्रदूषण नहीं दिख रहा था।

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पंद्रह साल पहले की “जिस देश में गंगा बहती है” की तरह ही इस फिल्म में भी पात्र को गंगा का चरित्र दिया है लेकिन विषय वस्तु अलग है क्यों की गंगा का स्वरुप भी अब तक बदल चूका है।
फिल्म के शुरुआत में ही हंगल साहब के द्वारा गंगा प्रदुषण की बात कही जाती है और लोगों का एक नयी समस्या से साक्षत्कार कराया जाता है।

फिल्म के टाइटल सांग को लेकर भी राज साहब बहुत सजग थे। रविंद्र जैन साहब को बुला कर उन्होंने विमर्श भी किया की मैं पहले भी गंगा पर टाइटल गीत बना चूका हूँ लेकिन तब मैंने सफाई और सच्चाई के साथ गंगा का नाम लिया था लेकिन इस बार गंगा को मैला होने की बात कह रहा हूँ गीत संगीत ऐसा हो की मेरी बात सही रूप में दर्शक तक पहुँच सके और तब शीर्षक गीत कुछ इस तरह बना –
उत्तर में बहती है कैसी निर्मल धारा, पूरब में रंग बदल गया बनी जलती धारा
रामकृष्ण को तोतापूरी ने ताना मारा, राम तेरी गंगा मैली….. राम तेरी गंगा मैली….
फिल्म की मुख्य पात्र युवा गंगा, गंगोत्री में रहती है। वहाँ उसे एक ऐसे युवक से प्रेम होता है जो गंगा नदी को समझने और जानने के लिए एक शोध पर निकला है उस प्रेम से उनका एक बच्चा भी होता है। उसी प्रेम की तलाश में गंगा पहाड़ से समतल के तरफ बढ़ती है। गंगा जब पहले पड़ाव ऋषिकेश तक पहुँचती है, वहीं से उसे दूषित करने का प्रयास शुरू होता है, वहाँ से बचते हुए गंगा बनारस पहुंचती है जहाँ वो पाखंड और धूर्तता के जाल में फंस जाती है और सामाजिक मैल की परत उस पर चढ़ाई जाने लगती है।

पहाड़ की निर्मल गंगा अपने प्रेम की तलाश में बंगाल तक का रास्ता बनारस होते हुए तय करती है लेकिन बीच में ही शहरी सभ्यता तक पहुंचते पहुंचते अपनी निर्मलता खोने लगती है। और अंत में गंगा बंगाल पहुंचती है जहाँ उसे उसका प्यार मिलता है जो उसे उसके मैल के साथ स्वीकार कर उसे फिर से निर्मल कर देता है।

गंगा और सिनेमा के सम्बन्ध का सबसे सटीक उदाहरण है “राम तेरी गंगा मैली”। पौराणिकता से थोड़ा तटस्थ करके गंगा और समाज के बदलते या बिगड़ते परिदृश्य को सांकेतिक कथानक के साथ फिल्माने का अनूठा प्रयोग था। इस लिए मेरा मानना है की शहरी विकास की गाथा और सामाजिक और कलात्मक परिवेश के परिवर्तन को समझने के लिए उस देश के सिनेमा और वहाँ की प्रमुख नदी का सम्मिलित अध्यन बहुत आवश्यक है।

इतना ही नहीं अगर गंगा और सिनेमा की बात हो तो लेखक निर्देशक विजय सिंह की फिल्म जया गंगा को बिलकुल नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। 1996-97 ये वो दौर था जहाँ से एक प्रयोगवादी नज़रिए का आगाज हो चूका था कला, जीवन और संबंधों में नए प्रयोग होने लगे थे। लगभग इसी काल में “दरम्यान” “इस रात की सुबह नहीं” “सरदारी बेगम” जैसी फिल्म भी दर्शकों को सिनेमा हॉल में उपलब्ध होने लगा। गंगा को लेकर भी सिर्फ आस्था का नजरिया हटने लगा था और गंगा को भूगौलिक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण इकाई के रूप में लिया जाने लगा और गंगा के साथ भी आस्था और विज्ञान को मिला कर नया प्रयोग होने लगा था। और इस दौरान जया गंगा जैसी प्रायोगिक फिल्म बनती है जो एक भिन्न सिनेमा के रूप में अपनी पहचान स्थापित करती है। बेशक सिनेमा हॉल में या सिनेमा की मुख्यधारा में इस फिल्म का कोई जिक्र भी नहीं होता है, लेकिन मुख्यधारा से अलग के दर्शकों को एक फिल्म बेहतरीन मिलती है। गंगा, सम्बन्ध, कल्पना और प्रयोग के संयोजन का एक बहुत ही अनूठा साक्ष्य है जया गंगा।

अंत में यही कहना चाहूंगा की गंगा के प्रति हमारी वैज्ञानिक आस्था एवं सिनेमा के प्रति हमारी कलात्मक संवेदना बनी रहे और हम अपने जीवन, कला और सिनेमा में निरंतर सकारात्मक प्रयोग करते रहें।

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