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फिल्म : अय्यारी  
हिंद वॉच मीडिया रेटिंग : तीन (03 / 05)
बैनर : फ्राइडे फिल्म वर्क्स, पेन इंडिया लिमिटेड   
सेंसर सर्टिफिकेट : U/A
जॉनर : एक्शन, क्राइम, ड्रामा, थ्रिलर     
अवधि : 2घंटा, 37मिनट
निर्देशक : नीरज पांडे
लेखक : नीरज पांडे
सिनेमेटोग्राफर : सुधीर पलसाने
एडिटर : कथिकुलोथ प्रवीण
संगीत : संजय चौधरी 
कलाकार : मनोज बाजपेयी, नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर, विक्रम गोखले, सिद्धार्थ मल्होत्रा, कुमुद मिश्रा, आदिल हुसैन,  राजेश तैलंग, पूजा चोपड़ा, राकुल प्रीत सिंह।

‘अय्यारी’ संज्ञा है, जो अय्यार शब्द से बना है। अय्यार उस इन्सान को कहते हैं, जो अपना भेष बदलकर कभी-भी और कहीं-भी पहुँच जाये। मेरी जानकारी में हिन्दी साहित्य में पहली बार यह शब्द देवकीनंदन खत्री के उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता संतति’ में आता है।

नीरज पांडे की ‘अय्यारी’ में दो अय्यार हैं- एक मनोज बाजपेयी और दूसरा सिद्धार्थ मल्होत्रा। इस फिल्म का यह नाम ‘अय्यारी’ बिल्कुल सटीक है। यह नाम निर्देशक को खुलकर खेलने की छूट देता है। निर्देशक अपना रास्ता आसान करने के लिए इस छूट का खूब लाभ उठाता है। नीरज पांडे पूरी तरह से कम्फर्ट जोन में हैं। उनके जैसे निर्देशक के लिए यह कोई नई परिकल्पना नहीं है। वे अपनी ‘देशभक्ति और मिशन’ फ्रेंचाइजी को रिपीट कर रहे हैं और बहुत अच्छा बिज़नेस भी।

नीरज पांडे ‘अ वेडनेसडे’ से चर्चा में आये थे। यह फिल्म अपनी परिकल्पना में मील का पत्थर साबित हुई। हिन्दी सिनेमा के इतिहास में ‘अ वेडनेसडे’ और नीरज पांडे हमेशा के लिए अमर हो गये हैं। उनकी ‘स्पेशल 26’ भी लोगों को बहुत पसंद आयी थी। उनसे अच्छी फिल्म की उम्मीद करना स्वाभाविक है।

‘अय्यारी’ में अच्छे अभिनेताओं की पूरी फ़ौज है, इसके लिए नीरज पांडे को ह्रदय से आभार। मनोज बाजपेयी के अभिनय के बारे में कुछ कहना लाइटहाउस को दिया दिखाने जैसा है। मुंबई के धरोहर ‘मराठा मंदिर’ में शुक्रवार को रात का शो देखने गया था। मैं वहाँ एक घंटा पहले पहुँचा ताकि बॉक्स ऑफिस और दर्शकों का जायजा ले सकूँ। वहाँ अधिकांश दर्शकों का यही कहना था कि नीरज पांडे तो अच्छी फ़िल्में बनाते हैं, लेकिन मनोज बाजपेयी की एक झलक भी देख लिए तो पैसा वसूल है।

फिल्म में मनोज बाजपेयी एक सीक्वेंस में भिखारी बने हैं, जिसमें आप उनके अभिनय की ऊँचाईयाँ देखेंगे। लेकिन उनके अलावा इसमें कई बेहतरीन कलाकार हैं, जिनकी प्रशंसा किये बगैर आप नहीं रह सकते। एक अभिनेता तो ऐसा है कि उनसे कहीं भी उन्नीस नहीं पड़ता है। जी हाँ, नसीरुद्दीन शाह जो अपनी अदाकारी से रसिकों के दिलों पर राज करते हैं। इस फिल्म में उनका किरदार एक वॉचमैन का है। इस किरदार को उन्होंने अमर कर दिया है। आप मंत्रमुग्ध हो कर उनकी एक्टिंग देखते रह जाते हैं। इस फिल्म में यही किरदार सबसे अच्छी तरह परिभाषित है।

सिद्धार्थ मल्होत्रा ठीक ही हैं और उनका किरदार एक ओवर स्मार्ट अय्यार का है। अनुपम खेर, विक्रम गोखले, कुमुद मिश्रा, आदिल हुसैन और  राजेश तैलंग सब एक से बढ़कर एक उम्दा कलाकार हैं और ये अपने किरदार के साथ न्याय करते हैं।

अय्यार का बैकग्राउंड स्कोर इस फिल्म की जान है। यही फिल्म को उठाता है और पांडे जी इसके साथ बहुत खेलते हैं। वे  सिनेमा के ऑडियो-विजुअल मीडियम के महत्त्व को अच्छी तरह से समझते हैं, इसलिए वे ऑडियो पर बहुत ध्यान देते हैं। यह एक अच्छे निर्देशक की पहचान है, वहीँ लाउड हो जाना उसकी कमजोरी भी है। हम असली ज़िन्दगी में भी लाउड तो हैं ही। तो क्या हमारा सिनेमा भी लाउड होना चाहिए? एक सच्चा कलाकार जानबूझकर समाज की बूरी आदतों से सुर में सुर नहीं मिलाता है, बल्कि मसाल दिखाकर दिशा देता है। साहित्य के सन्दर्भ में यह कलम के सिपाही प्रेमचंद का कथन है।

फिल्म की कहानी रक्षा सौदों में होने वाले भ्रष्टाचार से शुरू होती है, जिसमें सेनाध्यक्ष को खरीदने की कोशिश की जाती है। सेनाध्यक्ष की ईमानदारी से मजबूर होकर रक्षा सौदों के दलाल उन्हें फँसाने के लिए जाल बुनते हैं। सिद्धार्थ मल्होत्रा को सारी बातें पता चल जाती हैं। वह फरार हो जाता है और अपने तरीके से लड़ने की रणनीति बनाता है। सेनाध्यक्ष मनोज बाजपेयी से मिलते हैं और बताते हैं कि हमलोग बूरी तरह से फँस गये हैं। मनोज बाजपेयी उन्हें देशहित में अनऑफिसियल ऑर्डर देने को कहते हैं। सेनाध्यक्ष कहते हैं कि देश की रक्षा से खिलवाड़ करने वाले बास्टर्ड किसी भी हालत में जीतने नहीं चाहिए।

इसी बीच मुंबई के कोलाबा में शहीद जवानों के परिवार के लिए बनाये जाने वाले बिल्डिंग का मामला भी सामने आता है। मनोज बाजपेयी फरार सिद्धार्थ मल्होत्रा को उसकी गद्दारी की सजा देने के लिए उसका पीछा करते हैं। विदेश में वे अनुपम खेर से मदद लेकर सिद्धार्थ मल्होत्रा तक पहुँचते हैं। इस बीच कहानी में ट्विस्ट आता है, फ्लैशबैक आता है। कहानी आगे-पीछे होती रहती है। मनोज बाजपेयी और सिद्धार्थ मल्होत्रा अपने-अपने मिशन में तू डाल-डाल तो मैं पात-पात का खेल खेलते रहते हैं। क्या वे दोनों अपने मिशन में कामयाब हो पाते हैं?

क्या रक्षा सौदा के दलालों को उनके किये की सजा मिलती है? यह जानने के लिए ज़रूर देखिए ‘अय्यारी’।

इस फिल्म के ऑफिसियल ट्रेलर को देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक कीजिये :

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सिनेमा में गहरी रूचि और समझ रखने वाले विनोद सिंह एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। मायानगरी मुंबई में रहकर वे हिंद वॉच मीडिया के लिए नियमित तौर पर सिनेमा से जुड़े विषयों पर लिखते रहे हैं। उनकी फिल्म समीक्षा पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय है। विनोद सिंह हिंद वॉच मीडिया संपादक मंडल के सदस्य होने के साथ-साथ सिनेमा सेक्शन के उप-संपादक भी हैं। सरल भाषा और सपाट बयानी उनकी लेखनी को विशिष्ट पहचान देती है। हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|