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फ़िल्म का नाम : मुक्काबाज़ Mukkabaaz
हिंद वॉच मीडिया रेटिंग :  3.5 स्टार
सेंसर सर्टिफिकेट : U/A
जॉनर : लव स्टोरी, ड्रामा
अवधि : 2 घंटे, 36 मिनट
निर्माता : फैंटम फिल्म्स और कलर येलो प्रोडक्शन्स
निर्देशक : अनुराग कश्यप 
लेखक : अनुराग कश्यप, विनीत कुमार सिंह, मुक्ति सिंह श्रीनेत, के. डी. सत्यम, रंजन चंदेल और प्रसून मिश्रा।
कलाकार : विनीत कुमार सिंह, जोया हुसैन, जिमी शेरगिल, रवि किशन, साधना सिंह, श्रीधर दुबे  
संगीत : प्रशांत पिल्लई

मुक्काबाज़’ सबसे पहले एक प्रेम कहानी है। यह प्रेम कहानी एक मुक्काबाज़ की है। प्रेम और बॉक्सिंग का ग्राफ समानांतर है, एक दूसरे में घुला-मिला। यह तय करना मुश्किल होता है कि इसे प्रेम की फ़िल्म कहें या बॉक्सिंग की। कहानी जब प्रेम की तरफ झुकने लगती है तो अनुराग कश्यप इसे बॉक्सिंग की तरफ मोड़ देते हैं। कहानी के तकनीक के आधार पर यह मूलतः एक प्रेम कहानी है, जिसे आप फ़िल्म के अंतिम सीन में समझ पायेंगे।

सिस्टम ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जाबी (मूँह बंद करने वाला) लगा दिया है। सिस्टम के खिलाफ सीधे-सीधे  कुछ कहने से हमारे अधिकांश फिल्ममेकर नज़रें चुराते हैं। सिस्टम से सीधे भीड़ने के लिए आनंद पटवर्धन जैसा फिल्ममेकर बनना पड़ेगा। व्यवसायिक सिनेमा में अनुराग पहली बार अपने रूपक में सिस्टम के खिलाफ मुखर हैं। वे भी सिस्टम से सीधे नहीं भीड़ रहे हैं, रूपक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इतना जोखिम तो हिटलर के समय भी कलाकारों ने लिया था।

आज हमारा पहरेदार एक प्रतिभावान संवेदनशील कवि प्रसून जोशी है। मुक्काबाज़ इस रूप में भी देख पा रहे हैं इसके लिए हमें उनकी प्रशंसा करनी होगी। ‘भारत माता की जय’ यह डायलॉग एक बहुत बड़े रूपक में बदल गया है।

इस फिल्म की कहानी में जाति, धर्म और भ्रष्टाचार को पिरो दिया गया है। इन विषयों को सिनेमा में डालना ज़रूरी नहीं था। यह सीधे-सीधे राजनीति है। हाँ, यह राजनीति है और यही सबसे ज़रूरी है। आपकी साँसों का एक-एक हिसाब जब राजनीति ले रही है, तो आप राजनीति से चाह कर भी बच नहीं सकते। क्या इस राजनीति के पीछे अनुराग की भी कोई राजनीति है? यह आप फिल्म देखने के बाद तय कीजिए।

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अगर स्वार्थी तत्वों के हाथ में देशभक्ति का झंडा होगा तो  लोकतंत्र खतरे में है। कलाकारों और खिलाड़ियों को चाटुकार बनाने के लिए सिस्टम के पास हमेशा से आजमाए हुए हथियार रहे हैं। ‘मुक्काबाज़’ का नायक श्रवण (विनीत कुमार सिंह) चाटुकार नहीं बन पाता है और आज जो चाटुकार नहीं है उसे सिस्टम से तो लड़ना ही होगा। हर उस व्यक्ति को सिस्टम से लड़ना होगा, जो सच में देशभक्त है।

फिल्म का खलनायक भगवान दास मिश्रा (जिमी शेरगिल) एक जलील किस्म का भेड़िया है। एक सत्तावन भेड़िया तब ज़्यादा निर्मम और क्रूर हो जाता है, जब किसी स्त्री से सम्बन्ध बनाने की स्थिति में नहीं हो। उसका अंतर बहुत ही घिनौना होता है। यह भगवान दास मिश्रा सही मायने में उत्तर प्रदेश की राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है। सिस्टम का प्रतिनिधित्व करता है। वह सिस्टम की तरह ताक़तवर तो है लेकिन नपुंसक है। यह किरदार ‘लार्जर दैन लाइफ’ लगता है।

मिश्रा सिस्टम का एक रूपक है, जो ‘लार्जर दैन लाइफ’ ही नहीं उससे कहीं बढ़कर है। कला के विकास के लिए सिस्टम की तरह फिल्म के ढाँचों को भी तोड़ना चाहिए। अनुराग का हिन्दी सिनेमा को सबसे बड़ा अवदान यही है कि उन्होंने स्थापित प्रतिमानों को तोड़ा है।

मुक्काबाज़ उत्तर भारतीय समाज में जातीय कलंक और  हिंसा के कई आयामों को उद्घाटित करती है, उसकी सही तस्वीर पेश करती है। फिल्म की शुरूआत ही नृशंस और पाशविक हिंसा के सीन से होती है। हम उनकी फ़िल्म का मुख्य स्वर या उनकी फिल्मों की प्रवृति को देखते हैं तो वहाँ सहज रूप से हिंसा दिखायी देती है। हिंसा समाज में भी है।

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फिल्म की भाषा पूर्वांचल की है। इसके डायलॉग बहुत जानदार हैं। फिल्म के कई सीन को उठाने के लिए म्यूजिकल ट्रीटमेंट का भरपूर इस्तेमाल हुआ है। फिल्म के गाने इसकी मूड के अनुसार बहुत अच्छे हैं। जैसे कि ‘मुश्किल है अपना प्रेम प्रिये,’ ‘जीवन चाटा दीमक जैसा, सपने कुतरे चूहे जैसा…बहुत हुआ सम्मान तुम्हारी…,’ ‘सीख सीख सीख तू ज़िन्दगी का पैंतरा,’ ‘साढ़े तीन बजे मुन्नी ज़रूर मिलना,’ आदि। फिल्म आपको बाँध के रखती है। हालाँकि मध्यांतर के बाद कहानी बहुत फ़िल्मी हो गयी है और क्लाइमैक्स बहुत सामान्य है। फिर भी नायक का प्रेम और बॉक्सिंग के लिए उसका पैशन आपको शुरू से अंत तक बाँध के रखेगा। बॉक्सिंग के सीन को निर्देशक ने एक सीमा तक वास्तविक रखा है, यह एक सही प्रयोग है। यह ‘मस्ट वॉच’ कैटेगरी की मूवी है। अगर आप मनोरंजन के लिए फ़िल्में देखना पसंद करते हैं तो इसे छोड़ नहीं सकते।

विनीत कुमार सिंह ने अपनी मेहनत और लगन से फिल्म को ऊपर उठा दिया है। उनका काम स्तरीय है और वे अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं। उन्हें अपने किरदार पर काम करने के लिए चार-पाँच साल का समय मिला है। अनुराग ने जिस दिन उन्हें बॉक्सर बनने के लिए कहा उसी दिन से वे अपने किरदार पर काम करने लगे। यह विनीत का सौभाग्य ही है कि उन्हें वास्तविक दुनिया में भी अपने किरदार को जीने का मौका मिला। वे अपने काम के प्रति बहुत ईमानदार हैं और उनके पैशन पर कोई शक की गुंजाइश नहीं है। अनुराग की फिल्मों में स्त्री पात्र नकली नहीं लगते हैं। वे अपने पूरे वजूद और दबंगई के साथ चढ़ के आती हैं। यह अनुराग का मानवीय पहलू है। नायिका जोया ने सराहनीय काम किया है। उन्होंने गूंगे लोगों की भाषा सीखी, जिससे उनके अभिनय में निखार आ गया है। जिमी शेरगिल एक अच्छे इन्सान हैं और भगवान दास मिश्रा का व्यक्तित्व इसके बिल्कुल उल्टा है। उनकी लाल-लाल आँखों ने उनकी क्रूरता को धार देने का काम किया है। जिमी ने अपने किरदार पर अच्छा काम किया है और मिश्र के चरित्र को आत्मसात कर लिया है।

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रवि किशन तो एक शानदार अभिनेता हैं, उनकी प्रतिभा का अभी ठीक से दोहन (seize=अभिग्रहण) नहीं हो पाया है। बॉक्सिंग कोच संजय कुमार के किरदार में उन्होंने जान डाल दी है। ‘नदिया के पार’ वाली साधना सिंह का अभिनय भी कमाल का है, उन्होंने बेहतरीन काम किया है। श्रीधर दूबे ने सहनायक की भूमिका के साथ न्याय किया है। अपने रोल में वे एकदम सही हैं। श्रीधर का अभिनय प्रभावित करता है। मुक्ति सिंह एक ट्रेनर के रूप में ठीक लगे हैं। अनुराग अपने किरदारों को खिलने का पूरा मौका देते हैं। फिल्म का अभिनय पक्ष जानदार है।

‘मुक्काबाज़’ समाज के विरोधाभास को उजागर करती है। यह उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकती है, लेकिन फिल्म से बहुत ज्यादा उम्मीद करना ठीक नहीं है। सत्यजीत राय ने ठीक ही कहा है कि फिल्म से समाज में क्रांति नहीं आ सकती।

इस फिल्म के ऑफिसियल ट्रेलर को आप नीचे दिए वीडियो लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं :

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सिनेमा में गहरी रूचि और समझ रखने वाले विनोद सिंह एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। मायानगरी मुंबई में रहकर वे हिंद वॉच मीडिया के लिए नियमित तौर पर सिनेमा से जुड़े विषयों पर लिखते रहे हैं। उनकी फिल्म समीक्षा पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय है। विनोद सिंह हिंद वॉच मीडिया संपादक मंडल के सदस्य होने के साथ-साथ सिनेमा सेक्शन के उप-संपादक भी हैं। सरल भाषा और सपाट बयानी उनकी लेखनी को विशिष्ट पहचान देती है। हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|